88. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

88. पृष्ठ
4 · अन-निसा
اَلَمْ تَرَ اِلَى الَّذ۪ينَ يَزْعُمُونَ اَنَّهُمْ اٰمَنُوا بِمَٓا اُنْزِلَ اِلَيْكَ وَمَٓا اُنْزِلَ مِنْ قَبْلِكَ يُر۪يدُونَ اَنْ يَتَحَاكَمُٓوا اِلَى الطَّاغُوتِ وَقَدْ اُمِرُٓوا اَنْ يَكْفُرُوا بِه۪ۜ وَيُر۪يدُ الشَّيْطَانُ اَنْ يُضِلَّهُمْ ضَلَالًا بَع۪يدًا60
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा, जो दावा तो करते है कि वे उस चीज़ पर ईमान रखते हैं, जो तुम्हारी ओर उतारी गई है और तुमसे पहले उतारी गई है। और चाहते है कि अपना मामला ताग़ूत के पास ले जाकर फ़ैसला कराएँ, जबकि उन्हें हुक्म दिया गया है कि वे उसका इनकार करें? परन्तु शैतान तो उन्हें भटकाकर बहुत दूर डाल देना चाहता है
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمْ تَعَالَوْا اِلٰى مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ وَاِلَى الرَّسُولِ رَاَيْتَ الْمُنَافِق۪ينَ يَصُدُّونَ عَنْكَ صُدُودًاۚ61
और जब उनसे कहा जाता है कि आओ उस चीज़ की ओर जो अल्लाह ने उतारी है और आओ रसूल की ओरस तो तुम मुनाफ़िको (कपटाचारियों) को देखते हो कि वे तुमसे कतराकर रह जाते है
فَكَيْفَ اِذَٓا اَصَابَتْهُمْ مُص۪يبَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ اَيْد۪يهِمْ ثُمَّ جَٓاؤُ۫كَ يَحْلِفُونَ بِاللّٰهِ اِنْ اَرَدْنَٓا اِلَّٓا اِحْسَانًا وَتَوْف۪يقًا62
फिर कैसी बात होगी कि जब उनकी अपनी करतूतों के कारण उनपर बड़ी मुसीबत आ पडेगी। फिर वे तुम्हारे पास अल्लाह की क़समें खाते हुए आते है कि हम तो केवल भलाई और बनाव चाहते थे?
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ يَعْلَمُ اللّٰهُ مَا ف۪ي قُلُوبِهِمْ فَاَعْرِضْ عَنْهُمْ وَعِظْهُمْ وَقُلْ لَهُمْ ف۪ٓي اَنْفُسِهِمْ قَوْلًا بَل۪يغًا63
ये वे लोग है जिनके दिलों की बात अल्लाह भली-भाँति जानता है; तो तुम उन्हें जाने दो और उन्हें समझओ और उनसे उनके विषय में वह बात कहो जो प्रभावकारी हो
وَمَٓا اَرْسَلْنَا مِنْ رَسُولٍ اِلَّا لِيُطَاعَ بِاِذْنِ اللّٰهِۜ وَلَوْ اَنَّهُمْ اِذْ ظَلَمُٓوا اَنْفُسَهُمْ جَٓاؤُ۫كَ فَاسْتَغْفَرُوا اللّٰهَ وَاسْتَغْفَرَ لَهُمُ الرَّسُولُ لَوَجَدُوا اللّٰهَ تَوَّابًا رَح۪يمًا64
हमने जो रसूल भी भेजा, इसलिए भेजा कि अल्लाह की अनुमति से उसकी आज्ञा का पालन किया जाए। और यदि यह उस समय, जबकि इन्होंने स्वयं अपने ऊपर ज़ुल्म किया था, तुम्हारे पास आ जाते और अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करता तो निश्चय ही वे अल्लाह को अत्यन्त क्षमाशील और दयावान पाते
فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتّٰى يُحَكِّمُوكَ ف۪يمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْۙ ثُمَّ لَا يَجِدُوا ف۪ٓي اَنْفُسِهِمْ حَرَجًا مِمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُوا تَسْل۪يمًا65
तो तुम्हें तुम्हारे रब की कसम! ये ईमानवाले नहीं हो सकते जब तक कि अपने आपस के झगड़ो में ये तुमसे फ़ैसला न कराएँ। फिर जो फ़ैसला तुम कर दो, उसपर ये अपने दिलों में कोई तंगी न पाएँ और पूरी तरह मान ले