अल-अनफाल - कुरान पढ़ें
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ الْاَنْفَالِۜ قُلِ الْاَنْفَالُ لِلّٰهِ وَالرَّسُولِۚ فَاتَّقُوا اللّٰهَ وَاَصْلِحُوا ذَاتَ بَيْنِكُمْۖ وَاَط۪يعُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُٓ اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَ1
वे तुमसे ग़नीमतों के विषय में पूछते है। कहो, "ग़नीमतें अल्लाह और रसूल की है। अतः अल्लाह का डर रखों और आपस के सम्बन्धों को ठीक रखो। और, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो, यदि तुम ईमानवाले हो
اِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذ۪ينَ اِذَا ذُكِرَ اللّٰهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَاِذَا تُلِيَتْ عَلَيْهِمْ اٰيَاتُهُ زَادَتْهُمْ ا۪يمَانًا وَعَلٰى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَۚ2
ईमानवाले तो वही लोग है जिनके दिल उस समय काँप उठे जबकि अल्लाह को याद किया जाए। और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाएँ तो वे उनके ईमान को और अधिक बढ़ा दें और वे अपने रब पर भरोसा रखते हों
اَلَّذ۪ينَ يُق۪يمُونَ الصَّلٰوةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَۜ3
ये वे लोग हैं जो नमाज़ क़ायम करते है और जो कुछ हमने दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं
اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُؤْمِنُونَ حَقًّاۜ لَهُمْ دَرَجَاتٌ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَمَغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَر۪يمٌۚ4
वही लोग वास्तव में ईमानवाले है। उनके लिेए रब के पास बड़े दर्जे है और क्षमा और सम्मानित उत्तम आजीविका भी
كَمَٓا اَخْرَجَكَ رَبُّكَ مِنْ بَيْتِكَ بِالْحَقِّۖ وَاِنَّ فَر۪يقًا مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ لَكَارِهُونَۙ5
(यह बिल्कुल वैसी ही परिस्थित है) जैसे तुम्हारे ने तुम्हें तुम्हारे घर से एक उद्देश्य के साथ निकाला, किन्तु ईमानवालों में से एक गिरोह को यह अप्रिय लगा था
يُجَادِلُونَكَ فِي الْحَقِّ بَعْدَ مَا تَبَيَّنَ كَاَنَّمَا يُسَاقُونَ اِلَى الْمَوْتِ وَهُمْ يَنْظُرُونَۜ6
वे सत्य के विषय में उसके स्पष्ट हो जाने के पश्चात तुमसे झगड़ रहे थे। मानो वे आँखों देखी मृत्यु की ओर हाँके जा रहे हों
وَاِذْ يَعِدُكُمُ اللّٰهُ اِحْدَى الطَّٓائِفَتَيْنِ اَنَّهَا لَكُمْ وَتَوَدُّونَ اَنَّ غَيْرَ ذَاتِ الشَّوْكَةِ تَكُونُ لَكُمْ وَيُر۪يدُ اللّٰهُ اَنْ يُحِقَّ الْحَقَّ بِكَلِمَاتِه۪ وَيَقْطَعَ دَابِرَ الْكَافِر۪ينَۙ7
और याद करो जब अल्लाह तुमसे वादा कर रहा था कि दो गिरोहों में से एक तुम्हारे हाथ आएगा और तुम चाहते थे कि तुम्हें वह हाथ आए, जो निःशस्त्र था, हालाँकि अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों से सत्य को सत्य कर दिखाए और इनकार करनेवालों की जड़ काट दे
لِيُحِقَّ الْحَقَّ وَيُبْطِلَ الْبَاطِلَ وَلَوْ كَرِهَ الْمُجْرِمُونَۚ8
ताकि सत्य को सत्य कर दिखाए और असत्य को असत्य, चाहे अपराधियों को कितना ही अप्रिय लगे
اِذْ تَسْتَغ۪يثُونَ رَبَّكُمْ فَاسْتَجَابَ لَكُمْ اَنّ۪ي مُمِدُّكُمْ بِاَلْفٍ مِنَ الْمَلٰٓئِكَةِ مُرْدِف۪ينَ9
याद करो जब तुम अपने रब से फ़रियाद कर रहे थे, तो उसने तुम्हारी पुकार सुन ली। (उसने कहा,) "मैं एक हजार फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करूँगा जो तुम्हारे साथी होंगे।"
وَمَا جَعَلَهُ اللّٰهُ اِلَّا بُشْرٰى وَلِتَطْمَئِنَّ بِه۪ قُلُوبُكُمْۚ وَمَا النَّصْرُ اِلَّا مِنْ عِنْدِ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ۟10
अल्लाह ने यह केवल इसलिए किया कि यह एक शुभ-सूचना हो और ताकि इससे तुम्हारे हृदय संतुष्ट हो जाएँ। सहायता अल्लाह ही के यहाँ से होती है। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
اِذْ يُغَشّ۪يكُمُ النُّعَاسَ اَمَنَةً مِنْهُ وَيُنَزِّلُ عَلَيْكُمْ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً لِيُطَهِّرَكُمْ بِه۪ وَيُذْهِبَ عَنْكُمْ رِجْزَ الشَّيْطَانِ وَلِيَرْبِطَ عَلٰى قُلُوبِكُمْ وَيُثَبِّتَ بِهِ الْاَقْدَامَۜ11
यह करो जबकि वह अपनी ओर से चैन प्रदान कर तुम्हें ऊँघ से ढँक रहा था और वह आकाश से तुमपर पानी बरसा रहा था, ताकि उसके द्वारा तुम्हें अच्छी तरह पाक करे और शैतान की गन्दगी तुमसे दूर करे और तुम्हारे दिलों को मज़बूत करे और उसके द्वारा तुम्हारे क़दमों को जमा दे
اِذْ يُوح۪ي رَبُّكَ اِلَى الْمَلٰٓئِكَةِ اَنّ۪ي مَعَكُمْ فَثَبِّتُوا الَّذ۪ينَ اٰمَنُواۜ سَاُلْق۪ي ف۪ي قُلُوبِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا الرُّعْبَ فَاضْرِبُوا فَوْقَ الْاَعْنَاقِ وَاضْرِبُوا مِنْهُمْ كُلَّ بَنَانٍۜ12
याद करो जब तुम्हारा रब फ़रिश्तों की ओर प्रकाशना (वह्य्) कर रहा था कि "मैं तुम्हारे साथ हूँ। अतः तुम ईमानवालों को जमाए रखो। मैं इनकार करनेवालों के दिलों में रोब डाले देता हूँ। तो तुम उनकी गरदनें मारो और उनके पोर-पोर पर चोट लगाओ!"
ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ شَٓاقُّوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُۚ وَمَنْ يُشَاقِقِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ فَاِنَّ اللّٰهَ شَد۪يدُ الْعِقَابِ13
यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे (उसे कठोर यातना मिलकर रहेगी) क्योंकि अल्लाह कड़ी यातना देनेवाला है
ذٰلِكُمْ فَذُوقُوهُ وَاَنَّ لِلْكَافِر۪ينَ عَذَابَ النَّارِ14
यह तो तुम चखो! और यह कि इनकार करनेवालों के लिए आग की यातना है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا لَق۪يتُمُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا زَحْفًا فَلَا تُوَلُّوهُمُ الْاَدْبَارَۚ15
ऐ ईमान लानेवालो! जब एक सेना के रूप में तुम्हारा इनकार करनेवालों से मुक़ाबला हो तो पीठ न फेरो
وَمَنْ يُوَلِّهِمْ يَوْمَئِذٍ دُبُرَهُٓ اِلَّا مُتَحَرِّفًا لِقِتَالٍ اَوْ مُتَحَيِّزًا اِلٰى فِئَةٍ فَقَدْ بَٓاءَ بِغَضَبٍ مِنَ اللّٰهِ وَمَاْوٰيهُ جَهَنَّمُۜ وَبِئْسَ الْمَص۪يرُ16
जिस किसी ने भी उस दिन उनसे अपनी पीठ फेरी - यह और बात है कि युद्ध-चाल के रूप में या दूसरी टुकड़ी से मिलने के लिए ऐसा करे - तो वह अल्लाह के प्रकोप का भागी हुआ और उसका ठिकाना जहन्नम है, और क्या ही बुरा जगह है वह पहुँचने की!
فَلَمْ تَقْتُلُوهُمْ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ قَتَلَهُمْۖ وَمَا رَمَيْتَ اِذْ رَمَيْتَ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ رَمٰىۚ وَلِيُبْلِيَ الْمُؤْمِن۪ينَ مِنْهُ بَلَٓاءً حَسَنًاۜ اِنَّ اللّٰهَ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ17
तुमने उसे क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ही ने उन्हें क़त्ल किया और जब तुमने (उनकी ओर मिट्टी और कंकड़) फेंक, तो तुमने नहीं फेंका बल्कि अल्लाह ने फेंका (कि अल्लाह अपनी गुण-गरिमा दिखाए) और ताकि अपनी ओर से ईमानवालों के गुण प्रकट करे। निस्संदेह अल्लाह सुनता, जानता है
ذٰلِكُمْ وَاَنَّ اللّٰهَ مُوهِنُ كَيْدِ الْكَافِر۪ينَ18
यह तो हुआ, और यह (जान लो) कि अल्लाह इनकार करनेवालों की चाल को कमज़ोर कर देनेवाला है
اِنْ تَسْتَفْتِحُوا فَقَدْ جَٓاءَكُمُ الْفَتْحُۚ وَاِنْ تَنْتَهُوا فَهُوَ خَيْرٌ لَكُمْۚ وَاِنْ تَعُودُوا نَعُدْۚ وَلَنْ تُغْنِيَ عَنْكُمْ فِئَتُكُمْ شَيْـًٔا وَلَوْ كَثُرَتْۙ وَاَنَّ اللّٰهَ مَعَ الْمُؤْمِن۪ينَ۟19
यदि तुम फ़ैसला चाहते हो तो फ़ैसला तुम्हारे सामने आ चुका और यदि बाज़ आ जाओ तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है। लेकिन यदि तुमने पलटकर फिर वही हरकत की तो हम भी पलटेंगे और तुम्हारा जत्था, चाहे वह कितना ही अधिक हो, तुम्हारे कुछ काम न आ सकेगा। और यह कि अल्लाह मोमिनों के साथ होता है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اَط۪يعُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَوَلَّوْا عَنْهُ وَاَنْتُمْ تَسْمَعُونَۚ20
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करो और उससे मुँह न फेरो जबकि तुम सुन रहे हो
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذ۪ينَ قَالُوا سَمِعْنَا وَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ21
और उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने कहा था, "हमने सुना" हालाँकि वे सुनते नहीं
اِنَّ شَرَّ الدَّوَٓابِّ عِنْدَ اللّٰهِ الصُّمُّ الْبُكْمُ الَّذ۪ينَ لَا يَعْقِلُونَ22
अल्लाह की स्पष्ट में तो निकृष्ट पशु वे बहरे-गूँगे लोग है, जो बुद्धि से काम नहीं लेते
وَلَوْ عَلِمَ اللّٰهُ ف۪يهِمْ خَيْرًا لَاَسْمَعَهُمْۜ وَلَوْ اَسْمَعَهُمْ لَتَوَلَّوْا وَهُمْ مُعْرِضُونَ23
यदि अल्लाह जानता कि उनमें कुछ भी भलाई है, तो वह उन्हें अवश्य सुनने का सौभाग्य प्रदान करता। और यदि वह उन्हें सुना देता तो भी वे कतराते हुए मुँह फेर लेते
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اسْتَج۪يبُوا لِلّٰهِ وَلِلرَّسُولِ اِذَا دَعَاكُمْ لِمَا يُحْي۪يكُمْۚ وَاعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ يَحُولُ بَيْنَ الْمَرْءِ وَقَلْبِه۪ وَاَنَّهُٓ اِلَيْهِ تُحْشَرُونَ24
ऐ ईमान लानेवाले! अल्लाह और रसूल की बात मानो, जब वह तुम्हें उस चीज़ की ओर बुलाए जो तुम्हें जीवन प्रदान करनेवाली है, और जान रखो कि अल्लाह आदमी और उसके दिल के बीच आड़े आ जाता है और यह कि वही है जिसकी ओर (पलटकर) तुम एकत्र होगे
وَاتَّقُوا فِتْنَةً لَا تُص۪يبَنَّ الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا مِنْكُمْ خَٓاصَّةًۚ وَاعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ شَد۪يدُ الْعِقَابِ25
बचो उस फ़ितने से जो अपनी लपेट में विशेष रूप से केवल अत्याचारियों को ही नहीं लेगा, जान लो अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है
وَاذْكُرُٓوا اِذْ اَنْتُمْ قَل۪يلٌ مُسْتَضْعَفُونَ فِي الْاَرْضِ تَخَافُونَ اَنْ يَتَخَطَّفَكُمُ النَّاسُ فَاٰوٰيكُمْ وَاَيَّدَكُمْ بِنَصْرِه۪ وَرَزَقَكُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ26
और याद करो जब तुम थोड़े थे, धरती में निर्बल थे, डरे-सहमे रहते कि लोग कहीं तु्म्हें उचक न ले जाएँ, फिर उसने तुम्हें ठिकाना दिया और अपनी सहायता से तुम्हें शक्ति प्रदान की और अच्छी-स्वच्छ चीज़ों की तुम्हें रोजी दी, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَخُونُوا اللّٰهَ وَالرَّسُولَ وَتَخُونُٓوا اَمَانَاتِكُمْ وَاَنْتُمْ تَعْلَمُونَ27
ऐ ईमान लानेवालो! जानते-बुझते तुम अल्लाह और उसके रसूल के साथ विश्वासघात न करना और न अपनी अमानतों में ख़ियानत करना
وَاعْلَمُٓوا اَنَّمَٓا اَمْوَالُكُمْ وَاَوْلَادُكُمْ فِتْنَةٌۙ وَاَنَّ اللّٰهَ عِنْدَهُٓ اَجْرٌ عَظ۪يمٌ۟28
और जान रखो कि तुम्हारे माल और तुम्हारी संतान परीक्षा-सामग्री हैं और यह कि अल्लाह के पास बड़ा प्रतिदान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنْ تَتَّقُوا اللّٰهَ يَجْعَلْ لَكُمْ فُرْقَانًا وَيُكَفِّرْ عَنْكُمْ سَيِّـَٔاتِكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْۜ وَاللّٰهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظ۪يمِ29
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम अल्लाह का डर रखोगे तो वह तुम्हें एक विशिष्टता प्रदान करेगा और तुमसे तुम्हारी बुराइयाँ दूर करेगा और तुम्हे क्षमा करेगा। अल्लाह बड़ा अनुग्राहक है
وَاِذْ يَمْكُرُ بِكَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لِيُثْبِتُوكَ اَوْ يَقْتُلُوكَ اَوْ يُخْرِجُوكَۜ وَيَمْكُرُونَ وَيَمْكُرُ اللّٰهُۜ وَاللّٰهُ خَيْرُ الْمَاكِر۪ينَ30
और याद करो जब इनकार करनेवाले तुम्हारे साथ चालें चल रहे थे कि तम्हें क़ैद रखें या तुम्हे क़त्ल कर दें या तुम्हे निकाल बाहर करे। वे अपनी चालें चल रहे थे और अल्लाह भी अपनी चाल चल रहा था। अल्लाह सबसे अच्छी चाल चलता है
وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِمْ اٰيَاتُنَا قَالُوا قَدْ سَمِعْنَا لَوْ نَشَٓاءُ لَقُلْنَا مِثْلَ هٰذَٓاۙ اِنْ هٰذَٓا اِلَّٓا اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ31
जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती है, तो वे कहते है, "हम सुन चुके। यदि हम चाहें तो ऐसी बातें हम भी बना लें; ये तो बस पहले के लोगों की कहानियाँ हैं।"
وَاِذْ قَالُوا اللّٰهُمَّ اِنْ كَانَ هٰذَا هُوَ الْحَقَّ مِنْ عِنْدِكَ فَاَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةً مِنَ السَّمَٓاءِ اَوِ ائْتِنَا بِعَذَابٍ اَل۪يمٍ32
और याद करो जब उन्होंने कहा, "ऐ अल्लाह! यदि यही तेरे यहाँ से सत्य हो तो हमपर आकाश से पत्थर बरसा दे, या हम पर कोई दुखद यातना ही ले आ
وَمَا كَانَ اللّٰهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَاَنْتَ ف۪يهِمْۜ وَمَا كَانَ اللّٰهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ33
और अल्लाह ऐसा नहीं कि तुम उनके बीच उपस्थित हो और वह उन्हें यातना देने लग जाए, और न अल्लाह ऐसा है कि वे क्षमा-याचना कर रहे हो और वह उन्हें यातना से ग्रस्त कर दे
وَمَا لَهُمْ اَلَّا يُعَذِّبَهُمُ اللّٰهُ وَهُمْ يَصُدُّونَ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَمَا كَانُٓوا اَوْلِيَٓاءَهُۜ اِنْ اَوْلِيَٓاؤُ۬هُٓ اِلَّا الْمُتَّقُونَ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ34
किन्तु अब क्या है उनके पास कि अल्लाह उन्हें यातना न दे, जबकि वे 'मस्जिदे हराम' (काबा) से रोकते है, हालाँकि वे उसके कोई व्यवस्थापक नहीं? उसके व्यवस्थापक तो केवल डर रखनेवाले ही है, परन्तु उनके अधिकतर लोग जानते नहीं
وَمَا كَانَ صَلَاتُهُمْ عِنْدَ الْبَيْتِ اِلَّا مُكَٓاءً وَتَصْدِيَةًۜ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُونَ35
उनकी नमाज़़ इस घर (काबा) के पास सीटियाँ बजाने और तालियाँ पीटने के अलावा कुछ भी नहीं होती। तो अब यातना का मज़ा चखो, उस इनकार के बदले में जो तुम करते रहे हो
اِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا يُنْفِقُونَ اَمْوَالَهُمْ لِيَصُدُّوا عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِۜ فَسَيُنْفِقُونَهَا ثُمَّ تَكُونُ عَلَيْهِمْ حَسْرَةً ثُمَّ يُغْلَبُونَۜ وَالَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اِلٰى جَهَنَّمَ يُحْشَرُونَۙ36
निश्चय ही इनकार करनेवाले अपने माल अल्लाह के मार्ग से रोकने के लिए ख़र्च करते रहेंगे, फिर यही उनके लिए पश्चाताप बनेगा। फिर वे पराभूत होंगे और इनकार करनेवाले जहन्नम की ओर समेट लाए जाएँगे
لِيَم۪يزَ اللّٰهُ الْخَب۪يثَ مِنَ الطَّيِّبِ وَيَجْعَلَ الْخَب۪يثَ بَعْضَهُ عَلٰى بَعْضٍ فَيَرْكُمَهُ جَم۪يعًا فَيَجْعَلَهُ ف۪ي جَهَنَّمَۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ۟37
ताकि अल्लाह नापाक को पाक से छाँटकर अलग करे और नापाकों को आपस में एक-दूसरे पर रखकर ढेर बनाए, फिर उसे जहन्नम में डाल दे। यही लोग घाटे में पड़नेवाले है
قُلْ لِلَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اِنْ يَنْتَهُوا يُغْفَرْ لَهُمْ مَا قَدْ سَلَفَۚ وَاِنْ يَعُودُوا فَقَدْ مَضَتْ سُنَّتُ الْاَوَّل۪ينَ38
उन इनकार करनेवालो से कह दो कि वे यदि बाज़ आ जाएँ तो जो कुछ हो चुका, उसे क्षमा कर दिया जाएगा, किन्तु यदि वे फिर भी वहीं करेंगे तो पूर्ववर्ती लोगों के सिलसिले में जो रीति अपनाई गई वह सामने से गुज़र चुकी है
وَقَاتِلُوهُمْ حَتّٰى لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ الدّ۪ينُ كُلُّهُ لِلّٰهِۚ فَاِنِ انْتَهَوْا فَاِنَّ اللّٰهَ بِمَا يَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ39
उनसे युद्ध करो, यहाँ तक कि फ़ितना बाक़ी न रहे और दीन (धर्म) पूरा का पूरा अल्लाह ही के लिए हो जाए। फिर यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अल्लाह उनके कर्म को देख रहा है
وَاِنْ تَوَلَّوْا فَاعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ مَوْلٰيكُمْۜ نِعْمَ الْمَوْلٰى وَنِعْمَ النَّص۪يرُ40
किन्तु यदि वे मुँह मोड़े तो जान रखो कि अल्लाह संरक्षक है। क्या ही अच्छा संरक्षक है वह, और क्या ही अच्छा सहायक!
وَاعْلَمُٓوا اَنَّمَا غَنِمْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَاَنَّ لِلّٰهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبٰى وَالْيَتَامٰى وَالْمَسَاك۪ينِ وَابْنِ السَّب۪يلِۙ اِنْ كُنْتُمْ اٰمَنْتُمْ بِاللّٰهِ وَمَٓا اَنْزَلْنَا عَلٰى عَبْدِنَا يَوْمَ الْفُرْقَانِ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِۜ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ41
और तुम्हें मालूम हो कि जो कुछ ग़नीमत के रूप में माल तुमने प्राप्त किया है, उसका पाँचवा भाग अल्लाग का, रसूल का, नातेदारों का, अनाथों का, मुहताजों और मुसाफ़िरों का है। यदि तुम अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान रखते हो, जो हमने अपने बन्दे पर फ़ैसले के दिन उतारी, जिस दिन दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हूई, और अल्लाह को हर चीज़ की पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त है
اِذْ اَنْتُمْ بِالْعُدْوَةِ الدُّنْيَا وَهُمْ بِالْعُدْوَةِ الْقُصْوٰى وَالرَّكْبُ اَسْفَلَ مِنْكُمْۜ وَلَوْ تَوَاعَدْتُمْ لَاخْتَلَفْتُمْ فِي الْم۪يعَادِۙ وَلٰكِنْ لِيَقْضِيَ اللّٰهُ اَمْرًا كَانَ مَفْعُولًاۙ لِيَهْلِكَ مَنْ هَلَكَ عَنْ بَيِّنَةٍ وَيَحْيٰى مَنْ حَيَّ عَنْ بَيِّنَةٍۜ وَاِنَّ اللّٰهَ لَسَم۪يعٌ عَل۪يمٌۙ42
याद करो जब तुम घाटी के निकटवर्ती छोर पर थे और वे घाटी के दूरस्थ छोर पर थे और क़ाफ़िला तुमसे नीचे की ओर था। यदि तुम परस्पर समय निश्चित किए होते तो अनिवार्यतः तुम निश्चित समय पर न पहुँचते। किन्तु जो कुछ हुआ वह इसलिए कि अल्लाह उस बात का फ़ैसला कर दे, जिसका पूरा होना निश्चित था, ताकि जिसे विनष्ट होना हो, वह स्पष्ट प्रमाण देखकर ही विनष्ट हो और जिसे जीवित रहना हो वह स्पष्ट़ प्रमाण देखकर जीवित रहे। निस्संदेह अल्लाह भली-भाँति जानता, सुनता है
اِذْ يُر۪يكَهُمُ اللّٰهُ ف۪ي مَنَامِكَ قَل۪يلًاۜ وَلَوْ اَرٰيكَهُمْ كَث۪يرًا لَفَشِلْتُمْ وَلَتَنَازَعْتُمْ فِي الْاَمْرِ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ سَلَّمَۜ اِنَّهُ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ43
और याद करो जब अल्लाह उनको तुम्हारे स्वप्न में थोड़ा करके तुम्हें दिखा रहा था और यदि वह उन्हें ज़्यादा करके तुम्हें दिखा देता तो अवश्य ही तुम हिम्मत हार बैठते और असल मामले में झगड़ने लग जाते, किन्तु अल्लाह ने इससे बचा लिया। निश्चय ही वह तो जो कुछ दिलों में होता है उसे भी जानता है
وَاِذْ يُر۪يكُمُوهُمْ اِذِ الْتَقَيْتُمْ ف۪ٓي اَعْيُنِكُمْ قَل۪يلًا وَيُقَلِّلُكُمْ ف۪ٓي اَعْيُنِهِمْ لِيَقْضِيَ اللّٰهُ اَمْرًا كَانَ مَفْعُولًاۜ وَاِلَى اللّٰهِ تُرْجَعُ الْاُمُورُ۟44
याद करो जब तुम्हारी परस्पर मुठभेड़ हुई तो वह तुम्हारी निगाहों में उन्हें कम करके और तुम्हें उनकी निगाहों में कम करके दिखा रहा था, ताकि अल्लाह उस बात का फ़ैसला कर दे जिसका होना निश्चित था। और सारे मामले अल्लाह ही की ओर पलटते है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا لَق۪يتُمْ فِئَةً فَاثْبُتُوا وَاذْكُرُوا اللّٰهَ كَث۪يرًا لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَۚ45
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम्हारा किसी गिरोह से मुक़ाबला हो जाए तो जमे रहो और अल्लाह को ज़्यादा याद करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो
وَاَط۪يعُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَنَازَعُوا فَتَفْشَلُوا وَتَذْهَبَ ر۪يحُكُمْ وَاصْبِرُواۜ اِنَّ اللّٰهَ مَعَ الصَّابِر۪ينَۚ46
और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो और आपस में न झगड़ो, अन्यथा हिम्मत हार बैठोगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी। और धैर्य से काम लो। निश्चय ही, अल्लाह धैर्यवानों के साथ है
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذ۪ينَ خَرَجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ بَطَرًا وَرِئَٓاءَ النَّاسِ وَيَصُدُّونَ عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِۜ وَاللّٰهُ بِمَا يَعْمَلُونَ مُح۪يطٌ47
और उन लोगों की तरह न हो जाना जो अपने घरों से इतराते और लोगों को दिखाते निकले थे और वे अल्लाह के मार्ग से रोकते है, हालाँकि जो कुछ वे करते है, अल्लाह उसे अपने घेरे में लिए हुए है
وَاِذْ زَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ اَعْمَالَهُمْ وَقَالَ لَا غَالِبَ لَكُمُ الْيَوْمَ مِنَ النَّاسِ وَاِنّ۪ي جَارٌ لَكُمْۚ فَلَمَّا تَرَٓاءَتِ الْفِئَتَانِ نَكَصَ عَلٰى عَقِبَيْهِ وَقَالَ اِنّ۪ي بَر۪ٓيءٌ مِنْكُمْ اِنّ۪ٓي اَرٰى مَا لَا تَرَوْنَ اِنّ۪ٓي اَخَافُ اللّٰهَۜ وَاللّٰهُ شَد۪يدُ الْعِقَابِ۟48
और याद करो जब शैतान ने उनके कर्म उनके लिए सुन्दर बना दिए और कहा, "आज लोगों में से कोई भी तुमपर प्रभावी नहीं हो सकता। मैं तुम्हारे साथ हूँ।" किन्तु जब दोनों गिरोह आमने-सामने हुए तो वह उलटे पाँव फिर गया और कहने लगा, "मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं। मैं वह कुछ देख रहा हूँ, जो तुम्हें नहीं दिखाई देता। मैं अल्लाह से डरता हूँ, और अल्लाह कठोर यातना देनेवाला है।"
اِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذ۪ينَ ف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ غَرَّ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ د۪ينُهُمْۜ وَمَنْ يَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِ فَاِنَّ اللّٰهَ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ49
याद करो जब कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है, कह रहे थे, "इन लोगों को तो इनके धर्म ने धोखे में डाल रखा है।" हालाँकि जो अल्लाह पर भरोसा रखता है, तो निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
وَلَوْ تَرٰٓى اِذْ يَتَوَفَّى الَّذ۪ينَ كَفَرُواۙ الْمَلٰٓئِكَةُ يَضْرِبُونَ وُجُوهَهُمْ وَاَدْبَارَهُمْۚ وَذُوقُوا عَذَابَ الْحَر۪يقِ50
क्या ही अच्छा होता कि तुम देखते जब फ़रिश्ते इनकार करनेवालों के प्राण ग्रस्त करते हैं! वे उनके चहरों और उनकी पीठों पर मारते जाते हैं कि "लो अब जलने की यातना मज़ा चखो।" (तो उनकी दुर्दशा का अन्दाजा कर सकते)
ذٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ اَيْد۪يكُمْ وَاَنَّ اللّٰهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِلْعَب۪يدِۙ51
यह तो उसी का बदला है जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजा और यह कि अल्लाह अपने बन्दों पर तनिक भी अत्याचार नहीं करता
كَدَاْبِ اٰلِ فِرْعَوْنَۙ وَالَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ كَفَرُوا بِاٰيَاتِ اللّٰهِ فَاَخَذَهُمُ اللّٰهُ بِذُنُوبِهِمْۜ اِنَّ اللّٰهَ قَوِيٌّ شَد۪يدُ الْعِقَابِ52
इनके साथ वैसा ही मामला पेश आया जैसा फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के लोगों के साथ पेश आया। उन्होंने अल्लाह की आयतों का इनकार किया तो अल्लाह ने उनके गुनाहों के कारण उन्हें पकड़ लिया। निस्संदेह अल्लाह शक्तिशाली, कठोर यातना देनेवाला है
ذٰلِكَ بِاَنَّ اللّٰهَ لَمْ يَكُ مُغَيِّرًا نِعْمَةً اَنْعَمَهَا عَلٰى قَوْمٍ حَتّٰى يُغَيِّرُوا مَا بِاَنْفُسِهِمْۙ وَاَنَّ اللّٰهَ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌۙ53
यह इसलिए हुआ कि अल्लाह उस उदार अनुग्रह (नेमत) को, जो उसने किसी क़ौम पर किया हो, बदलनेवाला नहीं हैं, जब तक कि लोग उस चीज़ को न बदल डालें, जिसका सम्बन्ध स्वयं उनसे है। और यह कि अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
كَدَاْبِ اٰلِ فِرْعَوْنَۙ وَالَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِ رَبِّهِمْۚ فَاَهْلَكْنَاهُمْ بِذُنُوبِهِمْ وَاَغْرَقْنَٓا اٰلَ فِرْعَوْنَۚ وَكُلٌّ كَانُوا ظَالِم۪ينَ54
जैसे फ़िरऔनियों और उनसे पहले के लोगों का हाल हुआ। उन्होंने अपने रब की आयतों को झुठलाया तो हमने उन्हें उनके गुनाहों के बदले में विनष्ट कर दिया और फ़िरऔनियों को डूबो दिया। ये सभी अत्याचारी थे
اِنَّ شَرَّ الدَّوَٓابِّ عِنْدَ اللّٰهِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَۚ55
निश्चय ही, सबसे बुरे प्राणी अल्लाह की स्पष्ट में वे लोग है, जिन्होंने इनकार किया। फिर वे ईमान नहीं लाते
اَلَّذ۪ينَ عَاهَدْتَ مِنْهُمْ ثُمَّ يَنْقُضُونَ عَهْدَهُمْ ف۪ي كُلِّ مَرَّةٍ وَهُمْ لَا يَتَّقُونَ56
जिनसे तुमने वचन लिया वे फिर हर बार अपने वचन को भंग कर देते है और वे डर नहीं रखते
فَاِمَّا تَثْقَفَنَّهُمْ فِي الْحَرْبِ فَشَرِّدْ بِهِمْ مَنْ خَلْفَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ57
अतः यदि युद्ध में तुम उनपर क़ाबू पाओ, तो उनके साथ इस तरह पेश आओ कि उनके पीछेवाले भी भाग खड़े हों, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें
وَاِمَّا تَخَافَنَّ مِنْ قَوْمٍ خِيَانَةً فَانْبِذْ اِلَيْهِمْ عَلٰى سَوَٓاءٍۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ الْخَٓائِن۪ينَ۟58
और यदि तुम्हें किसी क़ौम से विश्वासघात की आशंका हो, तो तुम भी उसी प्रकार ऐसे लोगों के साथ हुई संधि को खुल्लम-खुल्ला उनके आगे फेंक दो। निश्चय ही अल्लाह को विश्वासघात करनेवाले प्रिय नहीं
وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا سَبَقُواۜ اِنَّهُمْ لَا يُعْجِزُونَ59
इनकार करनेवाले यह न समझे कि वे आगे निकल गए। वे क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते
وَاَعِدُّوا لَهُمْ مَا اسْتَطَعْتُمْ مِنْ قُوَّةٍ وَمِنْ رِبَاطِ الْخَيْلِ تُرْهِبُونَ بِه۪ عَدُوَّ اللّٰهِ وَعَدُوَّكُمْ وَاٰخَر۪ينَ مِنْ دُونِهِمْۚ لَا تَعْلَمُونَهُمْۚ اَللّٰهُ يَعْلَمُهُمْۜ وَمَا تُنْفِقُوا مِنْ شَيْءٍ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ يُوَفَّ اِلَيْكُمْ وَاَنْتُمْ لَا تُظْلَمُونَ60
और जो भी तुमसे हो सके, उनके लिए बल और बँधे घोड़े तैयार रखो, ताकि इसके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं और अपने शत्रुओं और इनके अतिरिक्त उन दूसरे लोगों को भी भयभीत कर दो जिन्हें तुम नहीं जानते। अल्लाह उनको जानता है और अल्लाह के मार्ग में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा और तुम्हारे साथ कदापि अन्याय न होगा
وَاِنْ جَنَحُوا لِلسَّلْمِ فَاجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِۜ اِنَّهُ هُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُ61
और यदि वे संधि और सलामती की ओर झुकें तो तुम भी इसके लिए झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो। निस्संदेह, वह सब कुछ सुनता, जानता है
وَاِنْ يُر۪يدُٓوا اَنْ يَخْدَعُوكَ فَاِنَّ حَسْبَكَ اللّٰهُۜ هُوَ الَّذ۪ٓي اَيَّدَكَ بِنَصْرِه۪ وَبِالْمُؤْمِن۪ينَۙ62
और यदि वे यह चाहें कि तुम्हें धोखा दें तो तुम्हारे लिए अल्लाह काफ़ी है। वही तो है जिसने तुम्हें अपनी सहायता से और मोमिनों के द्वारा शक्ति प्रदान की
وَاَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِهِمْۜ لَوْ اَنْفَقْتَ مَا فِي الْاَرْضِ جَم۪يعًا مَٓا اَلَّفْتَ بَيْنَ قُلُوبِهِمْ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ اَلَّفَ بَيْنَهُمْۜ اِنَّهُ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ63
और उनके दिल आपस में एक-दूसरे से जोड़ दिए। यदि तुम धरती में जो कुछ है, सब खर्च कर डालते तो भी उनके दिलों को परस्पर जोड़ न सकते, किन्तु अल्लाह ने उन्हें परस्पर जोड़ दिया। निश्चय ही वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ حَسْبُكَ اللّٰهُ وَمَنِ اتَّبَعَكَ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ۟64
ऐ नबी! तुम्हारे लिए अल्लाह और तुम्हारे ईमानवाले अनुयायी ही काफ़ी है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ حَرِّضِ الْمُؤْمِن۪ينَ عَلَى الْقِتَالِۜ اِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ عِشْرُونَ صَابِرُونَ يَغْلِبُوا مِائَتَيْنِۚ وَاِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ مِائَةٌ يَغْلِبُٓوا اَلْفًا مِنَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِاَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَفْقَهُونَ65
ऐ नबी! मोमिनों को जिहाद पर उभारो। यदि तुम्हारे बीस आदमी जमे होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी होंगे और यदि तुमसे से ऐसे सौ होंगे तो वे इनकार करनेवालों में से एक हज़ार पर प्रभावी होंगे, क्योंकि वे नासमझ लोग है
اَلْـٰٔنَ خَفَّفَ اللّٰهُ عَنْكُمْ وَعَلِمَ اَنَّ ف۪يكُمْ ضَعْفًاۜ فَاِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ مِائَةٌ صَابِرَةٌ يَغْلِبُوا مِائَتَيْنِۚ وَاِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ اَلْفٌ يَغْلِبُٓوا اَلْفَيْنِ بِاِذْنِ اللّٰهِۜ وَاللّٰهُ مَعَ الصَّابِر۪ينَ66
अब अल्लाह ने तुम्हारे बोझ हल्का कर दिया और उसे मालूम हुआ कि तुममें कुछ कमज़ोरी है। तो यदि तुम्हारे सौ आदमी जमे रहनेवाले होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी रहेंगे और यदि तुममें से ऐसे हजार होंगे तो अल्लाह के हुक्म से वे दो हज़ार पर प्रभावी रहेंगे। अल्लाह तो उन्ही लोगों के साथ है जो जमे रहते है
مَا كَانَ لِنَبِيٍّ اَنْ يَكُونَ لَهُٓ اَسْرٰى حَتّٰى يُثْخِنَ فِي الْاَرْضِۜ تُر۪يدُونَ عَرَضَ الدُّنْيَاۗ وَاللّٰهُ يُر۪يدُ الْاٰخِرَةَۜ وَاللّٰهُ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ67
किसी नबी के लिए यह उचित नहीं कि उसके पास क़ैदी हो यहाँ तक की वह धरती में रक्तपात करे। तुम लोग संसार की सामग्री चाहते हो, जबकि अल्लाह आख़िरत चाहता है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
لَوْلَا كِتَابٌ مِنَ اللّٰهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ ف۪يمَٓا اَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظ۪يمٌ68
यदि अल्लाह का लिखा पहले से मौजूद न होता, तो जो कुछ नीति तुमने अपनाई है उसपर तुम्हें कोई बड़ी यातना आ लेती
فَكُلُوا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلَالًا طَيِّبًاۘ وَاتَّقُوا اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ۟69
अतः जो कुछ ग़नीमत का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِمَنْ ف۪ٓي اَيْد۪يكُمْ مِنَ الْاَسْرٰٓىۙ اِنْ يَعْلَمِ اللّٰهُ ف۪ي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِمَّٓا اُخِذَ مِنْكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ70
ऐ नबी! जो क़ैदी तुम्हारे क़ब्जें में है, उनसे कह दो, "यदि अल्लाह ने यह जान लिया कि तुम्हारे दिलों में कुछ भलाई है तो वह तुम्हें उससे कहीं उत्तम प्रदान करेगा, जो तुम से छिन गया है और तुम्हें क्षमा कर देगा। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।"
وَاِنْ يُر۪يدُوا خِيَانَتَكَ فَقَدْ خَانُوا اللّٰهَ مِنْ قَبْلُ فَاَمْكَنَ مِنْهُمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ71
किन्तुम यदि वे तुम्हारे साथ विश्वासघात करना चाहेंगे, तो इससे पहले वे अल्लाह के साथ विश्वासघात कर चुके है। तो उसने तुम्हें उनपर अधिकार दे दिया। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ा तत्वदर्शी है
اِنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَالَّذ۪ينَ اٰوَوْا وَنَصَرُٓوا اُو۬لٰٓئِكَ بَعْضُهُمْ اَوْلِيَٓاءُ بَعْضٍۜ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَلَمْ يُهَاجِرُوا مَا لَكُمْ مِنْ وَلَايَتِهِمْ مِنْ شَيْءٍ حَتّٰى يُهَاجِرُواۚ وَاِنِ اسْتَنْصَرُوكُمْ فِي الدّ۪ينِ فَعَلَيْكُمُ النَّصْرُ اِلَّا عَلٰى قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ م۪يثَاقٌۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ72
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की, वही लोग परस्पर एक-दूसरे के संरक्षक मित्र है। रहे वे लोग जो ईमान लाए, किन्तु उन्होंने हिजरत नहीं की, उनसे तुम्हारा संरक्षण और मित्रता का कोई सम्बन्ध नहीं है, जब तक कि वे हिजरत न करें, किन्तु यदि वे धर्म के मामले में तुमसे सहायता माँगे तो तुमपर अनिवार्य है कि सहायता करो, सिवाय इसके कि सहायता किसी ऐसी क़ौम के मुक़ाबले में हो जिससे तुम्हारी कोई संधि हो। तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसे देखता है
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا بَعْضُهُمْ اَوْلِيَٓاءُ بَعْضٍۜ اِلَّا تَفْعَلُوهُ تَكُنْ فِتْنَةٌ فِي الْاَرْضِ وَفَسَادٌ كَب۪يرٌۜ73
जो इनकार करनेवाले लोग है, वे आपस में एक-दूसरे के मित्र और सहायक है। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो धरती में फ़ितना और बड़ा फ़साद फैलेगा
وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَالَّذ۪ينَ اٰوَوْا وَنَصَرُٓوا اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُؤْمِنُونَ حَقًّاۜ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَر۪يمٌ74
और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की वही सच्चे मोमिन हैं। उनके क्षमा और सम्मानित - उत्तम आजीविका है
وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مِنْ بَعْدُ وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا مَعَكُمْ فَاُو۬لٰٓئِكَ مِنْكُمْۜ وَاُو۬لُوا الْاَرْحَامِ بَعْضُهُمْ اَوْلٰى بِبَعْضٍ ف۪ي كِتَابِ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ75
और जो लोग बाद में ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया तो ऐसे लोग भी तुम में ही से हैं। किन्तु अल्लाह की किताब मे ख़ून के रिश्तेदार एक-दूसरे के ज़्यादा हक़दार है। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है