94. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
4 · अन-निसा
لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ غَيْرُ اُو۬لِي الضَّرَرِ وَالْمُجَاهِدُونَ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْۜ فَضَّلَ اللّٰهُ الْمُجَاهِد۪ينَ بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْ عَلَى الْقَاعِد۪ينَ دَرَجَةًۜ وَكُلًّا وَعَدَ اللّٰهُ الْحُسْنٰىۜ وَفَضَّلَ اللّٰهُ الْمُجَاهِد۪ينَ عَلَى الْقَاعِد۪ينَ اَجْرًا عَظ۪يمًاۙ95
ईमानवालों में से वे लोग जो बिना किसी कारण के बैठे रहते है और जो अल्लाह के मार्ग में अपने धन और प्राणों के साथ जी-तोड़ कोशिश करते है, दोनों समान नहीं हो सकते। अल्लाह ने बैठे रहनेवालों की अपेक्षा अपने धन और प्राणों से जी-तोड़ कोशिश करनेवालों का दर्जा बढ़ा रखा है। यद्यपि प्रत्यके के लिए अल्लाह ने अच्छे बदले का वचन दिया है। परन्तु अल्लाह ने जी-तोड़ कोशिश करनेवालों का बड़ा बदला रखा है
دَرَجَاتٍ مِنْهُ وَمَغْفِرَةً وَرَحْمَةًۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا۟96
उसकी ओर से दर्जे है और क्षमा और दयालुता है। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
اِنَّ الَّذ۪ينَ تَوَفّٰيهُمُ الْمَلٰٓئِكَةُ ظَالِم۪ٓي اَنْفُسِهِمْ قَالُوا ف۪يمَ كُنْتُمْۜ قَالُوا كُنَّا مُسْتَضْعَف۪ينَ فِي الْاَرْضِۜ قَالُٓوا اَلَمْ تَكُنْ اَرْضُ اللّٰهِ وَاسِعَةً فَتُهَاجِرُوا ف۪يهَاۜ فَاُو۬لٰٓئِكَ مَاْوٰيهُمْ جَهَنَّمُۜ وَسَٓاءَتْ مَص۪يرًاۙ97
जो लोग अपने-आप पर अत्याचार करते है, जब फ़रिश्ते उस दशा में उनके प्राण ग्रस्त कर लेते है, तो कहते है, "तुम किस दशा में पड़े रहे?" वे कहते है, "हम धरती में निर्बल और बेबस थे।" फ़रिश्ते कहते है, "क्या अल्लाह की धरती विस्तृत न थी कि तुम उसमें घर-बार छोड़कर कहीं ओर चले जाते?" तो ये वही लोग है जिनका ठिकाना जहन्नम है। - और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है
اِلَّا الْمُسْتَضْعَف۪ينَ مِنَ الرِّجَالِ وَالنِّسَٓاءِ وَالْوِلْدَانِ لَا يَسْتَط۪يعُونَ ح۪يلَةً وَلَا يَهْتَدُونَ سَب۪يلًا98
सिवाय उन बेबस पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों के जिनके बस में कोई उपाय नहीं और न कोई राह पा रहे है;
فَاُو۬لٰٓئِكَ عَسَى اللّٰهُ اَنْ يَعْفُوَ عَنْهُمْۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَفُوًّا غَفُورًا99
तो सम्भव है कि अल्लाह ऐसे लोगों को छोड़ दे; क्योंकि अल्लाह छोड़ देनेवाला और बड़ा क्षमाशील है
وَمَنْ يُهَاجِرْ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ يَجِدْ فِي الْاَرْضِ مُرَاغَمًا كَث۪يرًا وَسَعَةًۜ وَمَنْ يَخْرُجْ مِنْ بَيْتِه۪ مُهَاجِرًا اِلَى اللّٰهِ وَرَسُولِه۪ ثُمَّ يُدْرِكْهُ الْمَوْتُ فَقَدْ وَقَعَ اَجْرُهُ عَلَى اللّٰهِۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا۟100
जो कोई अल्लाह के मार्ग में घरबार छोड़कर निकलेगा, वह धरती में शरण लेने की बहुत जगह और समाई पाएगा, और जो कोई अपने घर में सब कुछ छोड़कर अल्लाह और उसके रसूल की ओर निकले और उसकी मृत्यु हो जाए, तो उसका प्रतिदान अल्लाह के ज़िम्मे हो गया। अल्लाह बहुत क्षमाशील, दयावान है
وَاِذَا ضَرَبْتُمْ فِي الْاَرْضِ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ اَنْ تَقْصُرُوا مِنَ الصَّلٰوةِۗ اِنْ خِفْتُمْ اَنْ يَفْتِنَكُمُ الَّذ۪ينَ كَفَرُواۜ اِنَّ الْكَافِر۪ينَ كَانُوا لَكُمْ عَدُوًّا مُب۪ينًا101
और जब तुम धरती में यात्रा करो, तो इसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं कि नमाज़ को कुछ संक्षिप्त कर दो; यदि तुम्हें इस बात का भय हो कि विधर्मी लोग तुम्हें सताएँगे और कष्ट पहुँचाएँगे। निश्चय ही विधर्मी लोग तुम्हारे खुले शत्रु है