अल-हुजरात - कुरान पढ़ें
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيِ اللّٰهِ وَرَسُولِه۪ وَاتَّقُوا اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ1
ऐ ईमानवालो! अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढो और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह सुनता, जानता है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَرْفَعُٓوا اَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ اَنْ تَحْبَطَ اَعْمَالُكُمْ وَاَنْتُمْ لَا تَشْعُرُونَ2
ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! तुम अपनी आवाज़ों को नबी की आवाज़ से ऊँची न करो। और जिस तरह तुम आपस में एक-दूसरे से ज़ोर से बोलते हो, उससे ऊँची आवाज़ में बात न करो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे कर्म अकारथ हो जाएँ और तुम्हें ख़बर भी न हो
اِنَّ الَّذ۪ينَ يَغُضُّونَ اَصْوَاتَهُمْ عِنْدَ رَسُولِ اللّٰهِ اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ امْتَحَنَ اللّٰهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوٰىۜ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَاَجْرٌ عَظ۪يمٌ3
वे लोग जो अल्लाह के रसूल के समक्ष अपनी आवाज़ों को दबी रखते है, वही लोग है जिनके दिलों को अल्लाह ने परहेज़गारी के लिए जाँचकर चुन लिया है। उनके लिए क्षमा और बड़ा बदला है
اِنَّ الَّذ۪ينَ يُنَادُونَكَ مِنْ وَرَٓاءِ الْحُجُرَاتِ اَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ4
जो लोग (ऐ नबी) तुम्हें कमरों के बाहर से पुकारते है उनमें से अधिकतर बुद्धि से काम नहीं लेते
وَلَوْ اَنَّهُمْ صَبَرُوا حَتّٰى تَخْرُجَ اِلَيْهِمْ لَكَانَ خَيْرًا لَهُمْۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ5
यदि वे धैर्य से काम लेते यहाँ तक कि तुम स्वयं निकलकर उनके पास आ जाते तो यह उनके लिए अच्छा होता। किन्तु अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنْ جَٓاءَكُمْ فَاسِقٌ بِنَبَاٍ فَتَبَيَّنُٓوا اَنْ تُص۪يبُوا قَوْمًا بِجَهَالَةٍ فَتُصْبِحُوا عَلٰى مَا فَعَلْتُمْ نَادِم۪ينَ6
ऐ लोगों, जो ईमान लाए हो! यदि कोई अवज्ञाकारी तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो उसकी छानबीन कर लिया करो। कहीं ऐसा न हो कि तुम किसी गिरोह को अनजाने में तकलीफ़ और नुक़सान पहुँचा बैठो, फिर अपने किए पर पछताओ
وَاعْلَمُٓوا اَنَّ ف۪يكُمْ رَسُولَ اللّٰهِۜ لَوْ يُط۪يعُكُمْ ف۪ي كَث۪يرٍ مِنَ الْاَمْرِ لَعَنِتُّمْ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ حَبَّبَ اِلَيْكُمُ الْا۪يمَانَ وَزَيَّنَهُ ف۪ي قُلُوبِكُمْ وَكَرَّهَ اِلَيْكُمُ الْكُفْرَ وَالْفُسُوقَ وَالْعِصْيَانَۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الرَّاشِدُونَۙ7
जान लो कि तुम्हारे बीच अल्लाह का रसूल मौजूद है। बहुत-से मामलों में यदि वह तुम्हारी बात मान ले तो तुम कठिनाई में पड़ जाओ। किन्तु अल्लाह ने तुम्हारे लिए ईमान को प्रिय बना दिया और उसे तुम्हारे दिलों में सुन्दरता दे दी और इनकार, उल्लंघन और अवज्ञा को तुम्हारे लिए बहुत अप्रिय बना दिया।
فَضْلًا مِنَ اللّٰهِ وَنِعْمَةًۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ8
ऐसे ही लोग अल्लाह के उदार अनुग्रह और अनुकम्पा से सूझबूझवाले है। और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, तत्वदर्शी है
وَاِنْ طَٓائِفَتَانِ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ اقْتَتَلُوا فَاَصْلِحُوا بَيْنَهُمَاۚ فَاِنْ بَغَتْ اِحْدٰيهُمَا عَلَى الْاُخْرٰى فَقَاتِلُوا الَّت۪ي تَبْغ۪ي حَتّٰى تَف۪ٓيءَ اِلٰٓى اَمْرِ اللّٰهِۚ فَاِنْ فَٓاءَتْ فَاَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا بِالْعَدْلِ وَاَقْسِطُواۜ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُقْسِط۪ينَ9
यदि मोमिनों में से दो गिरोह आपस में लड़ पड़े तो उनके बीच सुलह करा दो। फिर यदि उनमें से एक गिरोह दूसरे पर ज़्यादती करे, तो जो गिरोह ज़्यादती कर रहा हो उससे लड़ो, यहाँ तक कि वह अल्लाह के आदेश की ओर पलट आए। फिर यदि वह पलट आए तो उनके बीच न्याय के साथ सुलह करा दो, और इनसाफ़ करो। निश्चय ही अल्लाह इनसाफ़ करनेवालों को पसन्द करता है
اِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ اِخْوَةٌ فَاَصْلِحُوا بَيْنَ اَخَوَيْكُمْ وَاتَّقُوا اللّٰهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ۟10
मोमिन तो भाई-भाई ही है। अतः अपने दो भाईयो के बीच सुलह करा दो और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुमपर दया की जाए
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِنْ قَوْمٍ عَسٰٓى اَنْ يَكُونُوا خَيْرًا مِنْهُمْ وَلَا نِسَٓاءٌ مِنْ نِسَٓاءٍ عَسٰٓى اَنْ يَكُنَّ خَيْرًا مِنْهُنَّۚ وَلَا تَلْمِزُٓوا اَنْفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا بِالْاَلْقَابِۜ بِئْسَ الِاسْمُ الْفُسُوقُ بَعْدَ الْا۪يمَانِۚ وَمَنْ لَمْ يَتُبْ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ11
ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! न पुरुषों का कोई गिरोह दूसरे पुरुषों की हँसी उड़ाए, सम्भव है वे उनसे अच्छे हों और न स्त्रियाँ स्त्रियों की हँसी उड़ाए, सम्भव है वे उनसे अच्छी हों, और न अपनों पर ताने कसो और न आपस में एक-दूसरे को बुरी उपाधियों से पुकारो। ईमान के पश्चात अवज्ञाकारी का नाम जुडना बहुत ही बुरा है। और जो व्यक्ति बाज़ न आए, तो ऐसे ही व्यक्ति ज़ालिम है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اجْتَنِبُوا كَث۪يرًا مِنَ الظَّنِّۚ اِنَّ بَعْضَ الظَّنِّ اِثْمٌ وَلَا تَجَسَّسُوا وَلَا يَغْتَبْ بَعْضُكُمْ بَعْضًاۜ اَيُحِبُّ اَحَدُكُمْ اَنْ يَاْكُلَ لَحْمَ اَخ۪يهِ مَيْتًا فَكَرِهْتُمُوهُۜ وَاتَّقُوا اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ تَوَّابٌ رَح۪يمٌ12
ऐ ईमान लानेवालो! बहुत से गुमानों से बचो, क्योंकि कतिपय गुमान गुनाह होते है। और न टोह में पड़ो और न तुममें से कोई किसी की पीठ पीछे निन्दा करे - क्या तुममें से कोई इसको पसन्द करेगा कि वह मरे हुए भाई का मांस खाए? वह तो तुम्हें अप्रिय होगी ही। - और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اِنَّا خَلَقْنَاكُمْ مِنْ ذَكَرٍ وَاُنْثٰى وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَٓائِلَ لِتَعَارَفُواۜ اِنَّ اَكْرَمَكُمْ عِنْدَ اللّٰهِ اَتْقٰيكُمْۜ اِنَّ اللّٰهَ عَل۪يمٌ خَب۪يرٌ13
ऐ लोगो! हमनें तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बिलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है, जो तुममे सबसे अधिक डर रखता है। निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है
قَالَتِ الْاَعْرَابُ اٰمَنَّاۜ قُلْ لَمْ تُؤْمِنُوا وَلٰكِنْ قُولُٓوا اَسْلَمْنَا وَلَمَّا يَدْخُلِ الْا۪يمَانُ ف۪ي قُلُوبِكُمْۜ وَاِنْ تُط۪يعُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُ لَا يَلِتْكُمْ مِنْ اَعْمَالِكُمْ شَيْـًٔاۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ14
बद्दुओं ने कहा कि, "हम ईमान लाए।" कह दो, "तुम ईमान नहीं लाए। किन्तु यूँ कहो, 'हम तो आज्ञाकारी हुए' ईमान तो अभी तुम्हारे दिलों में दाख़िल ही नहीं हुआ। यदि तुम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो तो वह तुम्हारे कर्मों में से तुम्हारे लिए कुछ कम न करेगा। निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है।"
اِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ ثُمَّ لَمْ يَرْتَابُوا وَجَاهَدُوا بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَ15
मोमिन तो बस वही लोग है जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए, फिर उन्होंने कोई सन्देह नहीं किया और अपने मालों और अपनी जानों से अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया। वही लोग सच्चे है
قُلْ اَتُعَلِّمُونَ اللّٰهَ بِد۪ينِكُمْ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۜ وَاللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ16
कहो, "क्या तुम अल्लाह को अपने धर्म की सूचना दे रहे हो। हालाँकि जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है, अल्लाह सब जानता है? अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है।"
يَمُنُّونَ عَلَيْكَ اَنْ اَسْلَمُواۜ قُلْ لَا تَمُنُّوا عَلَيَّ اِسْلَامَكُمْۚ بَلِ اللّٰهُ يَمُنُّ عَلَيْكُمْ اَنْ هَدٰيكُمْ لِلْا۪يمَانِ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ17
वे तुमपर एहसान जताते है कि उन्होंने इस्लाम क़बूल कर लिया। कह दो, "मुझ पर अपने इस्लाम का एहसान न रखो, बल्कि यदि तुम सच्चे हो तो अल्लाह ही तुमपर एहसान रखता है कि उसने तुम्हें ईमान की राह दिखाई।-
اِنَّ اللّٰهَ يَعْلَمُ غَيْبَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَاللّٰهُ بَص۪يرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ18
"निश्चय ही अल्लाह आकाशों और धरती के अदृष्ट को जानता है। और अल्लाह देख रहा है जो कुछ तुम करते हो।"