72. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

72. पृष्ठ
3 · आले-इमरान
وَمَٓا اَصَابَكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ فَبِاِذْنِ اللّٰهِ وَلِيَعْلَمَ الْمُؤْمِن۪ينَۙ166
और दोनों गिरोह की मुठभेड़ के दिन जो कुछ तुम्हारे सामने आया वह अल्लाह ही की अनुज्ञा से आया और इसलिए कि वह जान ले कि ईमानवाले कौन है
وَلِيَعْلَمَ الَّذ۪ينَ نَافَقُواۚ وَق۪يلَ لَهُمْ تَعَالَوْا قَاتِلُوا ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ اَوِ ادْفَعُواۜ قَالُوا لَوْ نَعْلَمُ قِتَالًا لَاتَّبَعْنَاكُمْۜ هُمْ لِلْكُفْرِ يَوْمَئِذٍ اَقْرَبُ مِنْهُمْ لِلْا۪يمَانِۚ يَقُولُونَ بِاَفْوَاهِهِمْ مَا لَيْسَ ف۪ي قُلُوبِهِمْۜ وَاللّٰهُ اَعْلَمُ بِمَا يَكْتُمُونَۚ167
और इसलिए कि वह कपटाचारियों को भी जान ले जिनसे कहा गया कि "आओ, अल्लाह के मार्ग में युद्ध करो या दुश्मनों को हटाओ।" उन्होंने कहा, "यदि हम जानते कि लड़ाई होगी तो हम अवश्य तुम्हारे साथ हो लेते।" उस दिन वे ईमान की अपेक्षा अधर्म के अधिक निकट थे। वे अपने मुँह से वे बातें कहते है, जो उनके दिलों में नहीं होती। और जो कुछ वे छिपाते है, अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है
اَلَّذ۪ينَ قَالُوا لِاِخْوَانِهِمْ وَقَعَدُوا لَوْ اَطَاعُونَا مَا قُتِلُواۜ قُلْ فَادْرَؤُ۫ا عَنْ اَنْفُسِكُمُ الْمَوْتَ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ168
ये वही लोग है जो स्वयं तो बैठे रहे और अपने भाइयों के विषय में कहने लगे, "यदि वे हमारी बात मान लेते तो मारे न जाते।" कह तो, "अच्छा, यदि तुम सच्चे हो, तो अब तुम अपने ऊपर से मृत्यु को टाल देना।"
وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذ۪ينَ قُتِلُوا ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ اَمْوَاتًاۜ بَلْ اَحْيَٓاءٌ عِنْدَ رَبِّهِمْ يُرْزَقُونَۙ169
तुम उन लोगों को जो अल्लाह के मार्ग में मारे गए है, मुर्दा न समझो, बल्कि वे अपने रब के पास जीवित हैं, रोज़ी पा रहे हैं
فَرِح۪ينَ بِمَٓا اٰتٰيهُمُ اللّٰهُ مِنْ فَضْلِه۪ۙ وَيَسْتَبْشِرُونَ بِالَّذ۪ينَ لَمْ يَلْحَقُوا بِهِمْ مِنْ خَلْفِهِمْۙ اَلَّا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَۢ170
अल्लाह ने अपनी उदार कृपा से जो कुछ उन्हें प्रदान किया है, वे उसपर बहुत प्रसन्न है और उन लोगों के लिए भी ख़ुश हो रहे है जो उनके पीछे रह गए है, अभी उनसे मिले नहीं है कि उन्हें भी न कोई भय होगा और न वे दुखी होंगे
يَسْتَبْشِرُونَ بِنِعْمَةٍ مِنَ اللّٰهِ وَفَضْلٍۙ وَاَنَّ اللّٰهَ لَا يُض۪يعُ اَجْرَ الْمُؤْمِن۪ينَۚۛ۟171
वे अल्लाह के अनुग्रह और उसकी उदार कृपा से प्रसन्न हो रहे है और इससे कि अल्लाह ईमानवालों का बदला नष्ट नहीं करता
اَلَّذ۪ينَ اسْتَجَابُوا لِلّٰهِ وَالرَّسُولِ مِنْ بَعْدِ مَٓا اَصَابَهُمُ الْقَرْحُۜۛ لِلَّذ۪ينَ اَحْسَنُوا مِنْهُمْ وَاتَّقَوْا اَجْرٌ عَظ۪يمٌۚ172
जिन लोगों ने अल्लाह और रसूल की पुकार को स्वीकार किया, इसके पश्चात कि उन्हें आघात पहुँच चुका था। इन सत्कर्मी और (अल्लाह का) डर रखनेवालों के लिए बड़ा प्रतिदान है
اَلَّذ۪ينَ قَالَ لَهُمُ النَّاسُ اِنَّ النَّاسَ قَدْ جَمَعُوا لَكُمْ فَاخْشَوْهُمْ فَزَادَهُمْ ا۪يمَانًاۗ وَقَالُوا حَسْبُنَا اللّٰهُ وَنِعْمَ الْوَك۪يلُ173
ये वही लोग है जिनसे लोगों ने कहा, "तुम्हारे विरुद्ध लोग इकट्ठा हो गए है, अतः उनसे डरो।" तो इस चीज़ ने उनके ईमान को और बढ़ा दिया। और उन्होंने कहा, "हमारे लिए तो बस अल्लाह काफ़ी है और वही सबसे अच्छा कार्य-साधक है।"