अल-अहज़ाब - कुरान पढ़ें

33अल-अहज़ाब
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ اتَّقِ اللّٰهَ وَلَا تُطِعِ الْكَافِر۪ينَ وَالْمُنَافِق۪ينَۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ عَل۪يمًا حَك۪يمًاۙ1
ऐ नबी! अल्लाह का डर रखना और इनकार करनेवालों और कपटाचारियों का कहना न मानना। वास्तब में अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
وَاتَّبِعْ مَا يُوحٰٓى اِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَب۪يرًاۙ2
और अनुकरण करना उस चीज़ का जो तुम्हारे रब की ओर से तुम्हें प्रकाशना की जा रही है। निश्चय ही अल्लाह उसकी ख़बर रखता है जो तुम करते हो
وَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِۜ وَكَفٰى بِاللّٰهِ وَك۪يلًا3
और अल्लाह पर भरोसा रखो। और अल्लाह भरोसे के लिए काफी है
مَا جَعَلَ اللّٰهُ لِرَجُلٍ مِنْ قَلْبَيْنِ ف۪ي جَوْفِه۪ۚ وَمَا جَعَلَ اَزْوَاجَكُمُ الّٰٓـ۪ٔي تُظَاهِرُونَ مِنْهُنَّ اُمَّهَاتِكُمْۚ وَمَا جَعَلَ اَدْعِيَٓاءَكُمْ اَبْنَٓاءَكُمْۜ ذٰلِكُمْ قَوْلُكُمْ بِاَفْوَاهِكُمْۜ وَاللّٰهُ يَقُولُ الْحَقَّ وَهُوَ يَهْدِي السَّب۪يلَ4
अल्लाह ने किसी व्यक्ति के सीने में दो दिल नहीं रखे। और न उसने तुम्हारी उन पत्ऩियों को जिनसे तुम ज़िहार कर बैठते हो, वास्तव में तुम्हारी माँ बनाया, और न उसने तुम्हारे मुँह बोले बेटों को तुम्हारे वास्तविक बेटे बनाए। ये तो तुम्हारे मुँह की बातें है। किन्तु अल्लाह सच्ची बात कहता है और वही मार्ग दिखाता है
اُدْعُوهُمْ لِاٰبَٓائِهِمْ هُوَ اَقْسَطُ عِنْدَ اللّٰهِۚ فَاِنْ لَمْ تَعْلَمُٓوا اٰبَٓاءَهُمْ فَاِخْوَانُكُمْ فِي الدّ۪ينِ وَمَوَال۪يكُمْۜ وَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ ف۪يمَٓا اَخْطَاْتُمْ بِه۪ۙ وَلٰكِنْ مَا تَعَمَّدَتْ قُلُوبُكُمْۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا5
उन्हें उनके बापों का बेटा करकर पुकारो। अल्लाह के यहाँ यही अधिक न्यायसंगत बात है। और यदि तुम उनके बापों को न जानते हो, तो धर्म में वे तुम्हारे भाई तो है ही और तुम्हारे सहचर भी। इस सिलसिले में तुमसे जो ग़लती हुई हो उसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं, किन्तु जिसका संकल्प तुम्हारे दिलों ने कर लिया, उसकी बात और है। वास्तव में अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
اَلنَّبِيُّ اَوْلٰى بِالْمُؤْمِن۪ينَ مِنْ اَنْفُسِهِمْ وَاَزْوَاجُهُٓ اُمَّهَاتُهُمْۜ وَاُو۬لُوا الْاَرْحَامِ بَعْضُهُمْ اَوْلٰى بِبَعْضٍ ف۪ي كِتَابِ اللّٰهِ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُهَاجِر۪ينَ اِلَّٓا اَنْ تَفْعَلُٓوا اِلٰٓى اَوْلِيَٓائِكُمْ مَعْرُوفًاۜ كَانَ ذٰلِكَ فِي الْكِتَابِ مَسْطُورًا6
नबी का हक़ ईमानवालों पर स्वयं उनके अपने प्राणों से बढ़कर है। और उसकी पत्नियों उनकी माएँ है। और अल्लाह के विधान के अनुसार सामान्य मोमिनों और मुहाजिरों की अपेक्षा नातेदार आपस में एक-दूसरे से अधिक निकट है। यह और बात है कि तुम अपने साथियों के साथ कोई भलाई करो। यह बात किताब में लिखी हुई है
وَاِذْ اَخَذْنَا مِنَ النَّبِيّ۪نَ م۪يثَاقَهُمْ وَمِنْكَ وَمِنْ نُوحٍ وَاِبْرٰه۪يمَ وَمُوسٰى وَع۪يسَى ابْنِ مَرْيَمَۖ وَاَخَذْنَا مِنْهُمْ م۪يثَاقًا غَل۪يظًاۙ7
और याद करो जब हमने नबियों से वचन लिया, तुमसे भी और नूह और इबराहीम और मूसा और मरयम के बेटे ईसा से भी। इन सबसे हमने ढृढ़ वचन लिया,
لِيَسْـَٔلَ الصَّادِق۪ينَ عَنْ صِدْقِهِمْۚ وَاَعَدَّ لِلْكَافِر۪ينَ عَذَابًا اَل۪يمًا۟8
ताकि वह सच्चे लोगों से उनकी सच्चाई के बारे में पूछे। और इनकार करनेवालों के लिए तो उसने दुखद यातना तैयार कर रखी है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ اِذْ جَٓاءَتْكُمْ جُنُودٌ فَاَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ ر۪يحًا وَجُنُودًا لَمْ تَرَوْهَاۜ وَكَانَ اللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرًاۚ9
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह की उस अनुकम्पा को याद करो जो तुमपर हुई; जबकि सेनाएँ तुमपर चढ़ आई तो हमने उनपर एक हवा भेज दी और ऐसी सेनाएँ भी, जिनको तुमने देखा नहीं। और अल्लाह वह सब कुछ देखता है जो तुम करते हो
اِذْ جَٓاؤُ۫كُمْ مِنْ فَوْقِكُمْ وَمِنْ اَسْفَلَ مِنْكُمْ وَاِذْ زَاغَتِ الْاَبْصَارُ وَبَلَغَتِ الْقُلُوبُ الْحَنَاجِرَ وَتَظُنُّونَ بِاللّٰهِ الظُّنُونَا10
याद करो जब वे तुम्हारे ऊपर की ओर से और तुम्हारे नीचे की ओर से भी तुमपर चढ़ आए, और जब निगाहें टेढ़ी-तिरछी हो गई और उर (हृदय) कंठ को आ लगे। और तुम अल्लाह के बारे में तरह-तरह के गुमान करने लगे थे
هُنَالِكَ ابْتُلِيَ الْمُؤْمِنُونَ وَزُلْزِلُوا زِلْزَالًا شَد۪يدًا11
उस समय ईमानवाले आज़माए गए और पूरी तरह हिला दिए गए
وَاِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذ۪ينَ ف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ مَا وَعَدَنَا اللّٰهُ وَرَسُولُهُٓ اِلَّا غُرُورًا12
और जब कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है कहने लगे, "अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे जो वादा किया था वह तो धोखा मात्र था।"
وَاِذْ قَالَتْ طَٓائِفَةٌ مِنْهُمْ يَٓا اَهْلَ يَثْرِبَ لَا مُقَامَ لَكُمْ فَارْجِعُواۚ وَيَسْتَاْذِنُ فَر۪يقٌ مِنْهُمُ النَّبِيَّ يَقُولُونَ اِنَّ بُيُوتَنَا عَوْرَةٌ وَمَا هِيَ بِعَوْرَةٍۜ اِنْ يُر۪يدُونَ اِلَّا فِرَارًا13
और जबकि उनमें से एक गिरोह ने कहा, "ऐ यसरिबवालो, तुम्हारे लिए ठहरने का कोई मौक़ा नहीं। अतः लौट चलो।" और उनका एक गिरोह नबी से यह कहकर (वापस जाने की) अनुमति चाह रहा था कि "हमारे घर असुरक्षित है।" यद्यपि वे असुरक्षित न थे। वे तो बस भागना चाहते थे
وَلَوْ دُخِلَتْ عَلَيْهِمْ مِنْ اَقْطَارِهَا ثُمَّ سُئِلُوا الْفِتْنَةَ لَاٰتَوْهَا وَمَا تَلَبَّثُوا بِهَٓا اِلَّا يَس۪يرًا14
और यदि उसके चतुर्दिक से उनपर हमला हो जाता, फिर उस समय उनसे उपद्रव के लिए कहा जाता, तो वे ऐसा कर डालते और इसमें विलम्ब थोड़े ही करते!
وَلَقَدْ كَانُوا عَاهَدُوا اللّٰهَ مِنْ قَبْلُ لَا يُوَلُّونَ الْاَدْبَارَۜ وَكَانَ عَهْدُ اللّٰهِ مَسْؤُ۫لًا15
यद्यपि वे इससे पहले अल्लाह को वचन दे चुके थे कि वे पीठ न फेरेंगे, और अल्लाह से की गई प्रतिज्ञा के विषय में तो पूछा जाना ही है
قُلْ لَنْ يَنْفَعَكُمُ الْفِرَارُ اِنْ فَرَرْتُمْ مِنَ الْمَوْتِ اَوِ الْقَتْلِ وَاِذًا لَا تُمَتَّعُونَ اِلَّا قَل۪يلًا16
कह दो, "यदि तुम मृत्यु और मारे जाने से भागो भी तो यह भागना तुम्हारे लिए कदापि लाभप्रद न होगा। और इस हालत में भी तुम सुख थोड़े ही प्राप्त कर सकोगे।"
قُلْ مَنْ ذَا الَّذ۪ي يَعْصِمُكُمْ مِنَ اللّٰهِ اِنْ اَرَادَ بِكُمْ سُٓوءًا اَوْ اَرَادَ بِكُمْ رَحْمَةًۜ وَلَا يَجِدُونَ لَهُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ وَلِيًّا وَلَا نَص۪يرًا17
कहो, "कहो है जो तुम्हें अल्लाह से बचा सकता है, यदि वह तुम्हारी कोई बुराई चाहे या वह तुम्हारे प्रति दयालुता का इरादा करे (तो कौन है जो उसकी दयालुता को रोक सके)?" वे अल्लाह के अल्लाह के अलावा न अपना कोई निकटवर्ती समर्थक पाएँगे और न (दूर का) सहायक
قَدْ يَعْلَمُ اللّٰهُ الْمُعَوِّق۪ينَ مِنْكُمْ وَالْقَٓائِل۪ينَ لِاِخْوَانِهِمْ هَلُمَّ اِلَيْنَاۚ وَلَا يَاْتُونَ الْبَاْسَ اِلَّا قَل۪يلًاۙ18
अल्लाह तुममें से उन लोगों को भली-भाँति जानता है जो (युद्ध से) रोकते है और अपने भाइयों से कहते है, "हमारे पास आ जाओ।" और वे लड़ाई में थोड़े ही आते है, (क्योंकि वे)
اَشِحَّةً عَلَيْكُمْۚ فَاِذَا جَٓاءَ الْخَوْفُ رَاَيْتَهُمْ يَنْظُرُونَ اِلَيْكَ تَدُورُ اَعْيُنُهُمْ كَالَّذ۪ي يُغْشٰى عَلَيْهِ مِنَ الْمَوْتِۚ فَاِذَا ذَهَبَ الْخَوْفُ سَلَقُوكُمْ بِاَلْسِنَةٍ حِدَادٍ اَشِحَّةً عَلَى الْخَيْرِۜ اُو۬لٰٓئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا فَاَحْبَطَ اللّٰهُ اَعْمَالَهُمْۜ وَكَانَ ذٰلِكَ عَلَى اللّٰهِ يَس۪يرًا19
तुम्हारे साथ कृपणता से काम लेते है। अतः जब भय का समय आ जाता है, तो तुम उन्हें देखते हो कि वे तुम्हारी ओर इस प्रकार ताक रहे कि उनकी आँखें चक्कर खा रही है, जैसे किसी व्यक्ति पर मौत की बेहोशी छा रही हो। किन्तु जब भय जाता रहता है तो वे माल के लोभ में तेज़ ज़बाने तुमपर चलाते है। ऐसे लोग ईमान लाए ही नहीं। अतः अल्लाह ने उनके कर्म उनकी जान को लागू कर दिए। और यह अल्लाह के लिए बहुत सरल है
يَحْسَبُونَ الْاَحْزَابَ لَمْ يَذْهَبُواۚ وَاِنْ يَاْتِ الْاَحْزَابُ يَوَدُّوا لَوْ اَنَّهُمْ بَادُونَ فِي الْاَعْرَابِ يَسْـَٔلُونَ عَنْ اَنْبَٓائِكُمْۜ وَلَوْ كَانُوا ف۪يكُمْ مَا قَاتَلُٓوا اِلَّا قَل۪يلًا۟20
वे समझ रहे है कि (शत्रु के) सैन्य दल अभी गए नहीं हैं, और यदि वे गिरोह फिर आ जाएँ तो वे चाहेंगे कि किसी प्रकार बाहर (मरुस्थल में) बद्दु ओं के साथ हो रहें और वहीं से तुम्हारे बारे में समाचार पूछते रहे। और यदि वे तुम्हारे साथ होते भी तो लड़ाई में हिस्सा थोड़े ही लेते
لَقَدْ كَانَ لَكُمْ ف۪ي رَسُولِ اللّٰهِ اُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُوا اللّٰهَ وَالْيَوْمَ الْاٰخِرَ وَذَكَرَ اللّٰهَ كَث۪يرًاۜ21
निस्संदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है अर्थात उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अन्तिम दिन की आशा रखता हो और अल्लाह को अधिक याद करे
وَلَمَّا رَاَ الْمُؤْمِنُونَ الْاَحْزَابَۙ قَالُوا هٰذَا مَا وَعَدَنَا اللّٰهُ وَرَسُولُهُ وَصَدَقَ اللّٰهُ وَرَسُولُهُۘ وَمَا زَادَهُمْ اِلَّٓا ا۪يمَانًا وَتَسْل۪يمًاۜ22
और जब ईमानवालों ने सैन्य दलों को देखा तो वे पुकार उठे, "यह तो वही चीज़ है, जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे वादा किया था। और अल्लाह और उसके रसूल ने सच कहा था।" इस चीज़ ने उनके ईमान और आज्ञाकारिता ही को बढ़ाया
مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا اللّٰهَ عَلَيْهِۚ فَمِنْهُمْ مَنْ قَضٰى نَحْبَهُ وَمِنْهُمْ مَنْ يَنْتَظِرُۘ وَمَا بَدَّلُوا تَبْد۪يلًاۙ23
ईमानवालों के रूप में ऐसे पुरुष मौजूद है कि जो प्रतिज्ञा उन्होंने अल्लाह से की थी उसे उन्होंने सच्चा कर दिखाया। फिर उनमें से कुछ तो अपना प्रण पूरा कर चुके और उनमें से कुछ प्रतीक्षा में है। और उन्होंने अपनी बात तनिक भी नहीं बदली
لِيَجْزِيَ اللّٰهُ الصَّادِق۪ينَ بِصِدْقِهِمْ وَيُعَذِّبَ الْمُنَافِق۪ينَ اِنْ شَٓاءَ اَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ غَفُورًا رَح۪يمًاۚ24
ताकि इसके परिणामस्वरूप अल्लाह सच्चों को उनकी सच्चाई का बदला दे और कपटाचारियों को चाहे तो यातना दे या उनकी तौबा क़बूल करे। निश्चय ही अल्लाह बड़ी क्षमाशील, दयावान है
وَرَدَّ اللّٰهُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِغَيْظِهِمْ لَمْ يَنَالُوا خَيْرًاۜ وَكَفَى اللّٰهُ الْمُؤْمِن۪ينَ الْقِتَالَۜ وَكَانَ اللّٰهُ قَوِيًّا عَز۪يزًاۚ25
अल्लाह ने इनकार करनेवालों को उनके अपने क्रोध के साथ फेर दिया। वे कोई भलाई प्राप्त न कर सके। अल्लाह ने मोमिनों को युद्ध करने से बचा लिया। अल्लाह तो है ही बड़ा शक्तिवान, प्रभुत्वशाली
وَاَنْزَلَ الَّذ۪ينَ ظَاهَرُوهُمْ مِنْ اَهْلِ الْكِتَابِ مِنْ صَيَاص۪يهِمْ وَقَذَفَ ف۪ي قُلُوبِهِمُ الرُّعْبَ فَر۪يقًا تَقْتُلُونَ وَتَاْسِرُونَ فَر۪يقًاۚ26
और किताबवालों में सो जिन लोगों ने उसकी सहायता की थी, उन्हें उनकी गढ़ियों से उतार लाया। और उनके दिलों में धाक बिठा दी कि तुम एक गिरोह को जान से मारने लगे और एक गिरोह को बन्दी बनाने लगे
وَاَوْرَثَكُمْ اَرْضَهُمْ وَدِيَارَهُمْ وَاَمْوَالَهُمْ وَاَرْضًا لَمْ تَطَؤُ۫هَاۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرًا۟27
और उसने तुम्हें उनके भू-भाग और उनके घरों और उनके मालों का वारिस बना दिया और उस भू-भाग का भी जिसे तुमने पददलित नहीं किया। वास्तव में अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِاَزْوَاجِكَ اِنْ كُنْتُنَّ تُرِدْنَ الْحَيٰوةَ الدُّنْيَا وَز۪ينَتَهَا فَتَعَالَيْنَ اُمَتِّعْكُنَّ وَاُسَرِّحْكُنَّ سَرَاحًا جَم۪يلًا28
ऐ नबी! अपनी पत्नि यों से कह दो कि "यदि तुम सांसारिक जीवन और उसकी शोभा चाहती हो तो आओ, मैं तुम्हें कुछ दे-दिलाकर भली रीति से विदा कर दूँ
وَاِنْ كُنْتُنَّ تُرِدْنَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ وَالدَّارَ الْاٰخِرَةَ فَاِنَّ اللّٰهَ اَعَدَّ لِلْمُحْسِنَاتِ مِنْكُنَّ اَجْرًا عَظ۪يمًا29
"किन्तु यदि तुम अल्लाह और उसके रसूल और आख़िरत के घर को चाहती हो तो निश्चय ही अल्लाह ने तुममे से उत्तमकार स्त्रियों के लिए बड़ा प्रतिदान रख छोड़ा है।"
يَا نِسَٓاءَ النَّبِيِّ مَنْ يَاْتِ مِنْكُنَّ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ يُضَاعَفْ لَهَا الْعَذَابُ ضِعْفَيْنِۜ وَكَانَ ذٰلِكَ عَلَى اللّٰهِ يَس۪يرًا30
ऐ नबी की स्त्रियों! तुममें से जो कोई प्रत्यक्ष अनुचित कर्म करे तो उसके लिए दोहरी यातना होगी। और यह अल्लाह के लिए बहुत सरल है
وَمَنْ يَقْنُتْ مِنْكُنَّ لِلّٰهِ وَرَسُولِه۪ وَتَعْمَلْ صَالِحًا نُؤْتِهَٓا اَجْرَهَا مَرَّتَيْنِۙ وَاَعْتَدْنَا لَهَا رِزْقًا كَر۪يمًا31
किन्तु तुममें से जो अल्लाह और उसके रसूल के प्रति निष्ठापूर्वक आज्ञाकारिता की नीति अपनाए और अच्छा कर्म करे, उसे हम दोहरा प्रतिदान प्रदान करेंगे और उसके लिए हमने सम्मानपूर्ण आजीविका तैयार कर रखी है
يَا نِسَٓاءَ النَّبِيِّ لَسْتُنَّ كَاَحَدٍ مِنَ النِّسَٓاءِ اِنِ اتَّقَيْتُنَّ فَلَا تَخْضَعْنَ بِالْقَوْلِ فَيَطْمَعَ الَّذ۪ي ف۪ي قَلْبِه۪ مَرَضٌ وَقُلْنَ قَوْلًا مَعْرُوفًاۚ32
ऐ नबी की स्त्रियों! तुम सामान्य स्त्रियों में से किसी की तरह नहीं हो, यदि तुम अल्लाह का डर रखो। अतः तुम्हारी बातों में लोच न हो कि वह व्यक्ति जिसके दिल में रोग है, वह लालच में पड़ जाए। तुम सामान्य रूप से बात करो
وَقَرْنَ ف۪ي بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْاُو۫لٰى وَاَقِمْنَ الصَّلٰوةَ وَاٰت۪ينَ الزَّكٰوةَ وَاَطِعْنَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُۜ اِنَّمَا يُر۪يدُ اللّٰهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ اَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْه۪يرًاۚ33
अपने घरों में टिककर रहो और विगत अज्ञानकाल की-सी सज-धज न दिखाती फिरना। नमाज़ का आयोजन करो और ज़कात दो। और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। अल्लाह तो बस यही चाहता है कि ऐ नबी के घरवालो, तुमसे गन्दगी को दूर रखे और तुम्हें तरह पाक-साफ़ रखे
وَاذْكُرْنَ مَا يُتْلٰى ف۪ي بُيُوتِكُنَّ مِنْ اٰيَاتِ اللّٰهِ وَالْحِكْمَةِۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ لَط۪يفًا خَب۪يرًا۟34
तुम्हारे घरों में अल्लाह की जो आयतें और तत्वदर्शिता की बातें सुनाई जाती है उनकी चर्चा करती रहो। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त सूक्ष्मदर्शी, खबर रखनेवाला है
اِنَّ الْمُسْلِم۪ينَ وَالْمُسْلِمَاتِ وَالْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَالْقَانِت۪ينَ وَالْقَانِتَاتِ وَالصَّادِق۪ينَ وَالصَّادِقَاتِ وَالصَّابِر۪ينَ وَالصَّابِرَاتِ وَالْخَاشِع۪ينَ وَالْخَاشِعَاتِ وَالْمُتَصَدِّق۪ينَ وَالْمُتَصَدِّقَاتِ وَالصَّٓائِم۪ينَ وَالصَّٓائِمَاتِ وَالْحَافِظ۪ينَ فُرُوجَهُمْ وَالْحَافِظَاتِ وَالذَّاكِر۪ينَ اللّٰهَ كَث۪يرًا وَالذَّاكِرَاتِ اَعَدَّ اللّٰهُ لَهُمْ مَغْفِرَةً وَاَجْرًا عَظ۪يمًا35
मुस्लिम पुरुष और मुस्लिम स्त्रियाँ, ईमानवाले पुरुष और ईमानवाली स्त्रियाँ, निष्ठा्पूर्वक आज्ञापालन करनेवाले पुरुष और निष्ठापूर्वक आज्ञापालन करनेवाली स्त्रियाँ, सत्यवादी पुरुष और सत्यवादी स्त्रियाँ, धैर्यवान पुरुष और धैर्य रखनेवाली स्त्रियाँ, विनम्रता दिखानेवाले पुरुष और विनम्रता दिखानेवाली स्त्रियाँ, सदक़ा (दान) देनेवाले पुरुष और सदक़ा देनेवाली स्त्रियाँ, रोज़ा रखनेवाले पुरुष और रोज़ा रखनेवाली स्त्रियाँ, अपने गुप्तांगों की रक्षा करनेवाले पुरुष और रक्षा करनेवाली स्त्रियाँ और अल्लाह को अधिक याद करनेवाले पुरुष और याद करनेवाली स्त्रियाँ - इनके लिए अल्लाह ने क्षमा और बड़ा प्रतिदान तैयार कर रखा है
وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ اِذَا قَضَى اللّٰهُ وَرَسُولُهُٓ اَمْرًا اَنْ يَكُونَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ مِنْ اَمْرِهِمْۜ وَمَنْ يَعْصِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُب۪ينًا36
न किसी ईमानवाले पुरुष और न किसी ईमानवाली स्त्री को यह अधिकार है कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का फ़ैसला कर दें, तो फिर उन्हें अपने मामले में कोई अधिकार शेष रहे। जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करे तो वह खुली गुमराही में पड़ गया
وَاِذْ تَقُولُ لِلَّذ۪ٓي اَنْعَمَ اللّٰهُ عَلَيْهِ وَاَنْعَمْتَ عَلَيْهِ اَمْسِكْ عَلَيْكَ زَوْجَكَ وَاتَّقِ اللّٰهَ وَتُخْف۪ي ف۪ي نَفْسِكَ مَا اللّٰهُ مُبْد۪يهِ وَتَخْشَى النَّاسَۚ وَاللّٰهُ اَحَقُّ اَنْ تَخْشٰيهُۜ فَلَمَّا قَضٰى زَيْدٌ مِنْهَا وَطَرًا زَوَّجْنَاكَهَا لِكَيْ لَا يَكُونَ عَلَى الْمُؤْمِن۪ينَ حَرَجٌ ف۪ٓي اَزْوَاجِ اَدْعِيَٓائِهِمْ اِذَا قَضَوْا مِنْهُنَّ وَطَرًاۜ وَكَانَ اَمْرُ اللّٰهِ مَفْعُولًا37
याद करो (ऐ नबी), जबकि तुम उस व्यक्ति से कह रहे थे जिसपर अल्लाह ने अनुकम्पा की, और तुमने भी जिसपर अनुकम्पा की कि "अपनी पत्नी को अपने पास रोक रखो और अल्लाह का डर रखो, और तुम अपने जी में उस बात को छिपा रहे हो जिसको अल्लाह प्रकट करनेवाला है। तुम लोगों से डरते हो, जबकि अल्लाह इसका ज़्यादा हक़ रखता है कि तुम उससे डरो।" अतः जब ज़ैद उससे अपनी ज़रूरत पूरी कर चुका तो हमने उसका तुमसे विवाह कर दिया, ताकि ईमानवालों पर अपने मुँह बोले बेटों की पत्नियों के मामले में कोई तंगी न रहे जबकि वे उनसे अपनी ज़रूरत पूरी कर लें। अल्लाह का फ़ैसला तो पूरा होकर ही रहता है
مَا كَانَ عَلَى النَّبِيِّ مِنْ حَرَجٍ ف۪يمَا فَرَضَ اللّٰهُ لَهُۜ سُنَّةَ اللّٰهِ فِي الَّذ۪ينَ خَلَوْا مِنْ قَبْلُۜ وَكَانَ اَمْرُ اللّٰهِ قَدَرًا مَقْدُورًاۙ38
नबी पर उस काम में कोई तंगी नहीं जो अल्लाह ने उसके लिए ठहराया हो। यही अल्लाह का दस्तूर उन लोगों के मामले में भी रहा है जो पहले गुज़र चुके है - और अल्लाह का काम तो जँचा-तुला होता है। -
اَلَّذ۪ينَ يُبَلِّغُونَ رِسَالَاتِ اللّٰهِ وَيَخْشَوْنَهُ وَلَا يَخْشَوْنَ اَحَدًا اِلَّا اللّٰهَۜ وَكَفٰى بِاللّٰهِ حَس۪يبًا39
जो अल्लाह के सन्देश पहुँचाते थे और उसी से डरते थे और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते थे। और हिसाब लेने के लिए अल्लाह काफ़ी है। -
مَا كَانَ مُحَمَّدٌ اَبَٓا اَحَدٍ مِنْ رِجَالِكُمْ وَلٰكِنْ رَسُولَ اللّٰهِ وَخَاتَمَ النَّبِيّ۪نَۜ وَكَانَ اللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمًا۟40
मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के बाप नहीं है, बल्कि वे अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक है। अल्लाह को हर चीज़ का पूरा ज्ञान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اذْكُرُوا اللّٰهَ ذِكْرًا كَث۪يرًاۙ41
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह को अधिक याद करो
وَسَبِّحُوهُ بُكْرَةً وَاَص۪يلًا42
और प्रातःकाल और सन्ध्या समय उसकी तसबीह करते रहो -
هُوَ الَّذ۪ي يُصَلّ۪ي عَلَيْكُمْ وَمَلٰٓئِكَتُهُ لِيُخْرِجَكُمْ مِنَ الظُّلُمَاتِ اِلَى النُّورِۜ وَكَانَ بِالْمُؤْمِن۪ينَ رَح۪يمًا43
वही है जो तुमपर रहमत भेजता है और उसके फ़रिश्ते भी (दुआएँ करते है) - ताकि वह तुम्हें अँधरों से प्रकाश की ओर निकाल लाए। वास्तव में, वह ईमानवालों पर बहुत दयालु है
تَحِيَّتُهُمْ يَوْمَ يَلْقَوْنَهُ سَلَامٌۚ وَاَعَدَّ لَهُمْ اَجْرًا كَر۪يمًا44
जिस दिन वे उससे मिलेंगे उनका अभिवादन होगा, सलाम और उनके लिए प्रतिष्ठामय प्रदान तैयार कर रखा है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ اِنَّٓا اَرْسَلْنَاكَ شَاهِدًا وَمُبَشِّرًا وَنَذ۪يرًاۙ45
ऐ नबी! हमने तुमको साक्षी और शुभ सूचना देनेवाला और सचेल करनेवाला बनाकर भेजा है;
وَدَاعِيًا اِلَى اللّٰهِ بِاِذْنِه۪ وَسِرَاجًا مُن۪يرًا46
और अल्लाह की अनुज्ञा से उसकी ओर बुलानेवाला और प्रकाशमान प्रदीप बनाकर
وَبَشِّرِ الْمُؤْمِن۪ينَ بِاَنَّ لَهُمْ مِنَ اللّٰهِ فَضْلًا كَب۪يرًا47
ईमानवालों को शुभ सूचना दे दो कि उनके लिए अल्लाह को ओर से बहुत बड़ा उदार अनुग्रह है
وَلَا تُطِعِ الْكَافِر۪ينَ وَالْمُنَافِق۪ينَ وَدَعْ اَذٰيهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِۜ وَكَفٰى بِاللّٰهِ وَك۪يلًا48
और इनकार करनेवालों और कपटाचारियों के कहने में न आना। उनकी पहुँचाई हुई तकलीफ़ का ख़याल न करो। और अल्लाह पर भरोसा रखो। अल्लाह इसके लिए काफ़ी है कि अपने मामले में उसपर भरोसा किया जाए
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا نَكَحْتُمُ الْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِنْ قَبْلِ اَنْ تَمَسُّوهُنَّ فَمَا لَكُمْ عَلَيْهِنَّ مِنْ عِدَّةٍ تَعْتَدُّونَهَاۚ فَمَتِّعُوهُنَّ وَسَرِّحُوهُنَّ سَرَاحًا جَم۪يلًا49
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम ईमान लानेवाली स्त्रियों से विवाह करो और फिर उन्हें हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो तो तुम्हारे लिए उनपर कोई इद्दत नहीं, जिसकी तुम गिनती करो। अतः उन्हें कुछ सामान दे दो और भली रीति से विदा कर दो
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ اِنَّٓا اَحْلَلْنَا لَكَ اَزْوَاجَكَ الّٰت۪ٓي اٰتَيْتَ اُجُورَهُنَّ وَمَا مَلَكَتْ يَم۪ينُكَ مِمَّٓا اَفَٓاءَ اللّٰهُ عَلَيْكَ وَبَنَاتِ عَمِّكَ وَبَنَاتِ عَمَّاتِكَ وَبَنَاتِ خَالِكَ وَبَنَاتِ خَالَاتِكَ الّٰت۪ي هَاجَرْنَ مَعَكَۘ وَامْرَاَةً مُؤْمِنَةً اِنْ وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِيِّ اِنْ اَرَادَ النَّبِيُّ اَنْ يَسْتَنْكِحَهَاۗ خَالِصَةً لَكَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِن۪ينَۜ قَدْ عَلِمْنَا مَا فَرَضْنَا عَلَيْهِمْ ف۪ٓي اَزْوَاجِهِمْ وَمَا مَلَكَتْ اَيْمَانُهُمْ لِكَيْلَا يَكُونَ عَلَيْكَ حَرَجٌۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا50
ऐ नबी! हमने तुम्हारे लिए तुम्हारी वे पत्नियों वैध कर दी है जिनके मह्रक तुम दे चुके हो, और उन स्त्रियों को भी जो तुम्हारी मिल्कियत में आई, जिन्हें अल्लाह ने ग़नीमत के रूप में तुम्हें दी और तुम्हारी चचा की बेटियाँ और तुम्हारी फूफियों की बेटियाँ और तुम्हारे मामुओं की बेटियाँ और तुम्हारी ख़ालाओं की बेटियाँ जिन्होंने तुम्हारे साथ हिजरत की है और वह ईमानवाली स्त्री जो अपने आपको नबी के लिए दे दे, यदि नबी उससे विवाह करना चाहे। ईमानवालों से हटकर यह केवल तुम्हारे ही लिए है, हमें मालूम है जो कुछ हमने उनकी पत्ऩियों और उनकी लौड़ियों के बारे में उनपर अनिवार्य किया है - ताकि तुमपर कोई तंगी न रहे। अल्लाह बहुत क्षमाशील, दयावान है
تُرْج۪ي مَنْ تَشَٓاءُ مِنْهُنَّ وَتُـْٔو۪ٓي اِلَيْكَ مَنْ تَشَٓاءُۜ وَمَنِ ابْتَغَيْتَ مِمَّنْ عَزَلْتَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكَۜ ذٰلِكَ اَدْنٰٓى اَنْ تَقَرَّ اَعْيُنُهُنَّ وَلَا يَحْزَنَّ وَيَرْضَيْنَ بِمَٓا اٰتَيْتَهُنَّ كُلُّهُنَّۜ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ مَا ف۪ي قُلُوبِكُمْۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَل۪يمًا حَل۪يمًا51
तुम उनमें से जिसे चाहो अपने से अलग रखो और जिसे चाहो अपने पास रखो, और जिनको तुमने अलग रखा हो, उनमें से किसी के इच्छुक हो तो इसमें तुमपर कोई दोष नहीं, इससे इस बात की अधिक सम्भावना है कि उनकी आँखें ठंड़ी रहें और वे शोकाकुल न हों और जो कुछ तुम उन्हें दो उसपर वे राज़ी रहें। अल्लाह जानता है जो कुछ तुम्हारे दिलों में है। अल्लाह सर्वज्ञ, बहुत सहनशील है
لَا يَحِلُّ لَكَ النِّسَٓاءُ مِنْ بَعْدُ وَلَٓا اَنْ تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنْ اَزْوَاجٍ وَلَوْ اَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ اِلَّا مَا مَلَكَتْ يَم۪ينُكَۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ رَق۪يبًا۟52
इसके पश्चात तुम्हारे लिए दूसरी स्त्रियाँ वैध नहीं और न यह कि तुम उनकी जगह दूसरी पत्नियों ले आओ, यद्यपि उनका सौन्दर्य तुम्हें कितना ही भाए। उनकी बात औऱ है जो तुम्हारी लौंडियाँ हो। वास्तव में अल्लाह की स्पष्ट हर चीज़ पर है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتَ النَّبِيِّ اِلَّٓا اَنْ يُؤْذَنَ لَكُمْ اِلٰى طَعَامٍ غَيْرَ نَاظِر۪ينَ اِنٰيهُۙ وَلٰكِنْ اِذَا دُع۪يتُمْ فَادْخُلُوا فَاِذَا طَعِمْتُمْ فَانْتَشِرُوا وَلَا مُسْتَاْنِس۪ينَ لِحَد۪يثٍۜ اِنَّ ذٰلِكُمْ كَانَ يُؤْذِي النَّبِيَّ فَيَسْتَحْي۪ مِنْكُمْۘ وَاللّٰهُ لَا يَسْتَحْي۪ مِنَ الْحَقِّۜ وَاِذَا سَاَلْتُمُوهُنَّ مَتَاعًا فَسْـَٔلُوهُنَّ مِنْ وَرَٓاءِ حِجَابٍۜ ذٰلِكُمْ اَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّۜ وَمَا كَانَ لَكُمْ اَنْ تُؤْذُوا رَسُولَ اللّٰهِ وَلَٓا اَنْ تَنْكِحُٓوا اَزْوَاجَهُ مِنْ بَعْدِه۪ٓ اَبَدًاۜ اِنَّ ذٰلِكُمْ كَانَ عِنْدَ اللّٰهِ عَظ۪يمًا53
ऐ ईमान लानेवालो! नबी के घरों में प्रवेश न करो, सिवाय इसके कि कभी तुम्हें खाने पर आने की अनुमति दी जाए। वह भी इस तरह कि उसकी (खाना पकने की) तैयारी की प्रतिक्षा में न रहो। अलबत्ता जब तुम्हें बुलाया जाए तो अन्दर जाओ, और जब तुम खा चुको तो उठकर चले जाओ, बातों में लगे न रहो। निश्चय ही यह हरकत नबी को तकलीफ़ देती है। किन्तु उन्हें तुमसे लज्जा आती है। किन्तु अल्लाह सच्ची बात कहने से लज्जा नहीं करता। और जब तुम उनसे कुछ माँगों तो उनसे परदे के पीछे से माँगो। यह अधिक शुद्धता की बात है तुम्हारे दिलों के लिए और उनके दिलों के लिए भी। तुम्हारे लिए वैध नहीं कि तुम अल्लाह के रसूल को तकलीफ़ पहुँचाओ और न यह कि उसके बाद कभी उसकी पत्नियों से विवाह करो। निश्चय ही अल्लाह की दृष्टि में यह बड़ी गम्भीर बात है
اِنْ تُبْدُوا شَيْـًٔا اَوْ تُخْفُوهُ فَاِنَّ اللّٰهَ كَانَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمًا54
तुम चाहे किसी चीज़ को व्यक्त करो या उसे छिपाओ, अल्लाह को तो हर चीज़ का ज्ञान है
لَا جُنَاحَ عَلَيْهِنَّ ف۪ٓي اٰبَٓائِهِنَّ وَلَٓا اَبْنَٓائِهِنَّ وَلَٓا اِخْوَانِهِنَّ وَلَٓا اَبْنَٓاءِ اِخْوَانِهِنَّ وَلَٓا اَبْنَٓاءِ اَخَوَاتِهِنَّ وَلَا نِسَٓائِهِنَّ وَلَا مَا مَلَكَتْ اَيْمَانُهُنَّۚ وَاتَّق۪ينَ اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَه۪يدًا55
न उनके लिए अपने बापों के सामने होने में कोई दोष है और न अपने बेटों, न अपने भाइयों, न अपने भतीजों, न अपने भांजो, न अपने मेल की स्त्रियों और न जिनपर उन्हें स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो उनके सामने होने में। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही अल्लाह हर चीज़ का साक्षी है
اِنَّ اللّٰهَ وَمَلٰٓئِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّۜ يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْل۪يمًا56
निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो
اِنَّ الَّذ۪ينَ يُؤْذُونَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ لَعَنَهُمُ اللّٰهُ فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِ وَاَعَدَّ لَهُمْ عَذَابًا مُه۪ينًا57
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को दुख पहुँचाते है, अल्लाह ने उनपर दुनिया और आख़िरत में लानत की है और उनके लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है
وَالَّذ۪ينَ يُؤْذُونَ الْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ بِغَيْرِ مَا اكْتَسَبُوا فَقَدِ احْتَمَلُوا بُهْتَانًا وَاِثْمًا مُب۪ينًا۟58
और जो लोग ईमानवाले पुरुषों और ईमानवाली स्त्रियों को, बिना इसके कि उन्होंने कुछ किया हो (आरोप लगाकर), दुख पहुँचाते है, उन्होंने तो बड़े मिथ्यारोपण और प्रत्यक्ष गुनाह का बोझ अपने ऊपर उठा लिया
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِاَزْوَاجِكَ وَبَنَاتِكَ وَنِسَٓاءِ الْمُؤْمِن۪ينَ يُدْن۪ينَ عَلَيْهِنَّ مِنْ جَلَاب۪يبِهِنَّۜ ذٰلِكَ اَدْنٰٓى اَنْ يُعْرَفْنَ فَلَا يُؤْذَيْنَۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا59
ऐ नबी! अपनी पत्नि यों और अपनी बेटियों और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे अपने ऊपर अपनी चादरों का कुछ हिस्सा लटका लिया करें। इससे इस बात की अधिक सम्भावना है कि वे पहचान ली जाएँ और सताई न जाएँ। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
لَئِنْ لَمْ يَنْتَهِ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذ۪ينَ ف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ وَالْمُرْجِفُونَ فِي الْمَد۪ينَةِ لَنُغْرِيَنَّكَ بِهِمْ ثُمَّ لَا يُجَاوِرُونَكَ ف۪يهَٓا اِلَّا قَل۪يلًاۚۛ60
यदि कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है और मदीना में खलबली पैदा करनेवाली अफ़वाहें फैलाने से बाज़ न आएँ तो हम तुम्हें उनके विरुद्ध उभार खड़ा करेंगे। फिर वे उसमें तुम्हारे साथ थोड़ा ही रहने पाएँगे,
مَلْعُون۪ينَۚۛ اَيْنَ مَا ثُقِفُٓوا اُخِذُوا وَقُتِّلُوا تَقْت۪يلًا61
फिटकारे हुए होंगे। जहाँ कही पाए गए पकड़े जाएँगे और बुरी तरह जान से मारे जाएँगे
سُنَّةَ اللّٰهِ فِي الَّذ۪ينَ خَلَوْا مِنْ قَبْلُۚ وَلَنْ تَجِدَ لِسُنَّةِ اللّٰهِ تَبْد۪يلًا62
यही अल्लाह की रीति रही है उन लोगों के विषय में भी जो पहले गुज़र चुके हैं। और तुम अल्लाह की रीति में कदापि परिवर्तन न पाओगे
يَسْـَٔلُكَ النَّاسُ عَنِ السَّاعَةِۜ قُلْ اِنَّمَا عِلْمُهَا عِنْدَ اللّٰهِۜ وَمَا يُدْر۪يكَ لَعَلَّ السَّاعَةَ تَكُونُ قَر۪يبًا63
लोग तुमसे क़ियामत की घड़ी के बारे में पूछते है। कह दो, "उसका ज्ञान तो बस अल्लाह ही के पास है। तुम्हें क्या मालूम? कदाचित वह घड़ी निकट ही हो।"
اِنَّ اللّٰهَ لَعَنَ الْكَافِر۪ينَ وَاَعَدَّ لَهُمْ سَع۪يرًاۙ64
निश्चय ही अल्लाह ने इनकार करनेवालों पर लानत की है और उनके लिए भड़कती आग तैयार कर रखी है,
خَالِد۪ينَ ف۪يهَٓا اَبَدًاۚ لَا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَلَا نَص۪يرًاۚ65
जिसमें वे सदैव रहेंगे। न वे कोई निकटवर्ती समर्थक पाएँगे और न (दूर का) सहायक
يَوْمَ تُقَلَّبُ وُجُوهُهُمْ فِي النَّارِ يَقُولُونَ يَا لَيْتَنَٓا اَطَعْنَا اللّٰهَ وَاَطَعْنَا الرَّسُولَا66
जिस दिन उनके चहेरे आग में उलटे-पलटे जाएँगे, वे कहेंगे, "क्या ही अच्छा होता कि हमने अल्लाह का आज्ञापालन किया होता और रसूल का आज्ञापालन किया होता!"
وَقَالُوا رَبَّنَٓا اِنَّٓا اَطَعْنَا سَادَتَنَا وَكُبَرَٓاءَنَا فَاَضَلُّونَا السَّب۪يلَا67
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! वास्तव में हमने अपने सरदारों और अपने बड़ो का आज्ञा का पालन किया और उन्होंने हमें मार्ग से भटका दिया।
رَبَّنَٓا اٰتِهِمْ ضِعْفَيْنِ مِنَ الْعَذَابِ وَالْعَنْهُمْ لَعْنًا كَب۪يرًا۟68
"ऐ हमारे रब! उन्हें दोहरी यातना दे और उनपर बड़ी लानत कर!"
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَكُونُوا كَالَّذ۪ينَ اٰذَوْا مُوسٰى فَبَرَّاَهُ اللّٰهُ مِمَّا قَالُواۜ وَكَانَ عِنْدَ اللّٰهِ وَج۪يهًا69
ऐ ईमान लानेवालो! उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने मूसा को दुख पहुँचाया, तो अल्लाह ने उससे जो कुछ उन्होंने कहा था उसे बरी कर दिया। वह अल्लाह के यहाँ बड़ा गरिमावान था
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اتَّقُوا اللّٰهَ وَقُولُوا قَوْلًا سَد۪يدًاۙ70
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखो और बात कहो ठीक सधी हुई
يُصْلِحْ لَكُمْ اَعْمَالَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْۜ وَمَنْ يُطِعِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ فَازَ فَوْزًا عَظ۪يمًا71
वह तुम्हारे कर्मों को सँवार देगा और तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा। और जो अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करे, उसने बड़ी सफलता प्राप्त॥ कर ली है
اِنَّا عَرَضْنَا الْاَمَانَةَ عَلَى السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَالْجِبَالِ فَاَبَيْنَ اَنْ يَحْمِلْنَهَا وَاَشْفَقْنَ مِنْهَا وَحَمَلَهَا الْاِنْسَانُۜ اِنَّهُ كَانَ ظَلُومًا جَهُولًاۙ72
हमने अमानत को आकाशों और धरती और पर्वतों के समक्ष प्रस्तुत किया, किन्तु उन्होंने उसके उठाने से इनकार कर दिया और उससे डर गए। लेकिन मनुष्य ने उसे उठा लिया। निश्चय ही वह बड़ी ज़ालिम, आवेश के वशीभूत हो जानेवाला है
لِيُعَذِّبَ اللّٰهُ الْمُنَافِق۪ينَ وَالْمُنَافِقَاتِ وَالْمُشْرِك۪ينَ وَالْمُشْرِكَاتِ وَيَتُوبَ اللّٰهُ عَلَى الْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا73
ताकि अल्लाह कपटाचारी पुरुषों और कपटाचारी स्त्रियों और बहुदेववादी पुरुषों और बहुदेववादी स्त्रियों को यातना दे, और ईमानवाले पुरुषों और ईमानवाली स्त्रियों पर अल्लाह कृपा-स्पष्ट करे। वास्तव में अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है