अल-मोमिनून - कुरान पढ़ें
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
قَدْ اَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَۙ1
सफल हो गए ईमानवाले,
اَلَّذ۪ينَ هُمْ ف۪ي صَلَاتِهِمْ خَاشِعُونَۙ2
जो अपनी नमाज़ों में विनम्रता अपनाते है;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ عَنِ اللَّغْوِ مُعْرِضُونَۙ3
और जो व्यर्थ बातों से पहलू बचाते है;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ لِلزَّكٰوةِ فَاعِلُونَۙ4
और जो ज़कात अदा करते है;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَافِظُونَۙ5
और जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते है-
اِلَّا عَلٰٓى اَزْوَاجِهِمْ اَوْ مَا مَلَكَتْ اَيْمَانُهُمْ فَاِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُوم۪ينَۚ6
सिवाय इस सूरत के कि अपनी पत्नि यों या लौंडियों के पास जाएँ कि इसपर वे निन्दनीय नहीं है
فَمَنِ ابْتَغٰى وَرَٓاءَ ذٰلِكَ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْعَادُونَۚ7
परन्तु जो कोई इसके अतिरिक्त कुछ और चाहे तो ऐसे ही लोग सीमा उल्लंघन करनेवाले है।-
وَالَّذ۪ينَ هُمْ لِاَمَانَاتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَاعُونَۙ8
और जो अपनी अमानतों और अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान रखते है;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ عَلٰى صَلَوَاتِهِمْ يُحَافِظُونَۢ9
और जो अपनी नमाज़ों की रक्षा करते हैं;
اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْوَارِثُونَۙ10
वही वारिस होने वाले है
اَلَّذ۪ينَ يَرِثُونَ الْفِرْدَوْسَۜ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ11
जो फ़िरदौस की विरासत पाएँगे। वे उसमें सदैव रहेंगे
وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْاِنْسَانَ مِنْ سُلَالَةٍ مِنْ ط۪ينٍۚ12
हमने मनुष्य को मिट्टी के सत से बनाया
ثُمَّ جَعَلْنَاهُ نُطْفَةً ف۪ي قَرَارٍ مَك۪ينٍۖ13
फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह टपकी हुई बूँद बनाकर रखा
ثُمَّ خَلَقْنَا النُّطْفَةَ عَلَقَةً فَخَلَقْنَا الْعَلَقَةَ مُضْغَةً فَخَلَقْنَا الْمُضْغَةَ عِظَامًا فَكَسَوْنَا الْعِظَامَ لَحْمًاۗ ثُمَّ اَنْشَاْنَاهُ خَلْقًا اٰخَرَۜ فَتَبَارَكَ اللّٰهُ اَحْسَنُ الْخَالِق۪ينَۜ14
फिर हमने उस बूँद को लोथड़े का रूप दिया; फिर हमने उस लोथड़े को बोटी का रूप दिया; फिर हमने उन हड्डियों पर मांस चढाया; फिर हमने उसे एक दूसरा ही सर्जन रूप देकर खड़ा किया। अतः बहुत ही बरकतवाला है अल्लाह, सबसे उत्तम स्रष्टा!
ثُمَّ اِنَّكُمْ بَعْدَ ذٰلِكَ لَمَيِّتُونَۜ15
फिर तुम अवश्य मरनेवाले हो
ثُمَّ اِنَّكُمْ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ تُبْعَثُونَ16
फिर क़ियामत के दिन तुम निश्चय ही उठाए जाओगे
وَلَقَدْ خَلَقْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعَ طَرَٓائِقَۗ وَمَا كُنَّا عَنِ الْخَلْقِ غَافِل۪ينَ17
और हमने तुम्हारे ऊपर सात रास्ते बनाए है। और हम सृष्टि-कार्य से ग़ाफ़िल नहीं
وَاَنْزَلْنَا مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً بِقَدَرٍ فَاَسْكَنَّاهُ فِي الْاَرْضِۗ وَاِنَّا عَلٰى ذَهَابٍ بِه۪ لَقَادِرُونَۚ18
और हमने आकाश से एक अंदाज़े के साथ पानी उतारा। फिर हमने उसे धरती में ठहरा दिया, और उसे विलुप्त करने की सामर्थ्य भी हमें प्राप्त है
فَاَنْشَاْنَا لَكُمْ بِه۪ جَنَّاتٍ مِنْ نَخ۪يلٍ وَاَعْنَابٍۢ لَكُمْ ف۪يهَا فَوَاكِهُ كَث۪يرَةٌ وَمِنْهَا تَاْكُلُونَۙ19
फिर हमने उसके द्वारा तुम्हारे लिए खजूरो और अंगूरों के बाग़ पैदा किए। तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फल है (जिनमें तुम्हारे लिए कितने ही लाभ है) और उनमें से तुम खाते हो
وَشَجَرَةً تَخْرُجُ مِنْ طُورِ سَيْنَٓاءَ تَنْبُتُ بِالدُّهْنِ وَصِبْغٍ لِلْاٰكِل۪ينَ20
और वह वृक्ष भी जो सैना पर्वत से निकलता है, जो तेल और खानेवालों के लिए सालन लिए हुए उगता है
وَاِنَّ لَكُمْ فِي الْاَنْعَامِ لَعِبْرَةًۜ نُسْق۪يكُمْ مِمَّا ف۪ي بُطُونِهَا وَلَكُمْ ف۪يهَا مَنَافِعُ كَث۪يرَةٌ وَمِنْهَا تَاْكُلُونَۙ21
और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में भी एक शिक्षा है। उनके पेटों में जो कुछ है उसमें से हम तुम्हें पिलाते है। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फ़ायदे है और उन्हें तुम खाते भी हो
وَعَلَيْهَا وَعَلَى الْفُلْكِ تُحْمَلُونَ۟22
और उनपर और नौकाओं पर तुम सवार होते हो
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَا نُوحًا اِلٰى قَوْمِه۪ فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللّٰهَ مَا لَكُمْ مِنْ اِلٰهٍ غَيْرُهُۜ اَفَلَا تَتَّقُونَ23
हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर भेजा तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा और कोई इष्ट-पूज्य नहीं है तो क्या तुम डर नहीं रखते?"
فَقَالَ الْمَلَؤُ۬ا الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ قَوْمِه۪ مَا هٰذَٓا اِلَّا بَشَرٌ مِثْلُكُمْۙ يُر۪يدُ اَنْ يَتَفَضَّلَ عَلَيْكُمْۜ وَلَوْ شَٓاءَ اللّٰهُ لَاَنْزَلَ مَلٰٓئِكَةًۚ مَا سَمِعْنَا بِهٰذَا ف۪ٓي اٰبَٓائِنَا الْاَوَّل۪ينَۚ24
इसपर उनकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, कहने लगे, "यह तो बस तुम्हीं जैसा एक मनुष्य है। चाहता है कि तुमपर श्रेष्ठता प्राप्त करे।""अल्लाह यदि चाहता तो फ़रिश्ते उतार देता। यह बात तो हमने अपने अगले बाप-दादा के समयों से सुनी ही नहीं
اِنْ هُوَ اِلَّا رَجُلٌ بِه۪ جِنَّةٌ فَتَرَبَّصُوا بِه۪ حَتّٰى ح۪ينٍ25
यह तो बस एक उन्मादग्रस्त व्यक्ति है। अतः एक समय तक इसकी प्रतीक्षा कर लो।"
قَالَ رَبِّ انْصُرْن۪ي بِمَا كَذَّبُونِ26
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! इन्होंने मुझे जो झुठलाया है, इसपर तू मेरी सहायता कर।"
فَاَوْحَيْنَٓا اِلَيْهِ اَنِ اصْنَعِ الْفُلْكَ بِاَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا فَاِذَا جَٓاءَ اَمْرُنَا وَفَارَ التَّنُّورُۙ فَاسْلُكْ ف۪يهَا مِنْ كُلٍّ زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ وَاَهْلَكَ اِلَّا مَنْ سَبَقَ عَلَيْهِ الْقَوْلُ مِنْهُمْۚ وَلَا تُخَاطِبْن۪ي فِي الَّذ۪ينَ ظَلَمُواۚ اِنَّهُمْ مُغْرَقُونَ27
तब हमने उसकी ओर प्रकाशना की कि "हमारी आँखों के सामने और हमारी प्रकाशना के अनुसार नौका बना और फिर जब हमारा आदेश आ जाए और तूफ़ान उमड़ पड़े तो प्रत्येक प्रजाति में से एक-एक जोड़ा उसमें रख ले और अपने लोगों को भी, सिवाय उनके जिनके विरुद्ध पहले फ़ैसला हो चुका है। और अत्याचारियों के विषय में मुझसे बात न करना। वे तो डूबकर रहेंगे
فَاِذَا اسْتَوَيْتَ اَنْتَ وَمَنْ مَعَكَ عَلَى الْفُلْكِ فَقُلِ الْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذ۪ي نَجّٰينَا مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَ28
फिर जब तू नौका पर सवार हो जाए और तेरे साथी भी तो कह, प्रशंसा है अल्लाह की, जिसने हमें ज़ालिम लोगों से छुटकारा दिया
وَقُلْ رَبِّ اَنْزِلْن۪ي مُنْزَلًا مُبَارَكًا وَاَنْتَ خَيْرُ الْمُنْزِل۪ينَ29
और कह, ऐ मेरे रब! मुझे बरकतवाली जगह उतार। और तू सबसे अच्छा मेज़बान है।"
اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ وَاِنْ كُنَّا لَمُبْتَل۪ينَ30
निस्संदेह इसमें कितनी ही निशानियाँ हैं और परीक्षा तो हम करते ही है
ثُمَّ اَنْشَاْنَا مِنْ بَعْدِهِمْ قَرْنًا اٰخَر۪ينَۚ31
फिर उनके पश्चात हमने एक दूसरी नस्ल को उठाया;
فَاَرْسَلْنَا ف۪يهِمْ رَسُولًا مِنْهُمْ اَنِ اعْبُدُوا اللّٰهَ مَا لَكُمْ مِنْ اِلٰهٍ غَيْرُهُۜ اَفَلَا تَتَّقُونَ۟32
और उनमें हमने स्वयं उन्हीं में से एक रसूल भेजा कि "अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई इष्ट-पूज्य नहीं। तो क्या तुम डर नहीं रखते?"
وَقَالَ الْمَلَاُ مِنْ قَوْمِهِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِلِقَٓاءِ الْاٰخِرَةِ وَاَتْرَفْنَاهُمْ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۙ مَا هٰذَٓا اِلَّا بَشَرٌ مِثْلُكُمْۙ يَاْكُلُ مِمَّا تَاْكُلُونَ مِنْهُ وَيَشْرَبُ مِمَّا تَشْرَبُونَ33
उसकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया और आख़िरत के मिलन को झूठलाया और जिन्हें हमने सांसारिक जीवन में सुख प्रदान किया था, कहने लगे, "यह तो बस तुम्हीं जैसा एक मनुष्य है। जो कुछ तुम खाते हो, वही यह भी खाता है और जो कुछ तुम पीते हो, वही यह भी पीता है
وَلَئِنْ اَطَعْتُمْ بَشَرًا مِثْلَكُمْ اِنَّكُمْ اِذًا لَخَاسِرُونَ34
यदि तुम अपने ही जैसे एक मनुष्य के आज्ञाकारी हुए तो निश्चय ही तुम घाटे में पड़ गए
اَيَعِدُكُمْ اَنَّكُمْ اِذَا مِتُّمْ وَكُنْتُمْ تُرَابًا وَعِظَامًا اَنَّكُمْ مُخْرَجُونَۖ35
क्या यह तुमसे वादा करता है कि जब तुम मरकर मिट्टी और हड़्डियाँ होकर रह जाओगे तो तुम निकाले जाओगे?
هَيْهَاتَ هَيْهَاتَ لِمَا تُوعَدُونَۖ36
दूर की बात है, बहुत दूर की, जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है!
اِنْ هِيَ اِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوث۪ينَۖ37
वह तो बस हमारा सांसारिक जीवन ही है। (यहीं) हम मरते और जीते है। हम कोई दोबारा उठाए जानेवाले नहीं है
اِنْ هُوَ اِلَّا رَجُلٌۨ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا وَمَا نَحْنُ لَهُ بِمُؤْمِن۪ينَ38
वह तो बस एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अल्लाह पर झूठ घड़ा है। हम उसे कदापि माननेवाले नहीं।"
قَالَ رَبِّ انْصُرْن۪ي بِمَا كَذَّبُونِ39
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! उन्होंने जो मुझे झुठलाया, उसपर तू मेरी सहायता कर।"
قَالَ عَمَّا قَل۪يلٍ لَيُصْبِحُنَّ نَادِم۪ينَۚ40
कहा, "शीघ्र ही वे पछताकर रहेंगे।"
فَاَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ بِالْحَقِّ فَجَعَلْنَاهُمْ غُثَٓاءًۚ فَبُعْدًا لِلْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَ41
फिर घटित होनेवाली बात के अनुसार उन्हें एक प्रचंड आवाज़ ने आ लिया और हमने उन्हें कूड़ा-कर्कट बनाकर रख दिया। अतः फिटकार है, ऐसे अत्याचारी लोगों पर!
ثُمَّ اَنْشَاْنَا مِنْ بَعْدِهِمْ قُرُونًا اٰخَر۪ينَۜ42
फिर हमने उनके पश्चात दूसरी नस्लों को उठाया
مَا تَسْبِقُ مِنْ اُمَّةٍ اَجَلَهَا وَمَا يَسْتَاْخِرُونَۜ43
कोई समुदाय न तो अपने निर्धारित समय से आगे बढ़ सकता है और न पीछे रह सकता है
ثُمَّ اَرْسَلْنَا رُسُلَنَا تَتْرَاۜ كُلَّمَا جَٓاءَ اُمَّةً رَسُولُهَا كَذَّبُوهُ فَاَتْبَعْنَا بَعْضَهُمْ بَعْضًا وَجَعَلْنَاهُمْ اَحَاد۪يثَۚ فَبُعْدًا لِقَوْمٍ لَا يُؤْمِنُونَ44
फिर हमने निरन्तर अपने रसूल भेजे। जब भी किसी समुदाय के पास उसका रसूल आया, तो उसके लोगों ने उसे झुठला दिया। अतः हम एक दूसरे के पीछे (विनाश के लिए) लगाते चले गए और हमने उन्हें ऐसा कर दिया कि वे कहानियाँ होकर रह गए। फिटकार हो उन लोगों पर जो ईमान न लाएँ
ثُمَّ اَرْسَلْنَا مُوسٰى وَاَخَاهُ هٰرُونَ بِاٰيَاتِنَا وَسُلْطَانٍ مُب۪ينٍۙ45
फिर हमने मूसा और उसके भाई हारून को अपनी निशानियों और खुले प्रमाण के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों की ओर भेजा।
اِلٰى فِرْعَوْنَ وَمَلَا۬ئِه۪ فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا عَال۪ينَۚ46
किन्तु उन्होंने अहंकार किया। वे थे ही सरकश लोग
فَقَالُٓوا اَنُؤْمِنُ لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا وَقَوْمُهُمَا لَنَا عَابِدُونَۚ47
तो व कहने लगे, "क्या हम अपने ही जैसे दो मनुष्यों की बात मान लें, जबकि उनकी क़ौम हमारी ग़ुलाम भी है?"
فَكَذَّبُوهُمَا فَكَانُوا مِنَ الْمُهْلَك۪ينَ48
अतः उन्होंने उन दोनों को झुठला दिया और विनष्ट होनेवालों में सम्मिलित होकर रहे
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ49
और हमने मूसा को किताब प्रदान की, ताकि वे लोग मार्ग पा सकें
وَجَعَلْنَا ابْنَ مَرْيَمَ وَاُمَّهُٓ اٰيَةً وَاٰوَيْنَاهُمَٓا اِلٰى رَبْوَةٍ ذَاتِ قَرَارٍ وَمَع۪ينٍ۟50
और मरयम के बेटे और उसकी माँ को हमने एक निशानी बनाया। और हमने उन्हें रहने योग्य स्रोतबाली ऊँची जगह शरण दी,
يَٓا اَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًاۜ اِنّ۪ي بِمَا تَعْمَلُونَ عَل۪يمٌۜ51
"ऐ पैग़म्बरो! अच्छी पाक चीज़े खाओ और अच्छा कर्म करो। जो कुछ तुम करते हो उसे मैं जानता हूँ
وَاِنَّ هٰذِه۪ٓ اُمَّتُكُمْ اُمَّةً وَاحِدَةً وَاَنَا۬ رَبُّكُمْ فَاتَّقُونِ52
और निश्चय ही यह तुम्हारा समुदाय, एक ही समुदाय है और मैं तुम्हारा रब हूँ। अतः मेरा डर रखो।"
فَتَقَطَّعُٓوا اَمْرَهُمْ بَيْنَهُمْ زُبُرًاۜ كُلُّ حِزْبٍ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ53
किन्तु उन्होंने स्वयं अपने मामले (धर्म) को परस्पर टुकड़े-टुकड़े कर डाला। हर गिरोह उसी पर खुश है, जो कुछ उसके पास है
فَذَرْهُمْ ف۪ي غَمْرَتِهِمْ حَتّٰى ح۪ينٍ54
अच्छा तो उन्हें उनकी अपनी बेहोशी में डूबे हुए ही एक समय तक छोड़ दो
اَيَحْسَبُونَ اَنَّمَا نُمِدُّهُمْ بِه۪ مِنْ مَالٍ وَبَن۪ينَۙ55
क्या वे समझते है कि हम जो उनकी धन और सन्तान से सहायता किए जा रहे है,
نُسَارِعُ لَهُمْ فِي الْخَيْرَاتِۜ بَلْ لَا يَشْعُرُونَ56
तो यह उनके भलाइयों में कोई जल्दी कर रहे है?
اِنَّ الَّذ۪ينَ هُمْ مِنْ خَشْيَةِ رَبِّهِمْ مُشْفِقُونَۙ57
नहीं, बल्कि उन्हें इसका एहसास नहीं है। निश्चय ही जो लोग अपने रब के भय से काँपते रहते हैं;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ بِاٰيَاتِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَۙ58
और जो लोग अपने रब की आयतों पर ईमान लाते है;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ بِرَبِّهِمْ لَا يُشْرِكُونَۙ59
और जो लोग अपने रब के साथ किसी को साझी नहीं ठहराते;
وَالَّذ۪ينَ يُؤْتُونَ مَٓا اٰتَوْا وَقُلُوبُهُمْ وَجِلَةٌ اَنَّهُمْ اِلٰى رَبِّهِمْ رَاجِعُونَۙ60
और जो लोग देते है, जो कुछ देते है और हाल यह होता है कि दिल उनके काँप रहे होते है, इसलिए कि उन्हें अपने रब की ओर पलटना है;
اُو۬لٰٓئِكَ يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَهُمْ لَهَا سَابِقُونَ61
यही वे लोग है, जो भलाइयों में जल्दी करते है और यही उनके लिए अग्रसर रहनेवाले है।
وَلَا نُكَلِّفُ نَفْسًا اِلَّا وُسْعَهَا وَلَدَيْنَا كِتَابٌ يَنْطِقُ بِالْحَقِّ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ62
हम किसी व्यक्ति पर उसकी समाई (क्षमता) से बढ़कर ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं डालते और हमारे पास एक किताब है, जो ठीक-ठीक बोलती है, और उनपर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा
بَلْ قُلُوبُهُمْ ف۪ي غَمْرَةٍ مِنْ هٰذَا وَلَهُمْ اَعْمَالٌ مِنْ دُونِ ذٰلِكَ هُمْ لَهَا عَامِلُونَ63
बल्कि उनके दिल इसकी (सत्य धर्म की) ओर से हटकर (वसवसों और गफ़लतों आदि के) भँवर में पडे हुए है और उससे (ईमानवालों की नीति से) हटकर उनके कुछ और ही काम है। वे उन्हीं को करते रहेंगे;
حَتّٰٓى اِذَٓا اَخَذْنَا مُتْرَف۪يهِمْ بِالْعَذَابِ اِذَا هُمْ يَجْـَٔرُونَۜ64
यहाँ तक कि जब हम उनके खुशहाल लोगों को यातना में पकड़ेगे तो क्या देखते है कि वे विलाप और फ़रियाद कर रहे है
لَا تَجْـَٔرُوا الْيَوْمَ اِنَّكُمْ مِنَّا لَا تُنْصَرُونَ65
(कहा जाएगा,) "आज चिल्लाओ मत, तुम्हें हमारी ओर से कोई सहायता मिलनेवाली नहीं
قَدْ كَانَتْ اٰيَات۪ي تُتْلٰى عَلَيْكُمْ فَكُنْتُمْ عَلٰٓى اَعْقَابِكُمْ تَنْكِصُونَۙ66
तुम्हें मेरी आयतें सुनाई जाती थीं, तो तुम अपनी एड़ियों के बल फिर जाते थे।
مُسْتَكْبِر۪ينَ بِه۪ۗ سَامِرًا تَهْجُرُونَ67
हाल यह था कि इसके कारण स्वयं को बड़ा समझते थे, उसे एक कहानी कहनेवाला ठहराकर छोड़ चलते थे
اَفَلَمْ يَدَّبَّرُوا الْقَوْلَ اَمْ جَٓاءَهُمْ مَا لَمْ يَاْتِ اٰبَٓاءَهُمُ الْاَوَّل۪ينَۘ68
क्या उन्होंने इस वाणी पर विचार नहीं किया या उनके पास वह चीज़ आ गई जो उनके पहले बाप-दादा के पास न आई थी?
اَمْ لَمْ يَعْرِفُوا رَسُولَهُمْ فَهُمْ لَهُ مُنْكِرُونَۘ69
या उन्होंने अपने रसूल को पहचाना नहीं, इसलिए उसका इनकार कर रहे है?
اَمْ يَقُولُونَ بِه۪ جِنَّةٌۜ بَلْ جَٓاءَهُمْ بِالْحَقِّ وَاَكْثَرُهُمْ لِلْحَقِّ كَارِهُونَ70
या वे कहते है, "उसे उन्माद हो गया है।" नहीं, बल्कि वह उनके पास सत्य लेकर आया है। किन्तु उनमें अधिकांश को सत्य अप्रिय है
وَلَوِ اتَّبَعَ الْحَقُّ اَهْوَٓاءَهُمْ لَفَسَدَتِ السَّمٰوَاتُ وَالْاَرْضُ وَمَنْ ف۪يهِنَّۜ بَلْ اَتَيْنَاهُمْ بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَنْ ذِكْرِهِمْ مُعْرِضُونَۜ71
और यदि सत्य कहीं उनकी इच्छाओं के पीछे चलता तो समस्त आकाश और धरती और जो भी उनमें है, सबमें बिगाड़ पैदा हो जाता। नहीं, बल्कि हम उनके पास उनके हिस्से की अनुस्मृति लाए है। किन्तु वे अपनी अनुस्मृति से कतरा रहे है
اَمْ تَسْـَٔلُهُمْ خَرْجًا فَخَرَاجُ رَبِّكَ خَيْرٌۗ وَهُوَ خَيْرُ الرَّازِق۪ينَ72
या तुम उनसे कुथ शुल्क माँग रहे हो? तुम्हारे रब का दिया ही उत्तम है। और वह सबसे अच्छी रोज़ी देनेवाला है
وَاِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ اِلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ73
और वास्तव में तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुला रहे हो
وَاِنَّ الَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْاٰخِرَةِ عَنِ الصِّرَاطِ لَنَاكِبُونَ74
किन्तु जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते वे इस मार्ग से हटकर चलना चाहते है
وَلَوْ رَحِمْنَاهُمْ وَكَشَفْنَا مَا بِهِمْ مِنْ ضُرٍّ لَلَجُّوا ف۪ي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ75
यदि हम (किसी आज़माइश में डालने के पश्चात) उनपर दया करते और जिस तकलीफ़ में वे होते उसे दूर कर देते तो भी वे अपनी सरकशी में हठात बहकते रहते
وَلَقَدْ اَخَذْنَاهُمْ بِالْعَذَابِ فَمَا اسْتَكَانُوا لِرَبِّهِمْ وَمَا يَتَضَرَّعُونَ76
यद्यपि हमने उन्हें यातना में पकड़ा, फिर भी वे अपने रब के आगे न तो झुके और न वे गिड़गिड़ाते ही थे
حَتّٰٓى اِذَا فَتَحْنَا عَلَيْهِمْ بَابًا ذَا عَذَابٍ شَد۪يدٍ اِذَا هُمْ ف۪يهِ مُبْلِسُونَ۟77
यहाँ तक कि जब हम उनपर कठोर यातना का द्वार खोल दें तो क्या देखेंगे कि वे उसमें निराश होकर रह गए है
وَهُوَ الَّذ۪ٓي اَنْشَاَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْاَبْصَارَ وَالْاَفْـِٔدَةَۜ قَل۪يلًا مَا تَشْكُرُونَ78
और वही है जिसने तुम्हारे लिए कान और आँखे और दिल बनाए। तुम कृतज्ञता थोड़े ही दिखाते हो!
وَهُوَ الَّذ۪ي ذَرَاَكُمْ فِي الْاَرْضِ وَاِلَيْهِ تُحْشَرُونَ79
वही है जिसने तुम्हें धरती में पैदा करके फैलाया और उसी की ओर तुम इकट्ठे होकर जाओगे
وَهُوَ الَّذ۪ي يُحْي۪ وَيُم۪يتُ وَلَهُ اخْتِلَافُ الَّيْلِ وَالنَّهَارِۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ80
और वही है जो जीवन प्रदान करता और मृत्यु देता है और रात और दिन का उलट-फेर उसी के अधिकार में है। फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
بَلْ قَالُوا مِثْلَ مَا قَالَ الْاَوَّلُونَ81
नहीं, बल्कि वे लोग वहीं कुछ करते है जो उनके पहले के लोग कह चुके है
قَالُٓوا ءَاِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَامًا ءَاِنَّا لَمَبْعُوثُونَ82
उन्होंने कहा, "क्या जब हम मरकर मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे , तो क्या हमें दोबारा जीवित करके उठाया जाएगा?
لَقَدْ وُعِدْنَا نَحْنُ وَاٰبَٓاؤُ۬نَا هٰذَا مِنْ قَبْلُ اِنْ هٰذَٓا اِلَّٓا اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ83
यह वादा तो हमसे और इससे पहले हमारे बाप-दादा से होता आ रहा है। कुछ नहीं, यह तो बस अगलों की कहानियाँ है।"
قُلْ لِمَنِ الْاَرْضُ وَمَنْ ف۪يهَٓا اِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ84
कहो, "यह धरती और जो भी इसमें आबाद है, वे किसके है, बताओ यदि तुम जानते हो?"
سَيَقُولُونَ لِلّٰهِۜ قُلْ اَفَلَا تَذَكَّرُونَ85
वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह के!" कहो, "फिर तुम होश में क्यों नहीं आते?"
قُلْ مَنْ رَبُّ السَّمٰوَاتِ السَّبْعِ وَرَبُّ الْعَرْشِ الْعَظ۪يمِ86
कहो, "सातों आकाशों का मालिक और महान राजासन का स्वामीकौन है?"
سَيَقُولُونَ لِلّٰهِۜ قُلْ اَفَلَا تَتَّقُونَ87
वे कहेंगे, "सब अल्लाह के है।" कहो, "फिर डर क्यों नहीं रखते?"
قُلْ مَنْ بِيَدِه۪ مَلَكُوتُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ يُج۪يرُ وَلَا يُجَارُ عَلَيْهِ اِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ88
कहो, "हर चीज़ की बादशाही किसके हाथ में है, वह जो शरण देता है औऱ जिसके मुक़ाबले में कोई शरण नहीं मिल सकती, बताओ यजि तुम जानते हो?"
سَيَقُولُونَ لِلّٰهِۜ قُلْ فَاَنّٰى تُسْحَرُونَ89
वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह की।" कहो, "फिर कहाँ से तुमपर जादू चल जाता है?"
بَلْ اَتَيْنَاهُمْ بِالْحَقِّ وَاِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ90
नहीं, बल्कि हम उनके पास सत्य लेकर आए है और निश्चय ही वे झूठे है
مَا اتَّخَذَ اللّٰهُ مِنْ وَلَدٍ وَمَا كَانَ مَعَهُ مِنْ اِلٰهٍ اِذًا لَذَهَبَ كُلُّ اِلٰهٍ بِمَا خَلَقَ وَلَعَلَا بَعْضُهُمْ عَلٰى بَعْضٍۜ سُبْحَانَ اللّٰهِ عَمَّا يَصِفُونَۙ91
अल्लाह ने अपना कोई बेटा नहीं बनाया और न उसके साथ कोई अन्य पूज्य-प्रभु है। ऐसा होता तो प्रत्येक पूज्य-प्रभु अपनी सृष्टि को लेकर अलग हो जाता और उनमें से एक-दूसरे पर चढ़ाई कर देता। महान और उच्च है अल्लाह उन बातों से, जो वे बयान करते है;
عَالِمِ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَتَعَالٰى عَمَّا يُشْرِكُونَ۟92
जाननेवाला है छुपे और खुले का। सो वह उच्चतर है वह शिर्क से जो वे करते है!
قُلْ رَبِّ اِمَّا تُرِيَنّ۪ي مَا يُوعَدُونَۙ93
कहो, "ऐ मेरे रब! जिस चीज़ का वादा उनसे किया जा रहा है, वह यदि तू मुझे दिखाए
رَبِّ فَلَا تَجْعَلْن۪ي فِي الْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَ94
तो मेरे रब! मुझे उन अत्याचारी लोगों में सम्मिलित न करना।"
وَاِنَّا عَلٰٓى اَنْ نُرِيَكَ مَا نَعِدُهُمْ لَقَادِرُونَ95
निश्चय ही हमें इसकी सामर्थ्य प्राप्त है कि हम उनसे जो वादा कर रहे है, वह तुम्हें दिखा दें।
اِدْفَعْ بِالَّت۪ي هِيَ اَحْسَنُ السَّيِّئَةَۜ نَحْنُ اَعْلَمُ بِمَا يَصِفُونَ96
बुराई को उस ढंग से दूर करो, जो सबसे उत्तम हो। हम भली-भाँति जानते है जो कुछ बातें वे बनाते है
وَقُلْ رَبِّ اَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاط۪ينِۙ97
और कहो, "ऐ मेरे रब! मैं शैतान की उकसाहटों से तेरी शरण चाहता हूँ
وَاَعُوذُ بِكَ رَبِّ اَنْ يَحْضُرُونِ98
और मेरे रब! मैं इससे भी तेरी शरण चाहता हूँ कि वे मेरे पास आएँ।" -
حَتّٰٓى اِذَا جَٓاءَ اَحَدَهُمُ الْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ارْجِعُونِۙ99
यहाँ तक कि जब उनमें से किसी की मृत्यु आ गई तो वह कहेगा, "ऐ मेरे रब! मुझे लौटा दे। - ताकि जिस (संसार) को मैं छोड़ आया हूँ
لَعَلّ۪ٓي اَعْمَلُ صَالِحًا ف۪يمَا تَرَكْتُ كَلَّاۜ اِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَٓائِلُهَاۜ وَمِنْ وَرَٓائِهِمْ بَرْزَخٌ اِلٰى يَوْمِ يُبْعَثُونَ100
उसमें अच्छा कर्म करूँ।" कुछ नहीं, यह तो बस एक (व्यर्थ) बात है जो वह कहेगा और उनके पीछे से लेकर उस दिन तक एक रोक लगी हुई है, जब वे दोबारा उठाए जाएँगे
فَاِذَا نُفِخَ فِي الصُّورِ فَلَٓا اَنْسَابَ بَيْنَهُمْ يَوْمَئِذٍ وَلَا يَتَسَٓاءَلُونَ101
फिर जब सूर (नरसिंघा) में फूँक मारी जाएगी तो उस दिन उनके बीच रिश्ते-नाते शेष न रहेंगे, और न वे एक-दूसरे को पूछेंगे
فَمَنْ ثَقُلَتْ مَوَاز۪ينُهُ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ102
फिर जिनके पलड़े भारी हुए तॊ वही हैं जो सफल।
وَمَنْ خَفَّتْ مَوَاز۪ينُهُ فَاُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ خَسِرُٓوا اَنْفُسَهُمْ ف۪ي جَهَنَّمَ خَالِدُونَۚ103
रहे वे लोग जिनके पलड़े हल्के हुए, तो वही है जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला। वे सदैव जहन्नम में रहेंगे
تَلْفَحُ وُجُوهَهُمُ النَّارُ وَهُمْ ف۪يهَا كَالِحُونَ104
आग उनके चेहरों को झुलसा देगी और उसमें उनके मुँह विकृत हो रहे होंगे
اَلَمْ تَكُنْ اٰيَات۪ي تُتْلٰى عَلَيْكُمْ فَكُنْتُمْ بِهَا تُكَذِّبُونَ105
(कहा जाएगा,) "क्या तुम्हें मेरी आयातें सुनाई नहीं जाती थी, तो तुम उन्हें झुठलाते थे?"
قَالُوا رَبَّنَا غَلَبَتْ عَلَيْنَا شِقْوَتُنَا وَكُنَّا قَوْمًا ضَٓالّ۪ينَ106
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमारा दुर्भाग्य हमपर प्रभावी हुआ और हम भटके हुए लोग थे
رَبَّنَٓا اَخْرِجْنَا مِنْهَا فَاِنْ عُدْنَا فَاِنَّا ظَالِمُونَ107
हमारे रब! हमें यहाँ से निकाल दे! फिर हम दोबारा ऐसा करें तो निश्चय ही हम अत्याचारी होंगे।"
قَالَ اخْسَؤُ۫ا ف۪يهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ108
वह कहेगा, "फिटकारे हुए तिरस्कृत, इसी में पड़े रहो और मुझसे बात न करो
اِنَّهُ كَانَ فَر۪يقٌ مِنْ عِبَاد۪ي يَقُولُونَ رَبَّنَٓا اٰمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَاَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِم۪ينَۚ109
मेरे बन्दों में कुछ लोग थे, जो कहते थे, हमारे रब! हम ईमान ले आए। अतः तू हमें क्षमा कर दे और हमपर दया कर। तू सबसे अच्छा दया करनेवाला है
فَاتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتّٰٓى اَنْسَوْكُمْ ذِكْر۪ي وَكُنْتُمْ مِنْهُمْ تَضْحَكُونَ110
तो तुमने उनका उपहास किया, यहाँ तक कि उनके कारण तुम मेरी याद को भुला बैठे और तुम उनपर हँसते रहे
اِنّ۪ي جَزَيْتُهُمُ الْيَوْمَ بِمَا صَبَرُٓواۙ اَنَّهُمْ هُمُ الْفَٓائِزُونَ111
आज मैंने उनके धैर्य का यह बदला प्रदान किया कि वही है जो सफलता को प्राप्त हुए।"
قَالَ كَمْ لَبِثْتُمْ فِي الْاَرْضِ عَدَدَ سِن۪ينَ112
वह कहेगाः “तुम धरती में कितने वर्ष रहे”?
قَالُوا لَبِثْنَا يَوْمًا اَوْ بَعْضَ يَوْمٍ فَسْـَٔلِ الْعَٓادّ۪ينَ113
वॆ कहेंगेः , "एक दिन या एक दिन का कुछ भाग। गणना करनेवालों से पूछ लीजिए।?"
قَالَ اِنْ لَبِثْتُمْ اِلَّا قَل۪يلًا لَوْ اَنَّكُمْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ114
वह कहेगा, "तुम ठहरे थोड़े ही, क्या अच्छा होता तुम जानते होते!
اَفَحَسِبْتُمْ اَنَّمَا خَلَقْنَاكُمْ عَبَثًا وَاَنَّكُمْ اِلَيْنَا لَا تُرْجَعُونَ115
तो क्या तुमने यह समझा था कि हमने तुम्हें व्यर्थ पैदा किया है और यह कि तुम्हें हमारी और लौटना नहीं है?"
فَتَعَالَى اللّٰهُ الْمَلِكُ الْحَقُّۚ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۚ رَبُّ الْعَرْشِ الْكَر۪يمِ116
तो सर्वोच्च है अल्लाह, सच्चा सम्राट! उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं, स्वामी है महिमाशाली सिंहासन का
وَمَنْ يَدْعُ مَعَ اللّٰهِ اِلٰهًا اٰخَرَۙ لَا بُرْهَانَ لَهُ بِه۪ۙ فَاِنَّمَا حِسَابُهُ عِنْدَ رَبِّه۪ۜ اِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْكَافِرُونَ117
और जो कोई अल्लाह के साथ किसी दूसरे पूज्य को पुकारे, जिसके लिए उसके पास कोई प्रमाम नहीं, तो बस उसका हिसाब उसके रब के पास है। निश्चय ही इनकार करनेवाले कभी सफल नहीं होगे
وَقُلْ رَبِّ اغْفِرْ وَارْحَمْ وَاَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِم۪ينَ118
और कहो, "मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और दया कर। तू तो सबसे अच्छा दया करनेवाला है।"