अन-नमल - कुरान पढ़ें

27अन-नमल
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
طٰسٓ۠ تِلْكَ اٰيَاتُ الْقُرْاٰنِ وَكِتَابٍ مُب۪ينٍۙ1
ता॰ सीन॰। ये आयतें है क़ुरआन और एक स्पष्ट किताब की
هُدًى وَبُشْرٰى لِلْمُؤْمِن۪ينَۙ2
मार्गदर्शन है और शुभ-सूचना उन ईमानवालों के लिए,
اَلَّذ۪ينَ يُق۪يمُونَ الصَّلٰوةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكٰوةَ وَهُمْ بِالْاٰخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَ3
जो नमाज़ का आयोजन करते है और ज़कात देते है और वही है जो आख़िरत पर विश्वास रखते है
اِنَّ الَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْاٰخِرَةِ زَيَّنَّا لَهُمْ اَعْمَالَهُمْ فَهُمْ يَعْمَهُونَۜ4
रहे वे लोग जो आख़िरत को नहीं मानते, उनके लिए हमने उनकी करतूतों को शोभायमान बना दिया है। अतः वे भटकते फिरते है
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ لَهُمْ سُٓوءُ الْعَذَابِ وَهُمْ فِي الْاٰخِرَةِ هُمُ الْاَخْسَرُونَ5
वही लोग है, जिनके लिए बुरी यातना है और वही है जो आख़िरत में अत्यन्त घाटे में रहेंगे
وَاِنَّكَ لَتُلَقَّى الْقُرْاٰنَ مِنْ لَدُنْ حَك۪يمٍ عَل۪يمٍ6
निश्चय ही तुम यह क़ुरआन एक बड़े तत्वदर्शी, ज्ञानवान (प्रभु) की ओर से पा रहे हो
اِذْ قَالَ مُوسٰى لِاَهْلِه۪ٓ اِنّ۪ٓي اٰنَسْتُ نَارًاۜ سَاٰت۪يكُمْ مِنْهَا بِخَبَرٍ اَوْ اٰت۪يكُمْ بِشِهَابٍ قَبَسٍ لَعَلَّكُمْ تَصْطَلُونَ7
याद करो जब मूसा ने अपने घरवालों से कहा कि "मैंने एक आग-सी देखी है। मैं अभी वहाँ से तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आता हूँ या तुम्हारे पास कोई दहकता अंगार लाता हूँ, ताकि तुम तापो।"
فَلَمَّا جَٓاءَهَا نُودِيَ اَنْ بُورِكَ مَنْ فِي النَّارِ وَمَنْ حَوْلَهَاۜ وَسُبْحَانَ اللّٰهِ رَبِّ الْعَالَم۪ينَ8
फिर जब वह उसके पास पहुँचा तो उसे आवाज़ आई कि "मुबारक है वह जो इस आग में है और जो इसके आस-पास है। महान और उच्च है अल्लाह, सारे संसार का रब!
يَا مُوسٰٓى اِنَّهُٓ اَنَا۬ اللّٰهُ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُۙ9
ऐ मूसा! वह तो मैं अल्लाह हूँ, अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी!
وَاَلْقِ عَصَاكَۜ فَلَمَّا رَاٰهَا تَهْتَزُّ كَاَنَّهَا جَٓانٌّ وَلّٰى مُدْبِرًا وَلَمْ يُعَقِّبْۜ يَا مُوسٰى لَا تَخَفْ اِنّ۪ي لَا يَخَافُ لَدَيَّ الْمُرْسَلُونَۗ10
तू अपनी लाठी डाल दे।" जब मूसा ने देखा कि वह बल खा रहा है जैसे वह कोई साँप हो, तो वह पीठ फेरकर भागा और पीछे मुड़कर न देखा। "ऐ मूसा! डर मत। निस्संदेह रसूल मेरे पास डरा नहीं करते,
اِلَّا مَنْ ظَلَمَ ثُمَّ بَدَّلَ حُسْنًا بَعْدَ سُٓوءٍ فَاِنّ۪ي غَفُورٌ رَح۪يمٌ11
सिवाय उसके जिसने कोई ज़्यादती की हो। फिर बुराई के पश्चात उसे भलाई से बदल दिया, तो मैं भी बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान हूँ
وَاَدْخِلْ يَدَكَ ف۪ي جَيْبِكَ تَخْرُجْ بَيْضَٓاءَ مِنْ غَيْرِ سُٓوءٍ ف۪ي تِسْعِ اٰيَاتٍ اِلٰى فِرْعَوْنَ وَقَوْمِه۪ۜ اِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا فَاسِق۪ينَ12
अपना हाथ गिरेबान में डाल। वह बिना किसी ख़राबी के उज्जवल चमकता निकलेगा। ये नौ निशानियों में से है फ़िरऔन और उसकी क़ौम की ओर भेजने के लिए। निश्चय ही वे अवज्ञाकारी लोग है।"
فَلَمَّا جَٓاءَتْهُمْ اٰيَاتُنَا مُبْصِرَةً قَالُوا هٰذَا سِحْرٌ مُب۪ينٌۚ13
किन्तु जब आँखें खोल देनेवाली हमारी निशानियाँ उनके पास आई तो उन्होंने कहा, "यह तो खुला हुआ जादू है।"
وَجَحَدُوا بِهَا وَاسْتَيْقَنَتْهَٓا اَنْفُسُهُمْ ظُلْمًا وَعُلُوًّاۜ فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُفْسِد۪ينَ۟14
उन्होंने ज़ुल्म और सरकशी से उनका इनकार कर दिया, हालाँकि उनके जी को उनका विश्वास हो चुका था। अब देख लो इन बिगाड़ पैदा करनेवालों का क्या परिणाम हुआ?
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا دَاوُ۫دَ وَسُلَيْمٰنَ عِلْمًاۚ وَقَالَا الْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذ۪ي فَضَّلَنَا عَلٰى كَث۪يرٍ مِنْ عِبَادِهِ الْمُؤْمِن۪ينَ15
हमने दाऊद और सुलैमान को बड़ा ज्ञान प्रदान किया था, (उन्होंने उसके महत्व को जाना) और उन दोनों ने कहा, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमें अपने बहुत-से ईमानवाले बन्दों के मुक़ाबले में श्रेष्ठता प्रदान की।"
وَوَرِثَ سُلَيْمٰنُ دَاوُ۫دَ وَقَالَ يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ عُلِّمْنَا مَنْطِقَ الطَّيْرِ وَاُو۫ت۪ينَا مِنْ كُلِّ شَيْءٍۜ اِنَّ هٰذَا لَهُوَ الْفَضْلُ الْمُب۪ينُ16
दाऊद का उत्तराधिकारी सुलैमान हुआ औऱ उसने कहा, "ऐ लोगों! हमें पक्षियों की बोली सिखाई गई है और हमें हर चीज़ दी गई है। निस्संदेह वह स्पष्ट बड़ाई है।"
وَحُشِرَ لِسُلَيْمٰنَ جُنُودُهُ مِنَ الْجِنِّ وَالْاِنْسِ وَالطَّيْرِ فَهُمْ يُوزَعُونَ17
सुलैमान के लिए जिन्न और मनुष्य और पक्षियों मे से उसकी सेनाएँ एकत्र कर गई फिर उनकी दर्जाबन्दी की जा रही थी
حَتّٰٓى اِذَٓا اَتَوْا عَلٰى وَادِ النَّمْلِۙ قَالَتْ نَمْلَةٌ يَٓا اَيُّهَا النَّمْلُ ادْخُلُوا مَسَاكِنَكُمْۚ لَا يَحْطِمَنَّكُمْ سُلَيْمٰنُ وَجُنُودُهُۙ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ18
यहाँ तक कि जब वे चींटियों की घाटी में पहुँचे तो एक चींटी ने कहा, "ऐ चींटियों! अपने घरों में प्रवेश कर जाओ। कहीं सुलैमान और उसकी सेनाएँ तुम्हें कुचल न डालें और उन्हें एहसास भी न हो।"
فَتَبَسَّمَ ضَاحِكًا مِنْ قَوْلِهَا وَقَالَ رَبِّ اَوْزِعْن۪ٓي اَنْ اَشْكُرَ نِعْمَتَكَ الَّت۪ٓي اَنْعَمْتَ عَلَيَّ وَعَلٰى وَالِدَيَّ وَاَنْ اَعْمَلَ صَالِحًا تَرْضٰيهُ وَاَدْخِلْن۪ي بِرَحْمَتِكَ ف۪ي عِبَادِكَ الصَّالِح۪ينَ19
तो वह उसकी बात पर प्रसन्न होकर मुस्कराया और कहा, "मेरे रब! मुझे संभाले रख कि मैं तेरी उस कृपा पर कृतज्ञता दिखाता रहूँ जो तूने मुझपर और मेरे माँ-बाप पर की है। और यह कि अच्छा कर्म करूँ जो तुझे पसन्द आए और अपनी दयालुता से मुझे अपने अच्छे बन्दों में दाखिल कर।"
وَتَفَقَّدَ الطَّيْرَ فَقَالَ مَا لِيَ لَٓا اَرَى الْهُدْهُدَۘ اَمْ كَانَ مِنَ الْغَٓائِب۪ينَ20
उसने पक्षियों की जाँच-पड़ताल की तो कहा, "क्या बात है कि मैं हुदहुद को नहीं देख रहा हूँ, (वह यहीं कहीं है) या ग़ायब हो गया है?
لَاُعَذِّبَنَّهُ عَذَابًا شَد۪يدًا اَوْ لَا۬اَذْبَحَنَّهُٓ اَوْ لَيَاْتِيَنّ۪ي بِسُلْطَانٍ مُب۪ينٍ21
मैं उसे कठोर दंड दूँगा या उसे ज़बह ही कर डालूँगा या फिर वह मेरे सामने कोई स्पष्ट॥ कारण प्रस्तुत करे।"
فَمَكَثَ غَيْرَ بَع۪يدٍ فَقَالَ اَحَطْتُ بِمَا لَمْ تُحِطْ بِه۪ وَجِئْتُكَ مِنْ سَبَاٍ بِنَبَاٍ يَق۪ينٍ22
फिर कुछ अधिक देर नहीं ठहरा कि उसने आकर कहा, "मैंने वह जानकारी प्राप्त की है जो आपको मालूम नहीं है। मैं सबा से आपके पास एक विश्वसनीय सूचना लेकर आया हूँ
اِنّ۪ي وَجَدْتُ امْرَاَةً تَمْلِكُهُمْ وَاُو۫تِيَتْ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ وَلَهَا عَرْشٌ عَظ۪يمٌ23
मैंने एक स्त्री को उनपर शासन करते पाया है। उसे हर चीज़ प्राप्त है औऱ उसका एक बड़ा सिंहासन है
وَجَدْتُهَا وَقَوْمَهَا يَسْجُدُونَ لِلشَّمْسِ مِنْ دُونِ اللّٰهِ وَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ اَعْمَالَهُمْ فَصَدَّهُمْ عَنِ السَّب۪يلِ فَهُمْ لَا يَهْتَدُونَۙ24
मैंने उसे और उसकी क़ौम के लोगों को अल्लाह से इतर सूर्य को सजदा करते हुए पाया। शैतान ने उनके कर्मों को उनके लिए शोभायमान बना दिया है और उन्हें मार्ग से रोक दिया है - अतः वे सीधा मार्ग नहीं पा रहे है। -
اَلَّا يَسْجُدُوا لِلّٰهِ الَّذ۪ي يُخْرِجُ الْخَبْءَ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَيَعْلَمُ مَا تُخْفُونَ وَمَا تُعْلِنُونَ25
खि अल्लाह को सजदा न करें जो आकाशों और धरती की छिपी चीज़ें निकालता है, और जानता है जो कुछ भी तुम छिपाते हो और जो कुछ प्रकट करते हो
اَللّٰهُ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظ۪يمِ26
अल्लाह कि उसके सिवा कोई इष्ट -पूज्य नहीं, वह महान सिंहासन का रब है।"
قَالَ سَنَنْظُرُ اَصَدَقْتَ اَمْ كُنْتَ مِنَ الْكَاذِب۪ينَ27
उसने कहा, "अभी हम देख लेते है कि तूने सच कहा या तू झूठा है
اِذْهَبْ بِكِتَاب۪ي هٰذَا فَاَلْقِهْ اِلَيْهِمْ ثُمَّ تَوَلَّ عَنْهُمْ فَانْظُرْ مَاذَا يَرْجِعُونَ28
मेरा यह पत्र लेकर जा, और इसे उन लोगों की ओर डाल दे। फिर उनके पास से अलग हटकर देख कि वे क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करते है।"
قَالَتْ يَٓا اَيُّهَا الْمَلَؤُ۬ا اِنّ۪ٓي اُلْقِيَ اِلَيَّ كِتَابٌ كَر۪يمٌ29
वह बोली, "ऐ सरदारों! मेरी ओर एक प्रतिष्ठित पत्र डाला गया है
اِنَّهُ مِنْ سُلَيْمٰنَ وَاِنَّهُ بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّح۪يمِۙ30
वह सुलैमान की ओर से है और वह यह है कि अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है
اَلَّا تَعْلُوا عَلَيَّ وَاْتُون۪ي مُسْلِم۪ينَ۟31
यह कि मेरे मुक़ाबले में सरकशी न करो और आज्ञाकारी बनकर मेरे पास आओ।"
قَالَتْ يَٓا اَيُّهَا الْمَلَؤُ۬ا اَفْتُون۪ي ف۪ٓي اَمْر۪يۚ مَا كُنْتُ قَاطِعَةً اَمْرًا حَتّٰى تَشْهَدُونِ32
उसने कहा, "ऐ सरदारों! मेरे मामलें में मुझे परामर्श दो। मैं किसी मामले का फ़ैसला नहीं करती, जब तक कि तुम मेरे पास मौजूद न हो।"
قَالُوا نَحْنُ اُو۬لُوا قُوَّةٍ وَاُو۬لُوا بَاْسٍ شَد۪يدٍ وَالْاَمْرُ اِلَيْكِ فَانْظُر۪ي مَاذَا تَاْمُر۪ينَ33
उन्होंने कहा, "हम शक्तिशाली है और हमें बड़ी युद्ध-क्षमता प्राप्त है। आगे मामले का अधिकार आपको है, अतः आप देख लें कि आपको क्या आदेश देना है।"
قَالَتْ اِنَّ الْمُلُوكَ اِذَا دَخَلُوا قَرْيَةً اَفْسَدُوهَا وَجَعَلُٓوا اَعِزَّةَ اَهْلِهَٓا اَذِلَّةًۚ وَكَذٰلِكَ يَفْعَلُونَ34
उसने कहा, "सम्राट जब किसी बस्ती में प्रवेश करते है, तो उसे ख़राब कर देते है और वहाँ के प्रभावशाली लोगों को अपमानित करके रहते है। और वे ऐसा ही करेंगे
وَاِنّ۪ي مُرْسِلَةٌ اِلَيْهِمْ بِهَدِيَّةٍ فَنَاظِرَةٌ بِمَ يَرْجِعُ الْمُرْسَلُونَ35
मैं उनके पास एक उपहार भेजती हूँ; फिर देखती हूँ कि दूत क्या उत्तर लेकर लौटते है।"
فَلَمَّا جَٓاءَ سُلَيْمٰنَ قَالَ اَتُمِدُّونَنِ بِمَالٍۘ فَمَٓا اٰتٰينِ‌يَ اللّٰهُ خَيْرٌ مِمَّٓا اٰتٰيكُمْۚ بَلْ اَنْتُمْ بِهَدِيَّتِكُمْ تَفْرَحُونَ36
फिर जब वह सुलैमान के पास पहुँचा तो उसने (सुलैमान ने) कहा, "क्या तुम माल से मेरी सहायता करोगे, तो जो कुछ अल्लाह ने मुझे दिया है वह उससे कहीं उत्तम है, जो उसने तुम्हें दिया है? बल्कि तुम्ही लोग हो जो अपने उपहार से प्रसन्न होते हो!
اِرْجِعْ اِلَيْهِمْ فَلَنَاْتِيَنَّهُمْ بِجُنُودٍ لَا قِبَلَ لَهُمْ بِهَا وَلَنُخْرِجَنَّهُمْ مِنْهَٓا اَذِلَّةً وَهُمْ صَاغِرُونَ37
उनके पास वापस जाओ। हम उनपर ऐसी सेनाएँ लेकर आएँगे, जिनका मुक़ाबला वे न कर सकेंगे और हम उन्हें अपमानित करके वहाँ से निकाल देंगे कि वे पस्त होकर रहेंगे।"
قَالَ يَٓا اَيُّهَا الْمَلَؤُ۬ا اَيُّكُمْ يَاْت۪ين۪ي بِعَرْشِهَا قَبْلَ اَنْ يَاْتُون۪ي مُسْلِم۪ينَ38
उसने (सुलैमान ने) कहा, "ऐ सरदारो! तुममें कौन उसका सिंहासन लेकर मेरे पास आता है, इससे पहले कि वे लोग आज्ञाकारी होकर मेरे पास आएँ?"
قَالَ عِفْر۪يتٌ مِنَ الْجِنِّ اَنَا۬ اٰت۪يكَ بِه۪ قَبْلَ اَنْ تَقُومَ مِنْ مَقَامِكَۚ وَاِنّ۪ي عَلَيْهِ لَقَوِيٌّ اَم۪ينٌ39
जिन्नों में से एक बलिष्ठ निर्भीक ने कहा, "मैं उसे आपके पास ले आऊँगा। इससे पहले कि आप अपने स्थान से उठे। मुझे इसकी शक्ति प्राप्त है और मैं अमानतदार भी हूँ।"
قَالَ الَّذ۪ي عِنْدَهُ عِلْمٌ مِنَ الْكِتَابِ اَنَا۬ اٰت۪يكَ بِه۪ قَبْلَ اَنْ يَرْتَدَّ اِلَيْكَ طَرْفُكَۜ فَلَمَّا رَاٰهُ مُسْتَقِرًّا عِنْدَهُ قَالَ هٰذَا مِنْ فَضْلِ رَبّ۪ي۠ لِيَبْلُوَن۪ٓي ءَاَشْكُرُ اَمْ اَكْفُرُۜ وَمَنْ شَكَرَ فَاِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِه۪ۚ وَمَنْ كَفَرَ فَاِنَّ رَبّ۪ي غَنِيٌّ كَر۪يمٌ40
जिस व्यक्ति के पास किताब का ज्ञान था, उसने कहा, "मैं आपकी पलक झपकने से पहले उसे आपके पास लाए देता हूँ।" फिर जब उसने उसे अपने पास रखा हुआ देखा तो कहा, "यह मेरे रब का उदार अनुग्रह है, ताकि वह मेरी परीक्षा करे कि मैं कृतज्ञता दिखाता हूँ या कृतघ्न बनता हूँ। जो कृतज्ञता दिखलाता है तो वह अपने लिए ही कृतज्ञता दिखलाता है और वह जिसने कृतघ्नता दिखाई, तो मेरा रब निश्चय ही निस्पृह, बड़ा उदार है।"
قَالَ نَكِّرُوا لَهَا عَرْشَهَا نَنْظُرْ اَتَهْتَد۪ٓي اَمْ تَكُونُ مِنَ الَّذ۪ينَ لَا يَهْتَدُونَ41
उसने कहा, "उसके पास उसके सिंहासन का रूप बदल दो। देंखे वह वास्तविकता को पा लेती है या उन लोगों में से होकर रह जाती है, जो वास्तविकता को पा लेती है या उन लोगों में से होकर जाती है, जो वास्तविकता को पा लेती है या उन लोगों में से होकर रह जाती है, जो वास्तविकता को नहीं पाते।"
فَلَمَّا جَٓاءَتْ ق۪يلَ اَهٰكَذَا عَرْشُكِۜ قَالَتْ كَاَنَّهُ هُوَۚ وَاُو۫ت۪ينَا الْعِلْمَ مِنْ قَبْلِهَا وَكُنَّا مُسْلِم۪ينَ42
जब वह आई तो कहा गया, "क्या तुम्हारा सिंहासन ऐसा ही है?" उसने कहा, "यह तो जैसे वही है, और हमें तो इससे पहले ही ज्ञान प्राप्त हो चुका था; और हम आज्ञाकारी हो गए थे।"
وَصَدَّهَا مَا كَانَتْ تَعْبُدُ مِنْ دُونِ اللّٰهِۜ اِنَّهَا كَانَتْ مِنْ قَوْمٍ كَافِر۪ينَ43
अल्लाह से हटकर वह दूसरे को पूजती थी। इसी चीज़ ने उसे रोक रखा था। निस्संदेह वह एक इनकार करनेवाली क़ौम में से थी
ق۪يلَ لَهَا ادْخُلِي الصَّرْحَۚ فَلَمَّا رَاَتْهُ حَسِبَتْهُ لُجَّةً وَكَشَفَتْ عَنْ سَاقَيْهَاۜ قَالَ اِنَّهُ صَرْحٌ مُمَرَّدٌ مِنْ قَوَار۪يرَۜ قَالَتْ رَبِّ اِنّ۪ي ظَلَمْتُ نَفْس۪ي وَاَسْلَمْتُ مَعَ سُلَيْمٰنَ لِلّٰهِ رَبِّ الْعَالَم۪ينَ۟44
उससे कहा गया कि "महल में प्रवेश करो।" तो जब उसने उसे देखा तो उसने उसको गहरा पानी समझा और उसने अपनी दोनों पिंडलियाँ खोल दी। उसने कहा, "यह तो शीशे से निर्मित महल है।" बोली, "ऐ मेरे रब! निश्चय ही मैंने अपने आपपर ज़ुल्म किया। अब मैंने सुलैमान के साथ अपने आपको अल्लाह के समर्पित कर दिया, जो सारे संसार का रब है।"
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَٓا اِلٰى ثَمُودَ اَخَاهُمْ صَالِحًا اَنِ اعْبُدُوا اللّٰهَ فَاِذَا هُمْ فَر۪يقَانِ يَخْتَصِمُونَ45
और समूद की ओर हमने उनके भाई सालेह को भेजा कि "अल्लाह की बन्दगी करो।" तो क्या देखते है कि वे दो गिरोह होकर आपस में झगड़ने लगे
قَالَ يَا قَوْمِ لِمَ تَسْتَعْجِلُونَ بِالسَّيِّئَةِ قَبْلَ الْحَسَنَةِۚ لَوْلَا تَسْتَغْفِرُونَ اللّٰهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ46
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों, तुम भलाई से पहले बुराई के लिए क्यों जल्दी मचा रहे हो? तुम अल्लाह से क्षमा याचना क्यों नहीं करते? कदाचित तुमपर दया की जाए।"
قَالُوا اطَّيَّرْنَا بِكَ وَبِمَنْ مَعَكَۜ قَالَ طَٓائِرُكُمْ عِنْدَ اللّٰهِ بَلْ اَنْتُمْ قَوْمٌ تُفْتَنُونَ47
उन्होंने कहा, "हमने तुम्हें और तुम्हारे साथवालों को अपशकुन पाया है।" उसने कहा, "तुम्हारा शकुन-अपशकुन तो अल्लाह के पास है, बल्कि बात यह है कि तुम लोग आज़माए जा रहे हो।"
وَكَانَ فِي الْمَد۪ينَةِ تِسْعَةُ رَهْطٍ يُفْسِدُونَ فِي الْاَرْضِ وَلَا يُصْلِحُونَ48
नगर में नौ जत्थेदार थे जो धरती में बिगाड़ पैदा करते थे, सुधार का काम नहीं करते थे
قَالُوا تَقَاسَمُوا بِاللّٰهِ لَنُبَيِّتَنَّهُ وَاَهْلَهُ ثُمَّ لَنَقُولَنَّ لِوَلِيِّه۪ مَا شَهِدْنَا مَهْلِكَ اَهْلِه۪ وَاِنَّا لَصَادِقُونَ49
वे आपस में अल्लाह की क़समें खाकर बोले, "हम अवश्य उसपर और उसके घरवालों पर रात को छापा मारेंगे। फिर उसके वली (परिजन) से कह देंगे कि हम उसके घरवालों के विनाश के अवसर पर मौजूद न थे। और हम बिलकुल सच्चे है।"
وَمَكَرُوا مَكْرًا وَمَكَرْنَا مَكْرًا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ50
वे एक चाल चले और हमने भी एक चाल चली और उन्हें ख़बर तक न हुई
فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ مَكْرِهِمْۙ اَنَّا دَمَّرْنَاهُمْ وَقَوْمَهُمْ اَجْمَع۪ينَ51
अब देख लो, उनकी चाल का कैसा परिणाम हुआ! हमने उन्हें और उनकी क़ौम - सबको विनष्ट करके रख दिया
فَتِلْكَ بُيُوتُهُمْ خَاوِيَةً بِمَا ظَلَمُواۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَةً لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ52
अब ये उनके घर उनके ज़ुल्म के कारण उजडें पड़े हुए है। निश्चय ही इसमें एक बड़ी निशानी है उन लोगों के लिए जो जानना चाहें
وَاَنْجَيْنَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ53
और हमने उन लोगों को बचा लिया, जो ईमान लाए और डर रखते थे
وَلُوطًا اِذْ قَالَ لِقَوْمِه۪ٓ اَتَاْتُونَ الْفَاحِشَةَ وَاَنْتُمْ تُبْصِرُونَ54
और लूत को भी भेजा, जब उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "क्या तुम आँखों देखते हुए अश्लील कर्म करते हो?
اَئِنَّكُمْ لَتَاْتُونَ الرِّجَالَ شَهْوَةً مِنْ دُونِ النِّسَٓاءِۜ بَلْ اَنْتُمْ قَوْمٌ تَجْهَلُونَ55
क्या तुम स्त्रियों को छोड़कर अपनी काम-तृप्ति के लिए पुरुषों के पास जाते हो? बल्कि बात यह है कि तुम बड़े ही जाहिल लोग हो।"
فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِه۪ٓ اِلَّٓا اَنْ قَالُٓوا اَخْرِجُٓوا اٰلَ لُوطٍ مِنْ قَرْيَتِكُمْۚ اِنَّهُمْ اُنَاسٌ يَتَطَهَّرُونَ56
परन्तु उसकी क़ौम के लोगों का उत्तर इसके सिवा कुछ न था कि उन्होंने कहा, "निकाल बाहर करो लूत के घरवालों को अपनी बस्ती से। ये लोग सुथराई को बहुत पसन्द करते है!"
فَاَنْجَيْنَاهُ وَاَهْلَهُٓ اِلَّا امْرَاَتَهُۘ قَدَّرْنَاهَا مِنَ الْغَابِر۪ينَ57
अन्ततः हमने उसे और उसके घरवालों को बचा लिया सिवाय उसकी स्त्री के। उसके लिए हमने नियत कर दिया था कि वह पीछे रह जानेवालों में से होगी
وَاَمْطَرْنَا عَلَيْهِمْ مَطَرًاۚ فَسَٓاءَ مَطَرُ الْمُنْذَر۪ينَ۟58
और हमने उनपर एक बरसात बरसाई और वह बहुत ही बुरी बरसात था उन लोगों के हक़ में, जिन्हें सचेत किया जा चुका था
قُلِ الْحَمْدُ لِلّٰهِ وَسَلَامٌ عَلٰى عِبَادِهِ الَّذ۪ينَ اصْطَفٰىۜ آٰللّٰهُ خَيْرٌ اَمَّا يُشْرِكُونَۜ59
कहो, "प्रशंसा अल्लाह के लिए है और सलाम है उनके उन बन्दों पर जिन्हें उसने चुन लिया। क्या अल्लाह अच्छा है या वे जिन्हें वे साझी ठहरा रहे है?
اَمَّنْ خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَاَنْزَلَ لَكُمْ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءًۚ فَاَنْبَتْنَا بِه۪ حَدَٓائِقَ ذَاتَ بَهْجَةٍۚ مَا كَانَ لَكُمْ اَنْ تُنْبِتُوا شَجَرَهَاۜ ءَاِلٰهٌ مَعَ اللّٰهِۜ بَلْ هُمْ قَوْمٌ يَعْدِلُونَۜ60
(तुम्हारे पूज्य अच्छे है) या वह जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया और तुम्हारे लिए आकाश से पानी बरसाया; उसके द्वारा हमने रमणीय उद्यान उगाए? तुम्हारे लिए सम्भव न था कि तुम उनके वृक्षों को उगाते। - क्या अल्लाह के साथ कोई और प्रभु-पूज्य है? नहीं, बल्कि वही लोग मार्ग से हटकर चले जा रहे है!
اَمَّنْ جَعَلَ الْاَرْضَ قَرَارًا وَجَعَلَ خِلَالَهَٓا اَنْهَارًا وَجَعَلَ لَهَا رَوَاسِيَ وَجَعَلَ بَيْنَ الْبَحْرَيْنِ حَاجِزًاۜ ءَاِلٰهٌ مَعَ اللّٰهِۜ بَلْ اَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَۜ61
या वह जिसने धरती को ठहरने का स्थान बनाया और उसके बीच-बीच में नदियाँ बहाई और उसके लिए मज़बूत पहाड़ बनाए और दो समुद्रों के बीच एक रोक लगा दी। क्या अल्लाह के साथ कोई और प्रभु पूज्य है? नहीं, उनमें से अधिकतर लोग जानते ही नही!
اَمَّنْ يُج۪يبُ الْمُضْطَرَّ اِذَا دَعَاهُ وَيَكْشِفُ السُّٓوءَ وَيَجْعَلُكُمْ خُلَفَٓاءَ الْاَرْضِۜ ءَاِلٰهٌ مَعَ اللّٰهِۜ قَل۪يلًا مَا تَذَكَّرُونَۜ62
या वह जो व्यग्र की पुकार सुनता है, जब वह उसे पुकारे और तकलीफ़ दूर कर देता है और तुम्हें धरती में अधिकारी बनाता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और पूज्य-प्रभु है? तुम ध्यान थोड़े ही देते हो
اَمَّنْ يَهْد۪يكُمْ ف۪ي ظُلُمَاتِ الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَمَنْ يُرْسِلُ الرِّيَاحَ بُشْرًا بَيْنَ يَدَيْ رَحْمَتِه۪ۜ ءَاِلٰهٌ مَعَ اللّٰهِۜ تَعَالَى اللّٰهُ عَمَّا يُشْرِكُونَۜ63
या वह जो थल और जल के अँधेरों में तुम्हारा मार्गदर्शन करता है और जो अपनी दयालुता के आगे हवाओं को शुभ-सूचना बनाकर भेजता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और प्रभु पूज्य है? उच्च है अल्लाह, उस शिर्क से जो वे करते है
اَمَّنْ يَبْدَؤُا الْخَلْقَ ثُمَّ يُع۪يدُهُ وَمَنْ يَرْزُقُكُمْ مِنَ السَّمَٓاءِ وَالْاَرْضِۜ ءَاِلٰهٌ مَعَ اللّٰهِۜ قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ64
या वह जो सृष्टि का आरम्भ करता है, फिर उसकी पुनरावृत्ति भी करता है, और जो तुमको आकाश और धरती से रोज़ी देता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और प्रभ पूज्य है? कहो, "लाओ अपना प्रमाण, यदि तुम सच्चे हो।"
قُلْ لَا يَعْلَمُ مَنْ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ الْغَيْبَ اِلَّا اللّٰهُۜ وَمَا يَشْعُرُونَ اَيَّانَ يُبْعَثُونَ65
कहो, "आकाशों और धरती में जो भी है, अल्लाह के सिवा किसी को भी परोक्ष का ज्ञान नहीं है। और न उन्हें इसकी चेतना प्राप्त है कि वे कब उठाए जाएँगे।"
بَلِ ادَّارَكَ عِلْمُهُمْ فِي الْاٰخِرَةِ۠ بَلْ هُمْ ف۪ي شَكٍّ مِنْهَا۠ بَلْ هُمْ مِنْهَا عَمُونَ۟66
बल्कि आख़िरत के विषय में उनका ज्ञान पक्का हो गया है, बल्कि ये उसकी ओर से कुछ संदेह में है, बल्कि वे उससे अंधे है
وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا ءَاِذَا كُنَّا تُرَابًا وَاٰبَٓاؤُ۬نَٓا اَئِنَّا لَمُخْرَجُونَ67
जिन लोगों ने इनकार किया वे कहते है कि "क्या जब हम मिट्टी हो जाएँगे और हमारे बाप-दादा भी, तो क्या वास्तव में हम (जीवित करके) निकाले जाएँगे?
لَقَدْ وُعِدْنَا هٰذَا نَحْنُ وَاٰبَٓاؤُ۬نَا مِنْ قَبْلُۙ اِنْ هٰذَٓا اِلَّٓا اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ68
इसका वादा तो इससे पहले भी किया जा चुका है, हमसे भी और हमारे बाप-दादा से भी। ये तो बस पहले लोगो की कहानियाँ है।"
قُلْ س۪يرُوا فِي الْاَرْضِ فَانْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُجْرِم۪ينَ69
कहो कि "धरती में चलो-फिरो और देखो कि अपराधियों का कैसा परिणाम हुआ।"
وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُنْ ف۪ي ضَيْقٍ مِمَّا يَمْكُرُونَ70
उनके प्रति शोकाकुल न हो और न उस चाल से दिल तंग हो, जो वे चल रहे है।
وَيَقُولُونَ مَتٰى هٰذَا الْوَعْدُ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ71
वे कहते है, "यह वादा कब पूरा होगा, यदि तुम सच्चे हो?"
قُلْ عَسٰٓى اَنْ يَكُونَ رَدِفَ لَكُمْ بَعْضُ الَّذ۪ي تَسْتَعْجِلُونَ72
कहो, "जिसकी तुम जल्दी मचा रहे हो बहुत सम्भव है कि उसका कोई हिस्सा तुम्हारे पीछे ही लगा हो।"
وَاِنَّ رَبَّكَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَشْكُرُونَ73
निश्चय ही तुम्हारा रब तो लोगों पर उदार अनुग्रह करनेवाला है, किन्तु उनमें से अधिकतर लोग कृतज्ञता नहीं दिखाते
وَاِنَّ رَبَّكَ لَيَعْلَمُ مَا تُكِنُّ صُدُورُهُمْ وَمَا يُعْلِنُونَ74
निश्चय ही तुम्हारा रह भली-भाँति जानता है, जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए है और जो कुछ वे प्रकट करते है।
وَمَا مِنْ غَٓائِبَةٍ فِي السَّمَٓاءِ وَالْاَرْضِ اِلَّا ف۪ي كِتَابٍ مُب۪ينٍ75
आकाश और धरती में छिपी कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जो एक स्पष्ट किताब में मौजूद न हो
اِنَّ هٰذَا الْقُرْاٰنَ يَقُصُّ عَلٰى بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ اَكْثَرَ الَّذ۪ي هُمْ ف۪يهِ يَخْتَلِفُونَ76
निस्संदेह यह क़ुरआन इसराईल की सन्तान को अधिकतर ऐसी बाते खोलकर सुनाता है जिनके विषय में उनसे मतभेद है
وَاِنَّهُ لَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِلْمُؤْمِن۪ينَ77
और निस्संदह यह तो ईमानवालों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता है
اِنَّ رَبَّكَ يَقْض۪ي بَيْنَهُمْ بِحُكْمِه۪ۚ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْعَل۪يمُۚ78
निश्चय ही तुम्हारा रब उनके बीच अपने हुक्म से फ़ैसला कर देगा। वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, सर्वज्ञ है
فَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِۜ اِنَّكَ عَلَى الْحَقِّ الْمُب۪ينِ79
अतः अल्लाह पर भरोसा रखो। निश्चय ही तुम स्पष्ट सत्य पर हो
اِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتٰى وَلَا تُسْمِعُ الصُّمَّ الدُّعَٓاءَ اِذَا وَلَّوْا مُدْبِر۪ينَ80
तुम मुर्दों को नहीं सुना सकते और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हो, जबकि वे पीठ देकर फिरे भी जा रहें हो।
وَمَٓا اَنْتَ بِهَادِي الْعُمْيِ عَنْ ضَلَالَتِهِمْۜ اِنْ تُسْمِعُ اِلَّا مَنْ يُؤْمِنُ بِاٰيَاتِنَا فَهُمْ مُسْلِمُونَ81
और न तुम अंधों को उनकी गुमराही से हटाकर राह पर ला सकते हो। तुम तो बस उन्हीं को सुना सकते हो, जो हमारी आयतों पर ईमान लाना चाहें। अतः वही आज्ञाकारी होते है
وَاِذَا وَقَعَ الْقَوْلُ عَلَيْهِمْ اَخْرَجْنَا لَهُمْ دَٓابَّةً مِنَ الْاَرْضِ تُكَلِّمُهُمْۙ اَنَّ النَّاسَ كَانُوا بِاٰيَاتِنَا لَا يُوقِنُونَ۟82
और जब उनपर बात पूरी हो जाएगी, तो हम उनके लिए धरती का प्राणी सामने लाएँगे जो उनसे बातें करेगा कि "लोग हमारी आयतों पर विश्वास नहीं करते थे"
وَيَوْمَ نَحْشُرُ مِنْ كُلِّ اُمَّةٍ فَوْجًا مِمَّنْ يُكَذِّبُ بِاٰيَاتِنَا فَهُمْ يُوزَعُونَ83
और जिस दिन हम प्रत्येक समुदाय में से एक गिरोह, ऐसे लोगों का जो हमारी आयतों को झुठलाते है, घेर लाएँगे। फिर उनकी दर्जाबन्दी की जाएगी
حَتّٰٓى اِذَا جَٓاؤُ۫ قَالَ اَكَذَّبْتُمْ بِاٰيَات۪ي وَلَمْ تُح۪يطُوا بِهَا عِلْمًا اَمَّاذَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ84
यहाँ तक कि जब वे आ जाएँगे तो वह कहेगा, "क्या तुमने मेरी आयतों को झुठलाया, हालाँकि अपने ज्ञान से तुम उनपर हावी न थे या फिर तुम क्या करते थे?"
وَوَقَعَ الْقَوْلُ عَلَيْهِمْ بِمَا ظَلَمُوا فَهُمْ لَا يَنْطِقُونَ85
और बात उनपर पूरी होकर रहेगी, इसलिए कि उन्होंने ज़ुल्म किया। अतः वे कुछ बोल न सकेंगे
اَلَمْ يَرَوْا اَنَّا جَعَلْنَا الَّيْلَ لِيَسْكُنُوا ف۪يهِ وَالنَّهَارَ مُبْصِرًاۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ86
क्या उन्होंने देखा नहीं कि हमने रात को (अँधेरी) बनाया, ताकि वे उसमें शान्ति और चैन प्राप्त करें। और दिन को प्रकाशमान बनाया (कि उसमें काम करें)? निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है, जो ईमान ले आएँ
وَيَوْمَ يُنْفَخُ فِي الصُّورِ فَفَزِعَ مَنْ فِي السَّمٰوَاتِ وَمَنْ فِي الْاَرْضِ اِلَّا مَنْ شَٓاءَ اللّٰهُۜ وَكُلٌّ اَتَوْهُ دَاخِر۪ينَ87
और ख़याल करो जिस दिन सूर (नरसिंघा) में फूँक मारी जाएगी और जो आकाशों और धरती में है, घबरा उठेंगे, सिवाय उनके जिन्हें अल्लाह चाहे - और सब कान दबाए उसके समक्ष उपस्थित हो जाएँगे
وَتَرَى الْجِبَالَ تَحْسَبُهَا جَامِدَةً وَهِيَ تَمُرُّ مَرَّ السَّحَابِۜ صُنْعَ اللّٰهِ الَّذ۪ٓي اَتْقَنَ كُلَّ شَيْءٍۜ اِنَّهُ خَب۪يرٌ بِمَا تَفْعَلُونَ88
और तुम पहाड़ों को देखकर समझते हो कि वे जमे हुए है, हालाँकि वे चल रहे होंगे, जिस प्रकार बादल चलते है। यह अल्लाह की कारीगरी है, जिसने हर चीज़ को सुदृढ़ किया। निस्संदेह वह उसकी ख़बर रखता है, जो कुछ तुम करते हो
مَنْ جَٓاءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ خَيْرٌ مِنْهَاۚ وَهُمْ مِنْ فَزَعٍ يَوْمَئِذٍ اٰمِنُونَ89
जो कोई सुचरित लेकर आया उसको उससे भी अच्छा प्राप्त होगा; और ऐसे लोग घबराहट से उस दिन निश्चिन्त होंगे
وَمَنْ جَٓاءَ بِالسَّيِّئَةِ فَكُبَّتْ وُجُوهُهُمْ فِي النَّارِۜ هَلْ تُجْزَوْنَ اِلَّا مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ90
और जो कुचरित लेकर आया तो ऐसे लोगों के मुँह आग में औधे होंगे। (और उनसे कहा जाएगा) "क्या तुम उसके सिवा किसी और चीज़ का बदला पा रहे हो, जो तुम करते रहे हो?"
اِنَّمَٓا اُمِرْتُ اَنْ اَعْبُدَ رَبَّ هٰذِهِ الْبَلْدَةِ الَّذ۪ي حَرَّمَهَا وَلَهُ كُلُّ شَيْءٍۘ وَاُمِرْتُ اَنْ اَكُونَ مِنَ الْمُسْلِم۪ينَۙ91
मुझे तो बस यही आदेश मिला है कि इस नगर (मक्का) के रब की बन्दगी करूँ, जिसने इस आदरणीय ठहराया और उसी की हर चीज़ है। और मुझे आदेश मिला है कि मैं आज्ञाकारी बनकर रहूँ
وَاَنْ اَتْلُوَ۬ا الْقُرْاٰنَۚ فَمَنِ اهْتَدٰى فَاِنَّمَا يَهْتَد۪ي لِنَفْسِه۪ۚ وَمَنْ ضَلَّ فَقُلْ اِنَّمَٓا اَنَا۬ مِنَ الْمُنْذِر۪ينَ92
और यह कि क़ुरआन पढ़कर सुनाऊँ। अब जिस किसी ने संमार्ग ग्रहण किया वह अपने ही लिए संमार्ग ग्रहण करेगा। और जो पथभ्रष्टि रहा तो कह दो, "मैं तो बस एक सचेत करनेवाला ही हूँ।"
وَقُلِ الْحَمْدُ لِلّٰهِ سَيُر۪يكُمْ اٰيَاتِه۪ فَتَعْرِفُونَهَاۜ وَمَا رَبُّكَ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ93
और कहो, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है। जल्द ही वह तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखा देगा और तुम उन्हें पहचान लोगे। और तेरा रब उससे बेख़बर नहीं है, जो कुछ तुम सब कर रहे हो।"