90. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

90. पृष्ठ
4 · अन-निसा
وَمَا لَكُمْ لَا تُقَاتِلُونَ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَالْمُسْتَضْعَف۪ينَ مِنَ الرِّجَالِ وَالنِّسَٓاءِ وَالْوِلْدَانِ الَّذ۪ينَ يَقُولُونَ رَبَّنَٓا اَخْرِجْنَا مِنْ هٰذِهِ الْقَرْيَةِ الظَّالِمِ اَهْلُهَاۚ وَاجْعَلْ لَنَا مِنْ لَدُنْكَ وَلِيًّاۚ وَاجْعَلْ لَنَا مِنْ لَدُنْكَ نَص۪يرًاۜ75
तुम्हें क्या हुआ है कि अल्लाह के मार्ग में और उन कमज़ोर पुरुषों, औरतों और बच्चों के लिए युद्ध न करो, जो प्रार्थनाएँ करते है कि "हमारे रब! तू हमें इस बस्ती से निकाल, जिसके लोग अत्याचारी है। और हमारे लिए अपनी ओर से तू कोई समर्थक नियुक्त कर और हमारे लिए अपनी ओर से तू कोई सहायक नियुक्त कर।"
اَلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا يُقَاتِلُونَ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِۚ وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا يُقَاتِلُونَ ف۪ي سَب۪يلِ الطَّاغُوتِ فَقَاتِلُٓوا اَوْلِيَٓاءَ الشَّيْطَانِۚ اِنَّ كَيْدَ الشَّيْطَانِ كَانَ ضَع۪يفًا۟76
ईमान लानेवाले तो अल्लाह के मार्ग में युद्ध करते है और अधर्मी लोग ताग़ूत (बढ़े हुए सरकश) के मार्ग में युद्ध करते है। अतः तुम शैतान के मित्रों से लड़ो। निश्चय ही, शैतान की चाल बहुत कमज़ोर होती है
اَلَمْ تَرَ اِلَى الَّذ۪ينَ ق۪يلَ لَهُمْ كُفُّٓوا اَيْدِيَكُمْ وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَۚ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقِتَالُ اِذَا فَر۪يقٌ مِنْهُمْ يَخْشَوْنَ النَّاسَ كَخَشْيَةِ اللّٰهِ اَوْ اَشَدَّ خَشْيَةًۚ وَقَالُوا رَبَّنَا لِمَ كَتَبْتَ عَلَيْنَا الْقِتَالَۚ لَوْلَٓا اَخَّرْتَنَٓا اِلٰٓى اَجَلٍ قَر۪يبٍۜ قُلْ مَتَاعُ الدُّنْيَا قَل۪يلٌۚ وَالْاٰخِرَةُ خَيْرٌ لِمَنِ اتَّقٰى وَلَا تُظْلَمُونَ فَت۪يلًا77
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिनसे कहा गया था कि अपने हाथ रोके रखो और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो? फिर जब उन्हें युद्ध का आदेश दिया गया तो क्या देखते है कि उनमें से कुछ लोगों का हाल यह है कि वे लोगों से ऐसा डरने लगे जैसे अल्लाह का डर हो या यह डर उससे भी बढ़कर हो। कहने लगे, "हमारे रब! तूने हमपर युद्ध क्यों अनिवार्य कर दिया? क्यों न थोड़ी मुहलत हमें और दी?" कह दो, "दुनिया की पूँजी बहुत थोड़ी है, जबकि आख़िरत उस व्यक्ति के अधिक अच्छी है जो अल्लाह का डर रखता हो और तुम्हारे साथ तनिक भी अन्याय न किया जाएगा।
اَيْنَ مَا تَكُونُوا يُدْرِكْكُمُ الْمَوْتُ وَلَوْ كُنْتُمْ ف۪ي بُرُوجٍ مُشَيَّدَةٍۜ وَاِنْ تُصِبْهُمْ حَسَنَةٌ يَقُولُوا هٰذِه۪ مِنْ عِنْدِ اللّٰهِۚ وَاِنْ تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَقُولُوا هٰذِه۪ مِنْ عِنْدِكَۜ قُلْ كُلٌّ مِنْ عِنْدِ اللّٰهِۜ فَمَا لِ‌هٰٓؤُ۬لَٓاءِ الْقَوْمِ لَا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ حَد۪يثًا78
"तुम जहाँ कहीं भी होंगे, मृत्यु तो तुम्हें आकर रहेगी; चाहे तुम मज़बूत बुर्जों (क़िलों) में ही (क्यों न) हो।" यदि उन्हें कोई अच्छी हालत पेश आती है तो कहते है, "यह तो अल्लाह के पास से है।" परन्तु यदि उन्हें कोई बुरी हालत पेश आती है तो कहते है, "यह तुम्हारे कारण है।" कह दो, "हरेक चीज़ अल्लाह के पास से है।" आख़िर इन लोगों को क्या हो गया कि ये ऐसे नहीं लगते कि कोई बात समझ सकें?
مَٓا اَصَابَكَ مِنْ حَسَنَةٍ فَمِنَ اللّٰهِۘ وَمَٓا اَصَابَكَ مِنْ سَيِّئَةٍ فَمِنْ نَفْسِكَۜ وَاَرْسَلْنَاكَ لِلنَّاسِ رَسُولًاۜ وَكَفٰى بِاللّٰهِ شَه۪يدًا79
तुम्हें जो भी भलाई प्राप्त" होती है, वह अल्लाह को ओर से है और जो बुरी हालत तुम्हें पेश आ जाती है तो वह तुम्हारे अपने ही कारण पेश आती है। हमने तुम्हें लोगों के लिए रसूल बनाकर भेजा है और (इसपर) अल्लाह का गवाह होना काफ़ी है