30. जुज़ - कुरान पढ़ें
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بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
عَمَّ يَتَسَٓاءَلُونَۚ1
किस चीज़ के विषय में वे आपस में पूछ-गच्छ कर रहे है?
عَنِ النَّبَاِ الْعَظ۪يمِۙ2
उस बड़ी ख़बर के सम्बन्ध में,
اَلَّذ۪ي هُمْ ف۪يهِ مُخْتَلِفُونَۜ3
जिसमें वे मतभेद रखते है
كَلَّا سَيَعْلَمُونَۙ4
कदापि नहीं, शीघ्र ही वे जान लेंगे।
ثُمَّ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ5
फिर कदापि नहीं, शीघ्र ही वे जान लेंगे।
اَلَمْ نَجْعَلِ الْاَرْضَ مِهَادًاۙ6
क्या ऐसा नहीं है कि हमने धरती को बिछौना बनाया
وَالْجِبَالَ اَوْتَادًاۖ7
और पहाड़ों को मेख़े?
وَخَلَقْنَاكُمْ اَزْوَاجًاۙ8
और हमने तुम्हें जोड़-जोड़े पैदा किया,
وَجَعَلْنَا نَوْمَكُمْ سُبَاتًاۙ9
और तुम्हारी नींद को थकन दूर करनेवाली बनाया,
وَجَعَلْنَا الَّيْلَ لِبَاسًاۙ10
रात को आवरण बनाया,
وَجَعَلْنَا النَّهَارَ مَعَاشًاۖ11
और दिन को जीवन-वृति के लिए बनाया
وَبَنَيْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعًا شِدَادًاۙ12
और तुम्हारे ऊपर सात सुदृढ़ आकाश निर्मित किए,
وَجَعَلْنَا سِرَاجًا وَهَّاجًاۖ13
और एक तप्त और प्रकाशमान प्रदीप बनाया,
وَاَنْزَلْنَا مِنَ الْمُعْصِرَاتِ مَٓاءً ثَجَّاجًاۙ14
और बरस पड़नेवाली घटाओं से हमने मूसलाधार पानी उतारा,
لِنُخْرِجَ بِه۪ حَبًّا وَنَبَاتًاۙ15
ताकि हम उसके द्वारा अनाज और वनस्पति उत्पादित करें
وَجَنَّاتٍ اَلْفَافًاۜ16
और सघन बांग़ भी।
اِنَّ يَوْمَ الْفَصْلِ كَانَ م۪يقَاتًاۙ17
निस्संदेह फ़ैसले का दिन एक नियत समय है,
يَوْمَ يُنْفَخُ فِي الصُّورِ فَتَاْتُونَ اَفْوَاجًاۙ18
जिस दिन नरसिंघा में फूँक मारी जाएगी, तो तुम गिरोह को गिरोह चले आओगे।
وَفُتِحَتِ السَّمَٓاءُ فَكَانَتْ اَبْوَابًاۙ19
और आकाश खोल दिया जाएगा तो द्वार ही द्वार हो जाएँगे;
وَسُيِّرَتِ الْجِبَالُ فَكَانَتْ سَرَابًاۜ20
और पहाड़ चलाए जाएँगे, तो वे बिल्कुल मरीचिका होकर रह जाएँगे
اِنَّ جَهَنَّمَ كَانَتْ مِرْصَادًاۙ21
वास्तव में जहन्नम एक घात-स्थल है;
لِلطَّاغ۪ينَ مَاٰبًاۙ22
सरकशों का ठिकाना है
لَابِث۪ينَ ف۪يهَٓا اَحْقَابًاۚ23
वस्तुस्थिति यह है कि वे उसमें मुद्दत पर मुद्दत बिताते रहेंगे
لَا يَذُوقُونَ ف۪يهَا بَرْدًا وَلَا شَرَابًاۙ24
वे उसमे न किसी शीतलता का मज़ा चखेगे और न किसी पेय का,
اِلَّا حَم۪يمًا وَغَسَّاقًاۙ25
सिवाय खौलते पानी और बहती पीप-रक्त के
جَزَٓاءً وِفَاقًا26
यह बदले के रूप में उनके कर्मों के ठीक अनुकूल होगा
اِنَّهُمْ كَانُوا لَا يَرْجُونَ حِسَابًاۙ27
वास्तव में किसी हिसाब की आशा न रखते थे,
وَكَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَا كِذَّابًاۜ28
और उन्होंने हमारी आयतों को ख़ूब झुठलाया,
وَكُلَّ شَيْءٍ اَحْصَيْنَاهُ كِتَابًا29
और हमने हर चीज़ लिखकर गिन रखी है
فَذُوقُوا فَلَنْ نَز۪يدَكُمْ اِلَّا عَذَابًا۟30
"अब चखो मज़ा कि यातना के अतिरिक्त हम तुम्हारे लिए किसी और चीज़ में बढ़ोत्तरी नहीं करेंगे। "
اِنَّ لِلْمُتَّق۪ينَ مَفَازًاۙ31
निस्सदेह डर रखनेवालों के लिए एक बड़ी सफलता है,
حَدَٓائِقَ وَاَعْنَابًاۙ32
बाग़ है और अंगूर,
وَكَوَاعِبَ اَتْرَابًاۙ33
और नवयौवना समान उम्रवाली,
وَكَاْسًا دِهَاقًاۜ34
और छलक़ता जाम
لَا يَسْمَعُونَ ف۪يهَا لَغْوًا وَلَا كِذَّابًاۚ35
वे उसमें न तो कोई व्यर्थ बात सुनेंगे और न कोई झुठलाने की बात
جَزَٓاءً مِنْ رَبِّكَ عَطَٓاءً حِسَابًاۙ36
यह तुम्हारे रब की ओर से बदला होगा, हिसाब के अनुसार प्रदत्त
رَبِّ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَاۙ الرَّحْمٰنِ لَا يَمْلِكُونَ مِنْهُ خِطَابًاۙ37
वह आकाशों और धरती का और जो कुछ उनके बीच है सबका रब है, अत्यन्त कृपाशील है, उसके सामने बात करना उनके बस में नहीं होगा
يَوْمَ يَقُومُ الرُّوحُ وَالْمَلٰٓئِكَةُ صَفًّاۜ لَا يَتَكَلَّمُونَ اِلَّا مَنْ اَذِنَ لَهُ الرَّحْمٰنُ وَقَالَ صَوَابًا38
जिस दिन रूह और फ़रिश्ते पक्तिबद्ध खड़े होंगे, वे बोलेंगे नहीं, सिवाय उस व्यक्ति के जिसे रहमान अनुमति दे और जो ठीक बात कहे
ذٰلِكَ الْيَوْمُ الْحَقُّۚ فَمَنْ شَٓاءَ اتَّخَذَ اِلٰى رَبِّه۪ مَاٰبًا39
वह दिन सत्य है। अब जो कोई चाहे अपने रब की ओर रुज करे
اِنَّٓا اَنْذَرْنَاكُمْ عَذَابًا قَر۪يبًاۚ يَوْمَ يَنْظُرُ الْمَرْءُ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ وَيَقُولُ الْكَافِرُ يَا لَيْتَن۪ي كُنْتُ تُرَابًا40
हमने तुम्हें निकट आ लगी यातना से सावधान कर दिया है। जिस दिन मनुष्य देख लेगा जो कुछ उसके हाथों ने आगे भेजा, और इनकार करनेवाला कहेगा, "ऐ काश! कि मैं मिट्टी होता!"
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالنَّازِعَاتِ غَرْقًاۙ1
गवाह है वे (हवाएँ) जो ज़ोर से उखाड़ फैंके,
وَالنَّاشِطَاتِ نَشْطًاۙ2
और गवाह है वे (हवाएँ) जो नर्मी के साथ चलें,
وَالسَّابِحَاتِ سَبْحًاۙ3
और गवाह है वे जो वायुमंडल में तैरें,
فَالسَّابِقَاتِ سَبْقًاۙ4
फिर एक-दूसरे से अग्रसर हों,
فَالْمُدَبِّرَاتِ اَمْرًاۢ5
और मामले की तदबीर करें
يَوْمَ تَرْجُفُ الرَّاجِفَةُۙ6
जिस दिन हिला डालेगी हिला डालनेवाले घटना,
تَتْبَعُهَا الرَّادِفَةُۜ7
उसके पीछ घटित होगी दूसरी (घटना)
قُلُوبٌ يَوْمَئِذٍ وَاجِفَةٌۙ8
कितने ही दिल उस दिन काँप रहे होंगे,
اَبْصَارُهَا خَاشِعَةٌۢ9
उनकी निगाहें झुकी होंगी
يَقُولُونَ ءَاِنَّا لَمَرْدُودُونَ فِي الْحَافِرَةِۜ10
वे कहते है, "क्या वास्तव में हम पहली हालत में फिर लौटाए जाएँगे?
ءَاِذَا كُنَّا عِظَامًا نَخِرَةًۜ11
क्या जब हम खोखली गलित हड्डियाँ हो चुके होंगे?"
قَالُوا تِلْكَ اِذًا كَرَّةٌ خَاسِرَةٌۢ12
वे कहते है, "तब तो लौटना बड़े ही घाटे का होगा।"
فَاِنَّمَا هِيَ زَجْرَةٌ وَاحِدَةٌۙ13
वह तो बस एक ही झिड़की होगी,
فَاِذَا هُمْ بِالسَّاهِرَةِۜ14
फिर क्या देखेंगे कि वे एक समतल मैदान में उपस्थित है
هَلْ اَتٰيكَ حَد۪يثُ مُوسٰىۢ15
क्या तुम्हें मूसा की ख़बर पहुँची है?
اِذْ نَادٰيهُ رَبُّهُ بِالْوَادِ الْمُقَدَّسِ طُوًىۚ16
जबकि उसके रब ने पवित्र घाटी 'तुवा' में उसे पुकारा था
اِذْهَبْ اِلٰى فِرْعَوْنَ اِنَّهُ طَغٰىۘ17
कि "फ़िरऔन के पास जाओ, उसने बहुत सिर उठा रखा है
فَقُلْ هَلْ لَكَ اِلٰٓى اَنْ تَزَكّٰىۙ18
"और कहो, क्या तू यह चाहता है कि स्वयं को पाक-साफ़ कर ले,
وَاَهْدِيَكَ اِلٰى رَبِّكَ فَتَخْشٰىۚ19
"और मैं तेरे रब की ओर तेरा मार्गदर्शन करूँ कि तु (उससे) डरे?"
فَاَرٰيهُ الْاٰيَةَ الْكُبْرٰىۘ20
फिर उसने (मूसा ने) उसको बड़ी निशानी दिखाई,
فَكَذَّبَ وَعَصٰىۘ21
किन्तु उसने झुठला दिया और कहा न माना,
ثُمَّ اَدْبَرَ يَسْعٰىۘ22
फिर सक्रियता दिखाते हुए पलटा,
فَحَشَرَ فَنَادٰىۘ23
फिर (लोगों को) एकत्र किया और पुकारकर कहा,
فَقَالَ اَنَا۬ رَبُّكُمُ الْاَعْلٰىۘ24
"मैं तुम्हारा उच्चकोटि का स्वामी हूँ!"
فَاَخَذَهُ اللّٰهُ نَكَالَ الْاٰخِرَةِ وَالْاُو۫لٰىۜ25
अन्ततः अल्लाह ने उसे आख़िरत और दुनिया की शिक्षाप्रद यातना में पकड़ लिया
اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَعِبْرَةً لِمَنْ يَخْشٰىۜ۟26
निस्संदेह इसमें उस व्यक्ति के लिए बड़ी शिक्षा है जो डरे!
ءَاَنْتُمْ اَشَدُّ خَلْقًا اَمِ السَّمَٓاءُۜ بَنٰيهَا۠27
क्या तुम्हें पैदा करना अधिक कठिन कार्य है या आकाश को? अल्लाह ने उसे बनाया,
رَفَعَ سَمْكَهَا فَسَوّٰيهَاۙ28
उसकी ऊँचाई को ख़ूब ऊँचा करके उसे ठीक-ठाक किया;
وَاَغْطَشَ لَيْلَهَا وَاَخْرَجَ ضُحٰيهَاۖ29
और उसकी रात को अन्धकारमय बनाया और उसका दिवस-प्रकाश प्रकट किया
وَالْاَرْضَ بَعْدَ ذٰلِكَ دَحٰيهَاۜ30
और धरती को देखो! इसके पश्चात उसे फैलाया;
اَخْرَجَ مِنْهَا مَٓاءَهَا وَمَرْعٰيهَاۖ31
उसमें से उसका पानी और उसका चारा निकाला
وَالْجِبَالَ اَرْسٰيهَاۙ32
और पहाड़ो को देखो! उन्हें उस (धरती) में जमा दिया,
مَتَاعًا لَكُمْ وَلِاَنْعَامِكُمْۜ33
तुम्हारे लिए और तुम्हारे मवेशियों के लिए जीवन-सामग्री के रूप में
فَاِذَا جَٓاءَتِ الطَّٓامَّةُ الْكُبْرٰىۘ34
फिर जब वह महाविपदा आएगी,
يَوْمَ يَتَذَكَّرُ الْاِنْسَانُ مَا سَعٰىۙ35
उस दिन मनुष्य जो कुछ भी उसने प्रयास किया होगा उसे याद करेगा
وَبُرِّزَتِ الْجَح۪يمُ لِمَنْ يَرٰى36
और भड़कती आग (जहन्नम) देखने वालों के लिए खोल दी जाएगी
فَاَمَّا مَنْ طَغٰىۙ37
तो जिस किसी ने सरकशी की
وَاٰثَرَ الْحَيٰوةَ الدُّنْيَاۙ38
और सांसारिक जीवन को प्राथमिकता दो होगी,
فَاِنَّ الْجَح۪يمَ هِيَ الْمَاْوٰىۜ39
तो निस्संदेह भड़कती आग ही उसका ठिकाना है
وَاَمَّا مَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّه۪ وَنَهَى النَّفْسَ عَنِ الْهَوٰىۙ40
और रहा वह व्यक्ति जिसने अपने रब के सामने खड़े होने का भय रखा और अपने जी को बुरी इच्छा से रोका,
فَاِنَّ الْجَنَّةَ هِيَ الْمَاْوٰىۜ41
तो जन्नत ही उसका ठिकाना है
يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ السَّاعَةِ اَيَّانَ مُرْسٰيهَاۜ42
वे तुमसे उस घड़ी के विषय में पूछते है कि वह कब आकर ठहरेगी?
ف۪يمَ اَنْتَ مِنْ ذِكْرٰيهَاۜ43
उसके बयान करने से तुम्हारा क्या सम्बन्ध?
اِلٰى رَبِّكَ مُنْتَهٰيهَاۜ44
उसकी अन्तिम पहुँच तो तेरे से ही सम्बन्ध रखती है
اِنَّمَٓا اَنْتَ مُنْذِرُ مَنْ يَخْشٰيهَاۜ45
तुम तो बस उस व्यक्ति को सावधान करनेवाले हो जो उससे डरे
كَاَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَهَا لَمْ يَلْبَثُٓوا اِلَّا عَشِيَّةً اَوْ ضُحٰيهَا46
जिस दिन वे उसे देखेंगे तो (ऐसा लगेगा) मानो वे (दुनिया में) बस एक शाम या उसकी सुबह ही ठहरे है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
عَبَسَ وَتَوَلّٰىۙ1
उसने त्योरी चढ़ाई और मुँह फेर लिया,
اَنْ جَٓاءَهُ الْاَعْمٰىۜ2
इस कारण कि उसके पास अन्धा आ गया।
وَمَا يُدْر۪يكَ لَعَلَّهُ يَزَّكّٰىۙ3
और तुझे क्या मालूम शायद वह स्वयं को सँवारता-निखारता हो
اَوْ يَذَّكَّرُ فَتَنْفَعَهُ الذِّكْرٰىۜ4
या नसीहत हासिल करता हो तो नसीहत उसके लिए लाभदायक हो?
اَمَّا مَنِ اسْتَغْنٰىۙ5
रहा वह व्यक्ति जो धनी हो गया ह
فَاَنْتَ لَهُ تَصَدّٰىۜ6
तू उसके पीछे पड़ा है -
وَمَا عَلَيْكَ اَلَّا يَزَّكّٰىۜ7
हालाँकि वह अपने को न निखारे तो तुझपर कोई ज़िम्मेदारी नहीं आती -
وَاَمَّا مَنْ جَٓاءَكَ يَسْعٰىۙ8
और रहा वह व्यक्ति जो स्वयं ही तेरे पास दौड़ता हुआ आया,
وَهُوَ يَخْشٰىۙ9
और वह डरता भी है,
فَاَنْتَ عَنْهُ تَلَهّٰىۚ10
तो तू उससे बेपरवाई करता है
كَلَّٓا اِنَّهَا تَذْكِرَةٌۚ11
कदापि नहीं, वे (आयतें) तो महत्वपूर्ण नसीहत है -
فَمَنْ شَٓاءَ ذَكَرَهُۢ12
तो जो चाहे उसे याद कर ले -
ف۪ي صُحُفٍ مُكَرَّمَةٍۙ13
पवित्र पन्नों में अंकित है,
مَرْفُوعَةٍ مُطَهَّرَةٍۙ14
प्रतिष्ठि्त, उच्च,
بِاَيْد۪ي سَفَرَةٍۙ15
ऐसे कातिबों के हाथों में रहा करते है
كِرَامٍ بَرَرَةٍۜ16
जो प्रतिष्ठित और नेक है
قُتِلَ الْاِنْسَانُ مَٓا اَكْفَرَهُۜ17
विनष्ट हुआ मनुष्य! कैसा अकृतज्ञ है!
مِنْ اَيِّ شَيْءٍ خَلَقَهُۜ18
उसको किस चीज़ से पैदा किया?
مِنْ نُطْفَةٍۜ خَلَقَهُ فَقَدَّرَهُۙ19
तनिक-सी बूँद से उसको पैदा किया, तो उसके लिए एक अंदाजा ठहराया,
ثُمَّ السَّب۪يلَ يَسَّرَهُۙ20
फिर मार्ग को देखो, उसे सुगम कर दिया,
ثُمَّ اَمَاتَهُ فَاَقْبَرَهُۙ21
फिर उसे मृत्यु दी और क्रब में उसे रखवाया,
ثُمَّ اِذَا شَٓاءَ اَنْشَرَهُ22
फिर जब चाहेगा उसे (जीवित करके) उठा खड़ा करेगा। -
كَلَّا لَمَّا يَقْضِ مَٓا اَمَرَهُۙ23
कदापि नहीं, उसने उसको पूरा नहीं किया जिसका आदेश अल्लाह ने उसे दिया है
فَلْيَنْظُرِ الْاِنْسَانُ اِلٰى طَعَامِه۪ۙ24
अतः मनुष्य को चाहिए कि अपने भोजन को देखे,
اَنَّا صَبَبْنَا الْمَٓاءَ صَبًّاۙ25
कि हमने ख़ूब पानी बरसाया,
ثُمَّ شَقَقْنَا الْاَرْضَ شَقًّاۙ26
फिर धरती को विशेष रूप से फाड़ा,
فَاَنْبَتْنَا ف۪يهَا حَبًّاۙ27
फिर हमने उसमें उगाए अनाज,
وَعِنَبًا وَقَضْبًاۙ28
और अंगूर और तरकारी,
وَزَيْتُونًا وَنَخْلًاۙ29
और ज़ैतून और खजूर,
وَحَدَٓائِقَ غُلْبًاۙ30
और घने बाग़,
وَفَاكِهَةً وَاَبًّاۙ31
और मेवे और घास-चारा,
مَتَاعًا لَكُمْ وَلِاَنْعَامِكُمْۜ32
तुम्हारे लिए और तुम्हारे चौपायों के लिेए जीवन-सामग्री के रूप में
فَاِذَا جَٓاءَتِ الصَّٓاخَّةُۘ33
फिर जब वह बहरा कर देनेवाली प्रचंड आवाज़ आएगी,
يَوْمَ يَفِرُّ الْمَرْءُ مِنْ اَخ۪يهِۙ34
जिस दिन आदमी भागेगा अपने भाई से,
وَاُمِّهِ وَاَب۪يهِۙ35
और अपनी माँ और अपने बाप से,
وَصَاحِبَتِه۪ وَبَن۪يهِۜ36
और अपनी पत्नी और अपने बेटों से
لِكُلِّ امْرِئٍ مِنْهُمْ يَوْمَئِذٍ شَاْنٌ يُغْن۪يهِۜ37
उनमें से प्रत्येक व्यक्ति को उस दिन ऐसी पड़ी होगी जो उसे दूसरों से बेपरवाह कर देगी
وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ مُسْفِرَةٌۙ38
कितने ही चेहरे उस दिन रौशन होंगे,
ضَاحِكَةٌ مُسْتَبْشِرَةٌۚ39
हँसते, प्रफुल्लित
وَوُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ عَلَيْهَا غَبَرَةٌۙ40
और कितने ही चेहरे होंगे जिनपर उस दिन धूल पड़ी होगी,
تَرْهَقُهَا قَتَرَةٌۜ41
उनपर कलौंस छा रही होगी
اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْكَفَرَةُ الْفَجَرَةُ42
वहीं होंगे इनकार करनेवाले दुराचारी लोग!
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِذَا الشَّمْسُ كُوِّرَتْۙۖ1
जब सूर्य लपेट दिया जाएगा,
وَاِذَا النُّجُومُ انْكَدَرَتْۙۖ2
सारे तारे मैले हो जाएँगे,
وَاِذَا الْجِبَالُ سُيِّرَتْۙۖ3
जब पहाड़ चलाए जाएँगे,
وَاِذَا الْعِشَارُ عُطِّلَتْۙۖ4
जब दस मास की गाभिन ऊँटनियाँ आज़ाद छोड़ दी जाएँगी,
وَاِذَا الْوُحُوشُ حُشِرَتْۙۖ5
जब जंगली जानवर एकत्र किए जाएँगे,
وَاِذَا الْبِحَارُ سُجِّرَتْۙۖ6
जब समुद्र भड़का दिया जाएँगे,
وَاِذَا النُّفُوسُ زُوِّجَتْۙۖ7
जब लोग क़िस्म-क़िस्म कर दिए जाएँगे,
وَاِذَا الْمَوْءُ۫دَةُ سُئِلَتْۙ8
और जब जीवित गाड़ी गई लड़की से पूछा जाएगा,
بِاَيِّ ذَنْبٍ قُتِلَتْۚ9
कि उसकी हत्या किस गुनाह के कारण की गई,
وَاِذَا الصُّحُفُ نُشِرَتْۙۖ10
और जब कर्म-पत्र फैला दिए जाएँगे,
وَاِذَا السَّمَٓاءُ كُشِطَتْۙۖ11
और जब आकाश की खाल उतार दी जाएगी,
وَاِذَا الْجَح۪يمُ سُعِّرَتْۙۖ12
जब जहन्नम को दहकाया जाएगा,
وَاِذَا الْجَنَّةُ اُزْلِفَتْۙۖ13
और जब जन्नत निकट कर दी जाएगी,
عَلِمَتْ نَفْسٌ مَٓا اَحْضَرَتْۜ14
तो कोई भी क्यक्ति जान लेगा कि उसने क्या उपस्थित किया है
فَلَٓا اُقْسِمُ بِالْخُنَّسِۙ15
अतः नहीं! मैं क़सम खाता हूँ पीछे हटनेवालों की,
اَلْجَوَارِ الْكُنَّسِۙ16
चलनेवालों, छिपने-दुबकने-वालों की
وَالَّيْلِ اِذَا عَسْعَسَۙ17
साक्षी है रात्रि जब वह प्रस्थान करे,
وَالصُّبْحِ اِذَا تَنَفَّسَۙ18
और साक्षी है प्रातः जब वह साँस ले
اِنَّهُ لَقَوْلُ رَسُولٍ كَر۪يمٍۙ19
निश्चय ही वह एक आदरणीय संदेशवाहक की लाई हुई वाणी है,
ذ۪ي قُوَّةٍ عِنْدَ ذِي الْعَرْشِ مَك۪ينٍۙ20
जो शक्तिवाला है, सिंहासनवाले के यहाँ जिसकी पैठ है
مُطَاعٍ ثَمَّ اَم۪ينٍۜ21
उसका आदेश माना जाता है, वहाँ वह विश्वासपात्र है
وَمَا صَاحِبُكُمْ بِمَجْنُونٍۚ22
तुम्हारा साथी कोई दीवाना नहीं,
وَلَقَدْ رَاٰهُ بِالْاُفُقِ الْمُب۪ينِۚ23
उसने तो (पराकाष्ठान के) प्रत्यक्ष क्षितिज पर होकर उस (फ़रिश्ते) को देखा है
وَمَا هُوَ عَلَى الْغَيْبِ بِضَن۪ينٍۚ24
और वह परोक्ष के मामले में कृपण नहीं है,
وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَيْطَانٍ رَج۪يمٍۚ25
और वह (क़ुरआन) किसी धुतकारे हुए शैतान की लाई हुई वाणी नहीं है
فَاَيْنَ تَذْهَبُونَۜ26
फिर तुम किधर जा रहे हो?
اِنْ هُوَ اِلَّا ذِكْرٌ لِلْعَالَم۪ينَۙ27
वह तो सारे संसार के लिए बस एक अनुस्मृति है,
لِمَنْ شَٓاءَ مِنْكُمْ اَنْ يَسْتَق۪يمَ28
उसके लिए तो तुममे से सीधे मार्ग पर चलना चाहे
وَمَا تَشَٓاؤُ۫نَ اِلَّٓا اَنْ يَشَٓاءَ اللّٰهُ رَبُّ الْعَالَم۪ينَ29
और तुम नहीं चाह सकते सिवाय इसके कि सारे जहान का रब अल्लाह चाहे
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِذَا السَّمَٓاءُ انْفَطَرَتْۙ1
जबकि आकाश फट जाएगा
وَاِذَا الْكَوَاكِبُ انْتَثَرَتْۙ2
और जबकि तारे बिखर जाएँगे
وَاِذَا الْبِحَارُ فُجِّرَتْۙ3
और जबकि समुद्र बह पड़ेंगे
وَاِذَا الْقُبُورُ بُعْثِرَتْۙ4
और जबकि क़बें उखेड़ दी जाएँगी
عَلِمَتْ نَفْسٌ مَا قَدَّمَتْ وَاَخَّرَتْۜ5
तब हर व्यक्ति जान लेगा जिसे उसने प्राथमिकता दी और पीछे डाला
يَٓا اَيُّهَا الْاِنْسَانُ مَا غَرَّكَ بِرَبِّكَ الْكَر۪يمِۙ6
ऐ मनुष्य! किस चीज़ ने तुझे अपने उदार प्रभु के विषय में धोखे में डाल रखा हैं?
اَلَّذ۪ي خَلَقَكَ فَسَوّٰيكَ فَعَدَلَكَۙ7
जिसने तेरा प्रारूप बनाया, फिर नख-शिख से तुझे दुरुस्त किया और तुझे संतुलन प्रदान किया
ف۪ٓي اَيِّ صُورَةٍ مَا شَٓاءَ رَكَّبَكَۜ8
जिस रूप में चाहा उसने तुझे जोड़कर तैयार किया
كَلَّا بَلْ تُكَذِّبُونَ بِالدّ۪ينِۙ9
कुछ नहीं, बल्कि तुम बदला दिए जाने का झुठलाते हो
وَاِنَّ عَلَيْكُمْ لَحَافِظ۪ينَۙ10
जबकि तुमपर निगरानी करनेवाले नियुक्त हैं
كِرَامًا كَاتِب۪ينَۙ11
प्रतिष्ठित लिपिक
يَعْلَمُونَ مَا تَفْعَلُونَ12
वे जान रहे होते है जो कुछ भी तुम लोग करते हो
اِنَّ الْاَبْرَارَ لَف۪ي نَع۪يمٍۚ13
निस्संदेह वफ़ादार लोग नेमतों में होंगे
وَاِنَّ الْفُجَّارَ لَف۪ي جَح۪يمٍۚ14
और निश्चय ही दुराचारी भड़कती हुई आग में
يَصْلَوْنَهَا يَوْمَ الدّ۪ينِ15
जिसमें वे बदले के दिन प्रवेश करेंगे
وَمَا هُمْ عَنْهَا بِغَٓائِب۪ينَۜ16
और उससे वे ओझल नहीं होंगे
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا يَوْمُ الدّ۪ينِۙ17
और तुम्हें क्या मालूम कि बदले का दिन क्या है?
ثُمَّ مَٓا اَدْرٰيكَ مَا يَوْمُ الدّ۪ينِۜ18
फिर तुम्हें क्या मालूम कि बदले का दिन क्या है?
يَوْمَ لَا تَمْلِكُ نَفْسٌ لِنَفْسٍ شَيْـًٔاۜ وَالْاَمْرُ يَوْمَئِذٍ لِلّٰهِ19
जिस दिन कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के लिए किसी चीज़ का अधिकारी न होगा, मामला उस दिन अल्लाह ही के हाथ में होगा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَيْلٌ لِلْمُطَفِّف۪ينَۙ1
तबाही है घटानेवालों के लिए,
اَلَّذ۪ينَ اِذَا اكْتَالُوا عَلَى النَّاسِ يَسْتَوْفُونَۘ2
जो नापकर लोगों पर नज़र जमाए हुए लेते हैं तो पूरा-पूरा लेते हैं,
وَاِذَا كَالُوهُمْ اَوْ وَزَنُوهُمْ يُخْسِرُونَۜ3
किन्तु जब उन्हें नापकर या तौलकर देते हैं तो घटाकर देते हैं
اَلَا يَظُنُّ اُو۬لٰٓئِكَ اَنَّهُمْ مَبْعُوثُونَۙ4
क्या वे समझते नहीं कि उन्हें (जीवित होकर) उठना है,
لِيَوْمٍ عَظ۪يمٍۙ5
एक भारी दिन के लिए,
يَوْمَ يَقُومُ النَّاسُ لِرَبِّ الْعَالَم۪ينَۜ6
जिस दिन लोग सारे संसार के रब के सामने खड़े होंगे?
كَلَّٓا اِنَّ كِتَابَ الْفُجَّارِ لَف۪ي سِجّ۪ينٍۜ7
कुछ नहीं, निश्चय ही दुराचारियों का काग़ज 'सिज्जीन' में है
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا سِجّ۪ينٌۜ8
तुम्हें क्या मालूम कि 'सिज्जीन' क्या हैं?
كِتَابٌ مَرْقُومٌۜ9
मुहर लगा हुआ काग़ज
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَۙ10
तबाही है उस दिन झुठलाने-वालों की,
اَلَّذ۪ينَ يُكَذِّبُونَ بِيَوْمِ الدّ۪ينِۜ11
जो बदले के दिन को झुठलाते है
وَمَا يُكَذِّبُ بِه۪ٓ اِلَّا كُلُّ مُعْتَدٍ اَث۪يمٍۙ12
और उसे तो बस प्रत्येक वह क्यक्ति ही झूठलाता है जो सीमा का उल्लंघन करनेवाला, पापी है
اِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِ اٰيَاتُنَا قَالَ اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَۜ13
जब हमारी आयतें उसे सुनाई जाती है तो कहता है, "ये तो पहले की कहानियाँ है।"
كَلَّا بَلْ۔ رَانَ عَلٰى قُلُوبِهِمْ مَا كَانُوا يَكْسِبُونَ14
कुछ नहीं, बल्कि जो कुछ वे कमाते रहे है वह उनके दिलों पर चढ़ गया है
كَلَّٓا اِنَّهُمْ عَنْ رَبِّهِمْ يَوْمَئِذٍ لَمَحْجُوبُونَۜ15
कुछ नहीं, अवश्य ही वे उस दिन अपने रब से ओट में होंगे,
ثُمَّ اِنَّهُمْ لَصَالُوا الْجَح۪يمِۜ16
फिर वे भड़कती आग में जा पड़ेगे
ثُمَّ يُقَالُ هٰذَا الَّذ۪ي كُنْتُمْ بِه۪ تُكَذِّبُونَۜ17
फिर कहा जाएगा, "यह वही है जिस तुम झुठलाते थे"
كَلَّٓا اِنَّ كِتَابَ الْاَبْرَارِ لَف۪ي عِلِّيّ۪ينَۜ18
कुछ नही, निस्संदेह वफ़ादार लोगों का काग़ज़ 'इल्लीयीन' (उच्च श्रेणी के लोगों) में है।-
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا عِلِّيُّونَۜ19
और तुम क्या जानो कि 'इल्लीयीन' क्या है? -
كِتَابٌ مَرْقُومٌۙ20
लिखा हुआ रजिस्टर
يَشْهَدُهُ الْمُقَرَّبُونَۜ21
जिसे देखने के लिए सामीप्य प्राप्त लोग उपस्थित होंगे,
اِنَّ الْاَبْرَارَ لَف۪ي نَع۪يمٍۙ22
निस्संदेह अच्छे लोग नेमतों में होंगे,
عَلَى الْاَرَٓائِكِ يَنْظُرُونَۙ23
ऊँची मसनदों पर से देख रहे होंगे
تَعْرِفُ ف۪ي وُجُوهِهِمْ نَضْرَةَ النَّع۪يمِۚ24
उनके चहरों से तुम्हें नेमतों की ताज़गी और आभा को बोध हो रहा होगा,
يُسْقَوْنَ مِنْ رَح۪يقٍ مَخْتُومٍۙ25
उन्हें मुहरबंद विशुद्ध पेय पिलाया जाएगा,
خِتَامُهُ مِسْكٌۜ وَف۪ي ذٰلِكَ فَلْيَتَنَافَسِ الْمُتَنَافِسُونَۜ26
मुहर उसकी मुश्क ही होगी - जो लोग दूसरी पर बाज़ी ले जाना चाहते हो वे इस चीज़ को प्राप्त करने में बाज़ी ले जाने का प्रयास करे -
وَمِزَاجُهُ مِنْ تَسْن۪يمٍۙ27
और उसमें 'तसनीम' का मिश्रण होगा,
عَيْنًا يَشْرَبُ بِهَا الْمُقَرَّبُونَۜ28
हाल यह है कि वह एक स्रोत है, जिसपर बैठकर सामीप्य प्राप्त लोग पिएँगे
اِنَّ الَّذ۪ينَ اَجْرَمُوا كَانُوا مِنَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا يَضْحَكُونَۘ29
जो अपराधी है वे ईमान लानेवालों पर हँसते थे,
وَاِذَا مَرُّوا بِهِمْ يَتَغَامَزُونَۘ30
और जब उनके पास से गुज़रते तो आपस में आँखों और भौंहों से इशारे करते थे,
وَاِذَا انْقَلَبُٓوا اِلٰٓى اَهْلِهِمُ انْقَلَبُوا فَكِه۪ينَۘ31
और जब अपने लोगों की ओर पलटते है तो चहकते, इतराते हुए पलटते थे,
وَاِذَا رَاَوْهُمْ قَالُٓوا اِنَّ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ لَضَٓالُّونَۙ32
और जब उन्हें देखते तो कहते, "ये तो भटके हुए है।"
وَمَٓا اُرْسِلُوا عَلَيْهِمْ حَافِظ۪ينَۜ33
हालाँकि वे उनपर कोई निगरानी करनेवाले बनाकर नहीं भेजे गए थे
فَالْيَوْمَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مِنَ الْكُفَّارِ يَضْحَكُونَۙ34
तो आज ईमान लानेवाले, इनकार करनेवालों पर हँस रहे हैं,
عَلَى الْاَرَٓائِكِ يَنْظُرُونَۜ35
ऊँची मसनदों पर से देख रहे है
هَلْ ثُوِّبَ الْكُفَّارُ مَا كَانُوا يَفْعَلُونَ36
क्या मिल गया बदला इनकार करनेवालों को उसका जो कुछ वे करते रहे है?
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِذَا السَّمَٓاءُ انْشَقَّتْۙ1
जबकि आकाश फट जाएगा,
وَاَذِنَتْ لِرَبِّهَا وَحُقَّتْۙ2
और वह अपने रब की सुनेगा, और उसे यही चाहिए भी
وَاِذَا الْاَرْضُ مُدَّتْۙ3
जब धरती फैला दी जाएगी
وَاَلْقَتْ مَا ف۪يهَا وَتَخَلَّتْۙ4
और जो कुछ उसके भीतर है उसे बाहर डालकर खाली हो जाएगी
وَاَذِنَتْ لِرَبِّهَا وَحُقَّتْۜ5
और वह अपने रब की सुनेगी, और उसे यही चाहिए भी
يَٓا اَيُّهَا الْاِنْسَانُ اِنَّكَ كَادِحٌ اِلٰى رَبِّكَ كَدْحًا فَمُلَاق۪يهِۚ6
ऐ मनुष्य! तू मशक़्क़त करता हुआ अपने रब ही की ओर खिंचा चला जा रहा है और अन्ततः उससे मिलने वाला है
فَاَمَّا مَنْ اُو۫تِيَ كِتَابَهُ بِيَم۪ينِه۪ۙ7
फिर जिस किसी को उसका कर्म-पत्र उसके दाहिने हाथ में दिया गया,
فَسَوْفَ يُحَاسَبُ حِسَابًا يَس۪يرًاۙ8
तो उससे आसान, सरसरी हिसाब लिया जाएगा
وَيَنْقَلِبُ اِلٰٓى اَهْلِه۪ مَسْرُورًاۜ9
और वह अपने लोगों की ओर ख़ुश-ख़ुश पलटेगा
وَاَمَّا مَنْ اُو۫تِيَ كِتَابَهُ وَرَٓاءَ ظَهْرِه۪ۙ10
और रह वह व्यक्ति जिसका कर्म-पत्र (उसके बाएँ हाथ में) उसकी पीठ के पीछे से दिया गया,
فَسَوْفَ يَدْعُو ثُبُورًاۙ11
तो वह विनाश (मृत्यु) को पुकारेगा,
وَيَصْلٰى سَع۪يرًاۜ12
और दहकती आग में जा पड़ेगा
اِنَّهُ كَانَ ف۪ٓي اَهْلِه۪ مَسْرُورًا13
वह अपने लोगों में मग्न था,
اِنَّهُ ظَنَّ اَنْ لَنْ يَحُورَۚۛ14
उसने यह समझ रखा था कि उसे कभी पलटना नहीं है
بَلٰىۚۛ اِنَّ رَبَّهُ كَانَ بِه۪ بَص۪يرًاۜ15
क्यों नहीं, निश्चय ही उसका रब तो उसे देख रहा था!
فَلَٓا اُقْسِمُ بِالشَّفَقِۙ16
अतः कुछ नहीं, मैं क़सम खाता हूँ सांध्य-लालिमा की,
وَالَّيْلِ وَمَا وَسَقَۙ17
और रात की और उसके समेट लेने की,
وَالْقَمَرِ اِذَا اتَّسَقَۙ18
और चन्द्रमा की जबकि वह पूर्ण हो जाता है,
لَتَرْكَبُنَّ طَبَقًا عَنْ طَبَقٍۜ19
निश्चय ही तुम्हें मंजिल पर मंजिल चढ़ना है
فَمَا لَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَۙ20
फिर उन्हें क्या हो गया है कि ईमान नहीं लाते?
وَاِذَا قُرِئَ عَلَيْهِمُ الْقُرْاٰنُ لَا يَسْجُدُونَۜ21
और जब उन्हें कुरआन पढ़कर सुनाया जाता है तो सजदे में नहीं गिर पड़ते?
بَلِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا يُكَذِّبُونَۘ22
नहीं, बल्कि इनकार करनेवाले तो झुठलाते है,
وَاللّٰهُ اَعْلَمُ بِمَا يُوعُونَۘ23
हालाँकि जो कुछ वे अपने अन्दर एकत्र कर रहे है, अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है
فَبَشِّرْهُمْ بِعَذَابٍ اَل۪يمٍۙ24
अतः उन्हें दुखद यातना की मंगल सूचना दे दो
اِلَّا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ اَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍ25
अलबत्ता जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उनके लिए कभी न समाप्त॥ होनेवाला प्रतिदान है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالسَّمَٓاءِ ذَاتِ الْبُرُوجِۙ1
साक्षी है बुर्जोंवाला आकाश,
وَالْيَوْمِ الْمَوْعُودِۙ2
और वह दिन जिसका वादा किया गया है,
وَشَاهِدٍ وَمَشْهُودٍۜ3
और देखनेवाला, और जो देखा गया
قُتِلَ اَصْحَابُ الْاُخْدُودِۙ4
विनष्ट हों खाईवाले,
اَلنَّارِ ذَاتِ الْوَقُودِۙ5
ईधन भरी आगवाले,
اِذْ هُمْ عَلَيْهَا قُعُودٌۙ6
जबकि वे वहाँ बैठे होंगे
وَهُمْ عَلٰى مَا يَفْعَلُونَ بِالْمُؤْمِن۪ينَ شُهُودٌۜ7
और वे जो कुछ ईमानवालों के साथ करते रहे, उसे देखेंगे
وَمَا نَقَمُوا مِنْهُمْ اِلَّٓا اَنْ يُؤْمِنُوا بِاللّٰهِ الْعَز۪يزِ الْحَم۪يدِۙ8
उन्होंने उन (ईमानवालों) से केवल इस कारण बदला लिया और शत्रुता की कि वे उस अल्लाह पर ईमान रखते थे जो अत्यन्त प्रभुत्वशाली, प्रशंसनीय है,
اَلَّذ۪ي لَهُ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَه۪يدٌۜ9
जिसके लिए आकाशों और धरती की बादशाही है। और अल्लाह हर चीज़ का साक्षी है
اِنَّ الَّذ۪ينَ فَتَنُوا الْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ لَمْ يَتُوبُوا فَلَهُمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ وَلَهُمْ عَذَابُ الْحَر۪يقِۜ10
जिन लोगों ने ईमानवाले पुरुषों और ईमानवाली स्त्रियों को सताया और आज़माईश में डाला, फिर तौबा न की, निश्चय ही उनके लिए जहन्नम की यातना है और उनके लिए जलने की यातना है
اِنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ جَنَّاتٌ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُۜ ذٰلِكَ الْفَوْزُ الْكَب۪يرُۜ11
निश्चय ही जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उनके लिए बाग़ है, जिनके नीचे नहरें बह रही होगी। वही है बड़ी सफलता
اِنَّ بَطْشَ رَبِّكَ لَشَد۪يدٌۜ12
वास्तव में तुम्हारे रब की पकड़ बड़ी ही सख़्त है
اِنَّهُ هُوَ يُبْدِئُ وَيُع۪يدُۚ13
वही आरम्भ करता है और वही पुनरावृत्ति करता है,
وَهُوَ الْغَفُورُ الْوَدُودُۙ14
वह बड़ा क्षमाशील, बहुत प्रेम करनेवाला है,
ذُو الْعَرْشِ الْمَج۪يدُۙ15
सिंहासन का स्वामी है, बडा गौरवशाली,
فَعَّالٌ لِمَا يُر۪يدُۜ16
जो चाहे उसे कर डालनेवाला
هَلْ اَتٰيكَ حَد۪يثُ الْجُنُودِۙ17
क्या तुम्हें उन सेनाओं की भी ख़बर पहुँची हैं,
فِرْعَوْنَ وَثَمُودَۜ18
फ़िरऔन और समूद की?
بَلِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا ف۪ي تَكْذ۪يبٍۙ19
नहीं, बल्कि जिन लोगों ने इनकार किया है, वे झुठलाने में लगे हुए है;
وَاللّٰهُ مِنْ وَرَٓائِهِمْ مُح۪يطٌۚ20
हालाँकि अल्लाह उन्हें घेरे हुए है, उनके आगे-पीछे से
بَلْ هُوَ قُرْاٰنٌ مَج۪يدٌۙ21
नहीं, बल्कि वह तो गौरव क़ुरआन है,
ف۪ي لَوْحٍ مَحْفُوظٍ22
सुरक्षित पट्टिका में अंकित है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالسَّمَٓاءِ وَالطَّارِقِۙ1
साक्षी है आकाश, और रात में प्रकट होनेवाला -
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا الطَّارِقُۙ2
और तुम क्या जानो कि रात में प्रकट होनेवाला क्या है?
اَلنَّجْمُ الثَّاقِبُۙ3
दमकता हुआ तारा! -
اِنْ كُلُّ نَفْسٍ لَمَّا عَلَيْهَا حَافِظٌۜ4
कि हर एक व्यक्ति पर एक निगरानी करनेवाला नियुक्त है
فَلْيَنْظُرِ الْاِنْسَانُ مِمَّ خُلِقَۜ5
अतः मनुष्य को चाहिए कि देखे कि वह किस चीज़ से पैदा किया गया है
خُلِقَ مِنْ مَٓاءٍ دَافِقٍۙ6
एक उछलते पानी से पैदा किया गया है,
يَخْرُجُ مِنْ بَيْنِ الصُّلْبِ وَالتَّرَٓائِبِۜ7
जो पीठ और पसलियों के मध्य से निकलता है
اِنَّهُ عَلٰى رَجْعِه۪ لَقَادِرٌۜ8
निश्चय ही वह उसके लौटा देने की सामर्थ्य रखता है
يَوْمَ تُبْلَى السَّرَٓائِرُۙ9
जिस दिन छिपी चीज़ें परखी जाएँगी,
فَمَا لَهُ مِنْ قُوَّةٍ وَلَا نَاصِرٍۜ10
तो उस समय उसके पास न तो अपनी कोई शक्ति होगी और न कोई सहायक
وَالسَّمَٓاءِ ذَاتِ الرَّجْعِۙ11
साक्षी है आवर्तन (उलट-फेर) वाला आकाश,
وَالْاَرْضِ ذَاتِ الصَّدْعِۙ12
और फट जानेवाली धरती
اِنَّهُ لَقَوْلٌ فَصْلٌۙ13
वह दो-टूक बात है,
وَمَا هُوَ بِالْهَزْلِۜ14
वह कोई हँसी-मज़ाक नही है
اِنَّهُمْ يَك۪يدُونَ كَيْدًاۙ15
वे एक चाल चल रहे है,
وَاَك۪يدُ كَيْدًاۚ16
और मैं भी एक चाल चल रहा हूँ
فَمَهِّلِ الْكَافِر۪ينَ اَمْهِلْهُمْ رُوَيْدًا17
अत मुहलत दे दो उन इनकार करनेवालों को; मुहलत दे दो उन्हें थोड़ी-सी
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْاَعْلٰىۙ1
तसबीह करो, अपने सर्वाच्च रब के नाम की,
اَلَّذ۪ي خَلَقَ فَسَوّٰىۙۖ2
जिसने पैदा किया, फिर ठीक-ठाक किया,
وَالَّذ۪ي قَدَّرَ فَهَدٰىۙۖ3
जिसने निर्धारित किया, फिर मार्ग दिखाया,
وَالَّذ۪ٓي اَخْرَجَ الْمَرْعٰىۙۖ4
जिसने वनस्पति उगाई,
فَجَعَلَهُ غُثَٓاءً اَحْوٰىۜ5
फिर उसे ख़ूब घना और हरा-भरा कर दिया
سَنُقْرِئُكَ فَلَا تَنْسٰىۙ6
हम तुम्हें पढ़ा देंगे, फिर तुम भूलोगे नहीं
اِلَّا مَا شَٓاءَ اللّٰهُۜ اِنَّهُ يَعْلَمُ الْجَهْرَ وَمَا يَخْفٰىۜ7
बात यह है कि अल्लाह की इच्छा ही क्रियान्वित है। निश्चय ही वह जानता है खुले को भी और उसे भी जो छिपा रहे
وَنُيَسِّرُكَ لِلْيُسْرٰىۚ8
हम तुम्हें सहज ढंग से उस चीज़ की पात्र बना देंगे जो सहज एवं मृदुल (आरामदायक) है
فَذَكِّرْ اِنْ نَفَعَتِ الذِّكْرٰىۜ9
अतः नसीहत करो, यदि नसीहत लाभप्रद हो!
سَيَذَّكَّرُ مَنْ يَخْشٰىۙ10
नसीहत हासिल कर लेगा जिसको डर होगा,
وَيَتَجَنَّبُهَا الْاَشْقٰىۙ11
किन्तु उससे कतराएगा वह अत्यन्त दुर्भाग्यवाला,
اَلَّذ۪ي يَصْلَى النَّارَ الْكُبْرٰىۚ12
जो बड़ी आग में पड़ेगा,
ثُمَّ لَا يَمُوتُ ف۪يهَا وَلَا يَحْيٰىۜ13
फिर वह उसमें न मरेगा न जिएगा
قَدْ اَفْلَحَ مَنْ تَزَكّٰىۙ14
सफल हो गया वह जिसने अपने आपको निखार लिया,
وَذَكَرَ اسْمَ رَبِّه۪ فَصَلّٰىۜ15
और अपने रब के नाम का स्मरण किया, अतः नमाज़ अदा की
بَلْ تُؤْثِرُونَ الْحَيٰوةَ الدُّنْيَاۘ16
नहीं, बल्कि तुम तो सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देते हो,
وَالْاٰخِرَةُ خَيْرٌ وَاَبْقٰىۜ17
हालाँकि आख़िरत अधिक उत्तम और शेष रहनेवाली है
اِنَّ هٰذَا لَفِي الصُّحُفِ الْاُو۫لٰىۙ18
निस्संदेह यही बात पहले की किताबों में भी है;
صُحُفِ اِبْرٰه۪يمَ وَمُوسٰى19
इबराईम और मूसा की किताबों में
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
هَلْ اَتٰيكَ حَد۪يثُ الْغَاشِيَةِۜ1
क्या तुम्हें उस छा जानेवाली की ख़बर पहुँची है?
وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ خَاشِعَةٌۙ2
उस दिन कितने ही चेहरे गिरे हुए होंगे,
عَامِلَةٌ نَاصِبَةٌۙ3
कठिन परिश्रम में पड़े, थके-हारे
تَصْلٰى نَارًا حَامِيَةًۙ4
दहकती आग में प्रवेश करेंगे
تُسْقٰى مِنْ عَيْنٍ اٰنِيَةٍۜ5
खौलते हुए स्रोत से पिएँगे,
لَيْسَ لَهُمْ طَعَامٌ اِلَّا مِنْ ضَر۪يعٍۙ6
उनके लिए कोई खाना न होगा सिवाय एक प्रकार के ज़री के,
لَا يُسْمِنُ وَلَا يُغْن۪ي مِنْ جُوعٍۜ7
जो न पुष्ट करे और न भूख मिटाए
وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ نَاعِمَةٌۙ8
उस दिन कितने ही चेहरे प्रफुल्लित और सौम्य होंगे,
لِسَعْيِهَا رَاضِيَةٌۙ9
अपने प्रयास पर प्रसन्न,
ف۪ي جَنَّةٍ عَالِيَةٍۙ10
उच्च जन्नत में,
لَا تَسْمَعُ ف۪يهَا لَاغِيَةًۜ11
जिसमें कोई व्यर्थ बात न सुनेंगे
ف۪يهَا عَيْنٌ جَارِيَةٌۢ12
उसमें स्रोत प्रवाहित होगा,
ف۪يهَا سُرُرٌ مَرْفُوعَةٌۙ13
उसमें ऊँची-ऊँची मसनदें होगी,
وَاَكْوَابٌ مَوْضُوعَةٌۙ14
प्याले ढंग से रखे होंगे,
وَنَمَارِقُ مَصْفُوفَةٌۙ15
क्रम से गाव तकिए लगे होंगे,
وَزَرَابِيُّ مَبْثُوثَةٌۜ16
और हर ओर क़ालीने बिछी होंगी
اَفَلَا يَنْظُرُونَ اِلَى الْاِبِلِ كَيْفَ خُلِقَتْ۠17
फिर क्या वे ऊँट की ओर नहीं देखते कि कैसा बनाया गया?
وَاِلَى السَّمَٓاءِ كَيْفَ رُفِعَتْ۠18
और आकाश की ओर कि कैसा ऊँचा किया गया?
وَاِلَى الْجِبَالِ كَيْفَ نُصِبَتْ۠19
और पहाड़ो की ओर कि कैसे खड़े किए गए?
وَاِلَى الْاَرْضِ كَيْفَ سُطِحَتْ۠20
और धरती की ओर कि कैसी बिछाई गई?
فَذَكِّرْ اِنَّمَٓا اَنْتَ مُذَكِّرٌۜ21
अच्छा तो नसीहत करो! तुम तो बस एक नसीहत करनेवाले हो
لَسْتَ عَلَيْهِمْ بِمُصَيْطِرٍۙ22
तुम उनपर कोई दरोग़ा नही हो
اِلَّا مَنْ تَوَلّٰى وَكَفَرَۙ23
किन्तु जिस किसी ने मुँह फेरा और इनकार किया,
فَيُعَذِّبُهُ اللّٰهُ الْعَذَابَ الْاَكْبَرَۜ24
तो अल्लाह उसे बड़ी यातना देगा
اِنَّ اِلَيْنَٓا اِيَابَهُمْۙ25
निस्संदेह हमारी ओर ही है उनका लौटना,
ثُمَّ اِنَّ عَلَيْنَا حِسَابَهُمْ26
फिर हमारे ही ज़िम्मे है उनका हिसाब लेना
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالْفَجْرِۙ1
साक्षी है उषाकाल,
وَلَيَالٍ عَشْرٍۙ2
साक्षी है दस रातें,
وَالشَّفْعِ وَالْوَتْرِۙ3
साक्षी है युग्म और अयुग्म,
وَالَّيْلِ اِذَا يَسْرِۚ4
साक्षी है रात जब वह विदा हो रही हो
هَلْ ف۪ي ذٰلِكَ قَسَمٌ لِذ۪ي حِجْرٍۜ5
क्या इसमें बुद्धिमान के लिए बड़ी गवाही है?
اَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِعَادٍۙۖ6
क्या तुमने देखा नहीं कि तुम्हारे रब ने क्या किया आद के साथ,
اِرَمَ ذَاتِ الْعِمَادِۙۖ7
स्तम्भों वाले 'इरम' के साथ?
اَلَّت۪ي لَمْ يُخْلَقْ مِثْلُهَا فِي الْبِلَادِۙۖ8
वे ऐसे थे जिनके सदृश बस्तियों में पैदा नहीं हुए
وَثَمُودَ الَّذ۪ينَ جَابُوا الصَّخْرَ بِالْوَادِۙۖ9
और समूद के साथ, जिन्होंने घाटी में चट्टाने तराशी थी,
وَفِرْعَوْنَ ذِي الْاَوْتَادِۙۖ10
और मेखोवाले फ़िरऔन के साथ?
اَلَّذ۪ينَ طَغَوْا فِي الْبِلَادِۙۖ11
वे लोग कि जिन्होंने देशो में सरकशी की,
فَاَكْثَرُوا ف۪يهَا الْفَسَادَۙۖ12
और उनमें बहुत बिगाड़ पैदा किया
فَصَبَّ عَلَيْهِمْ رَبُّكَ سَوْطَ عَذَابٍۙۖ13
अततः तुम्हारे रब ने उनपर यातना का कोड़ा बरसा दिया
اِنَّ رَبَّكَ لَبِالْمِرْصَادِۜ14
निस्संदेह तुम्हारा रब घात में रहता है
فَاَمَّا الْاِنْسَانُ اِذَا مَا ابْتَلٰيهُ رَبُّهُ فَاَكْرَمَهُ وَنَعَّمَهُ فَيَقُولُ رَبّ۪ٓي اَكْرَمَنِۜ15
किन्तु मनुष्य का हाल यह है कि जब उसका रब इस प्रकार उसकी परीक्षा करता है कि उसे प्रतिष्ठा और नेमत प्रदान करता है, तो वह कहता है, "मेरे रब ने मुझे प्रतिष्ठित किया।"
وَاَمَّٓا اِذَا مَا ابْتَلٰيهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُ فَيَقُولُ رَبّ۪ٓي اَهَانَنِۚ16
किन्तु जब कभी वह उसकी परीक्षा इस प्रकार करता है कि उसकी रोज़ी नपी-तुली कर देता है, तो वह कहता है, "मेरे रब ने मेरा अपमान किया।"
كَلَّا بَلْ لَا تُكْرِمُونَ الْيَت۪يمَۙ17
कदापि नहीं, बल्कि तुम अनाथ का सम्मान नहीं करते,
وَلَا تَحَٓاضُّونَ عَلٰى طَعَامِ الْمِسْك۪ينِۙ18
और न मुहताज को खिलान पर एक-दूसरे को उभारते हो,
وَتَاْكُلُونَ التُّرَاثَ اَكْلًا لَمًّاۙ19
और सारी मीरास समेटकर खा जाते हो,
وَتُحِبُّونَ الْمَالَ حُبًّا جَمًّاۜ20
और धन से उत्कट प्रेम रखते हो
كَلَّٓا اِذَا دُكَّتِ الْاَرْضُ دَكًّا دَكًّاۙ21
कुछ नहीं, जब धरती कूट-कूटकर चुर्ण-विचुर्ण कर दी जाएगी,
وَجَٓاءَ رَبُّكَ وَالْمَلَكُ صَفًّا صَفًّاۚ22
और तुम्हारा रब और फ़रिश्ता (बन्दों की) एक-एक पंक्ति के पास आएगा,
وَج۪ٓيءَ يَوْمَئِذٍ بِجَهَنَّمَ يَوْمَئِذٍ يَتَذَكَّرُ الْاِنْسَانُ وَاَنّٰى لَهُ الذِّكْرٰىۜ23
और जहन्नम को उस दिन लाया जाएगा, उस दिन मनुष्य चेतेगा, किन्तु कहाँ है उसके लिए लाभप्रद उस समय का चेतना?
يَقُولُ يَا لَيْتَن۪ي قَدَّمْتُ لِحَيَات۪يۚ24
वह कहेगा, "ऐ काश! मैंने अपने जीवन के लिए कुछ करके आगे भेजा होता।"
فَيَوْمَئِذٍ لَا يُعَذِّبُ عَذَابَهُٓ اَحَدٌۙ25
फिर उस दिन कोई नहीं जो उसकी जैसी यातना दे,
وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُٓ اَحَدٌۜ26
और कोई नहीं जो उसकी जकड़बन्द की तरह बाँधे
يَٓا اَيَّتُهَا النَّفْسُ الْمُطْمَئِنَّةُۗ27
"ऐ संतुष्ट आत्मा!
اِرْجِع۪ٓي اِلٰى رَبِّكِ رَاضِيَةً مَرْضِيَّةًۚ28
लौट अपने रब की ओर, इस तरह कि तू उससे राज़ी है वह तुझसे राज़ी है। अतः मेरे बन्दों में सम्मिलित हो जा। -
فَادْخُل۪ي ف۪ي عِبَاد۪يۙ29
अतः मेरे बन्दों में सम्मिलित हो जा
وَادْخُل۪ي جَنَّت۪ي30
और प्रवेश कर मेरी जन्नत में।"
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
لَٓا اُقْسِمُ بِهٰذَا الْبَلَدِۙ1
सुनो! मैं क़सम खाता हूँ इस नगर (मक्का) की -
وَاَنْتَ حِلٌّ بِهٰذَا الْبَلَدِۙ2
हाल यह है कि तुम इसी नगर में रह रहे हो -
وَوَالِدٍ وَمَا وَلَدَۙ3
और बाप और उसकी सन्तान की,
لَقَدْ خَلَقْنَا الْاِنْسَانَ ف۪ي كَبَدٍۜ4
निस्संदेह हमने मनुष्य को पूर्ण मशक़्क़त (अनुकूलता और सन्तुलन) के साथ पैदा किया
اَيَحْسَبُ اَنْ لَنْ يَقْدِرَ عَلَيْهِ اَحَدٌۢ5
क्या वह समझता है कि उसपर किसी का बस न चलेगा?
يَقُولُ اَهْلَكْتُ مَالًا لُبَدًاۜ6
कहता है कि "मैंने ढेरो माल उड़ा दिया।"
اَيَحْسَبُ اَنْ لَمْ يَرَهُٓ اَحَدٌۜ7
क्या वह समझता है कि किसी ने उसे देखा नहीं?
اَلَمْ نَجْعَلْ لَهُ عَيْنَيْنِۙ8
क्या हमने उसे नहीं दी दो आँखें,
وَلِسَانًا وَشَفَتَيْنِۙ9
और एक ज़बान और दो होंठ?
وَهَدَيْنَاهُ النَّجْدَيْنِۚ10
और क्या ऐसा नहीं है कि हमने दिखाई उसे दो ऊँचाइयाँ?
فَلَا اقْتَحَمَ الْعَقَبَةَۘ11
किन्तु वह तो हुमककर घाटी में से गुजंरा ही नहीं और (न उसने मुक्ति का मार्ग पाया)
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا الْعَقَبَةُۜ12
और तुम्हें क्या मालूम कि वह घाटी क्या है!
فَكُّ رَقَبَةٍۙ13
किसी गरदन का छुड़ाना
اَوْ اِطْعَامٌ ف۪ي يَوْمٍ ذ۪ي مَسْغَبَةٍۙ14
या भूख के दिन खाना खिलाना
يَت۪يمًا ذَا مَقْرَبَةٍۙ15
किसी निकटवर्ती अनाथ को,
اَوْ مِسْك۪ينًا ذَا مَتْرَبَةٍۜ16
या धूल-धूसरित मुहताज को;
ثُمَّ كَانَ مِنَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا بِالْمَرْحَمَةِۜ17
फिर यह कि वह उन लोगों में से हो जो ईमान लाए और जिन्होंने एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की , और एक-दूसरे को दया की ताकीद की
اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ الْمَيْمَنَةِۜ18
वही लोग है सौभाग्यशाली
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِاٰيَاتِنَا هُمْ اَصْحَابُ الْمَشْـَٔمَةِۜ19
रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयातों का इनकार किया, वे दुर्भाग्यशाली लोग है
عَلَيْهِمْ نَارٌ مُؤْصَدَةٌ20
उनपर आग होगी, जिसे बन्द कर दिया गया होगा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالشَّمْسِ وَضُحٰيهَاۙۖ1
साक्षी है सूर्य और उसकी प्रभा,
وَالْقَمَرِ اِذَا تَلٰيهَاۙۖ2
और चन्द्रमा जबकि वह उनके पीछे आए,
وَالنَّهَارِ اِذَا جَلّٰيهَاۙۖ3
और दिन, जबकि वह उसे प्रकट कर दे,
وَالَّيْلِ اِذَا يَغْشٰيهَاۙۖ4
और रात, जबकि वह उसको ढाँक ले
وَالسَّمَٓاءِ وَمَا بَنٰيهَاۙۖ5
और आकाश और जैसा कुछ उसे उठाया,
وَالْاَرْضِ وَمَا طَحٰيهَاۙۖ6
और धरती और जैसा कुछ उसे बिछाया
وَنَفْسٍ وَمَا سَوّٰيهَاۙۖ7
और आत्मा और जैसा कुछ उसे सँवारा
فَاَلْهَمَهَا فُجُورَهَا وَتَقْوٰيهَاۙۖ8
फिर उसके दिल में डाली उसकी बुराई और उसकी परहेज़गारी
قَدْ اَفْلَحَ مَنْ زَكّٰيهَاۙۖ9
सफल हो गया जिसने उसे विकसित किया
وَقَدْ خَابَ مَنْ دَسّٰيهَاۜ10
और असफल हुआ जिसने उसे दबा दिया
كَذَّبَتْ ثَمُودُ بِطَغْوٰيهَاۙۖ11
समूद ने अपनी सरकशी से झुठलाया,
اِذِ انْبَعَثَ اَشْقٰيهَاۙۖ12
जब उनमें का सबसे बड़ा दुर्भाग्यशाली उठ खड़ा हुआ,
فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ اللّٰهِ نَاقَةَ اللّٰهِ وَسُقْيٰيهَا۠13
तो अल्लाह के रसूल ने उनसे कहा, "सावधान, अल्लाह की ऊँटनी और उसके पिलाने (की बारी) से।"
فَكَذَّبُوهُ فَعَقَرُوهَاۙۖ فَدَمْدَمَ عَلَيْهِمْ رَبُّهُمْ بِذَنْبِهِمْ فَسَوّٰيهَاۙۖ14
किन्तु उन्होंने उसे झुठलाया और उस ऊँटनी की कूचें काट डाली। अन्ततः उनके रब ने उनके गुनाह के कारण उनपर तबाही डाल दी और उन्हें बराबर कर दिया
وَلَا يَخَافُ عُقْبٰيهَا15
और उसे उसके परिणाम का कोई भय नहीं
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالَّيْلِ اِذَا يَغْشٰىۙ1
साक्षी है रात जबकि वह छा जाए,
وَالنَّهَارِ اِذَا تَجَلّٰىۙ2
और दिन जबकि वह प्रकाशमान हो,
وَمَا خَلَقَ الذَّكَرَ وَالْاُنْثٰىۙ3
और नर और मादा का पैदा करना,
اِنَّ سَعْيَكُمْ لَشَتّٰىۜ4
कि तुम्हारा प्रयास भिन्न-भिन्न है
فَاَمَّا مَنْ اَعْطٰى وَاتَّقٰىۙ5
तो जिस किसी ने दिया और डर रखा,
وَصَدَّقَ بِالْحُسْنٰىۙ6
और अच्छी चीज़ की पुष्टि की,
فَسَنُيَسِّرُهُ لِلْيُسْرٰىۜ7
हम उस सहज ढंग से उस चीज का पात्र बना देंगे, जो सहज और मृदुल (सुख-साध्य) है
وَاَمَّا مَنْ بَخِلَ وَاسْتَغْنٰىۙ8
रहा वह व्यक्ति जिसने कंजूसी की और बेपरवाही बरती,
وَكَذَّبَ بِالْحُسْنٰىۙ9
और अच्छी चीज़ को झुठला दिया,
فَسَنُيَسِّرُهُ لِلْعُسْرٰىۜ10
हम उसे सहज ढंग से उस चीज़ का पात्र बना देंगे, जो कठिन चीज़ (कष्ट-साध्य) है
وَمَا يُغْن۪ي عَنْهُ مَالُهُٓ اِذَا تَرَدّٰىۜ11
और उसका माल उसके कुछ काम न आएगा, जब वह (सिर के बल) खड्ड में गिरेगा
اِنَّ عَلَيْنَا لَلْهُدٰىۘ12
निस्संदेह हमारे ज़िम्मे है मार्ग दिखाना
وَاِنَّ لَنَا لَلْاٰخِرَةَ وَالْاُو۫لٰى13
और वास्तव में हमारे अधिकार में है आख़िरत और दुनिया भी
فَاَنْذَرْتُكُمْ نَارًا تَلَظّٰىۚ14
अतः मैंने तुम्हें दहकती आग से सावधान कर दिया
لَا يَصْلٰيهَٓا اِلَّا الْاَشْقٰىۙ15
इसमें बस वही पड़ेगा जो बड़ा ही अभागा होगा,
اَلَّذ۪ي كَذَّبَ وَتَوَلّٰىۜ16
जिसने झुठलाया और मुँह फेरा
وَسَيُجَنَّبُهَا الْاَتْقٰىۙ17
और उससे बच जाएगा वह अत्यन्त परहेज़गार व्यक्ति,
اَلَّذ۪ي يُؤْت۪ي مَالَهُ يَتَزَكّٰىۚ18
जो अपना माल देकर अपने आपको निखारता है
وَمَا لِاَحَدٍ عِنْدَهُ مِنْ نِعْمَةٍ تُجْزٰىۙ19
और हाल यह है कि किसी का उसपर उपकार नहीं कि उसका बदला दिया जा रहा हो,
اِلَّا ابْتِغَٓاءَ وَجْهِ رَبِّهِ الْاَعْلٰىۚ20
बल्कि इससे अभीष्ट केवल उसके अपने उच्च रब के मुख (प्रसन्नता) की चाह है
وَلَسَوْفَ يَرْضٰى21
और वह शीघ्र ही राज़ी हो जाएगा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالضُّحٰىۙ1
साक्षी है चढ़ता दिन,
وَالَّيْلِ اِذَا سَجٰىۙ2
और रात जबकि उसका सन्नाटा छा जाए
مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلٰىۜ3
तुम्हारे रब ने तुम्हें न तो विदा किया और न वह बेज़ार (अप्रसन्न) हुआ
وَلَلْاٰخِرَةُ خَيْرٌ لَكَ مِنَ الْاُو۫لٰىۜ4
और निश्चय ही बाद में आनेवाली (अवधि) तुम्हारे लिए पहलेवाली से उत्तम है
وَلَسَوْفَ يُعْط۪يكَ رَبُّكَ فَتَرْضٰىۜ5
और शीघ्र ही तुम्हारा रब तुम्हें प्रदान करेगा कि तुम प्रसन्न हो जाओगे
اَلَمْ يَجِدْكَ يَت۪يمًا فَاٰوٰىۖ6
क्या ऐसा नहीं कि उसने तुम्हें अनाथ पाया तो ठिकाना दिया?
وَوَجَدَكَ ضَٓالًّا فَهَدٰىۖ7
और तुम्हें मार्ग से अपरिचित पाया तो मार्ग दिखाया?
وَوَجَدَكَ عَٓائِلًا فَاَغْنٰىۜ8
और तुम्हें निर्धन पाया तो समृद्ध कर दिया?
فَاَمَّا الْيَت۪يمَ فَلَا تَقْهَرْۜ9
अतः जो अनाथ हो उसे मत दबाना,
وَاَمَّا السَّٓائِلَ فَلَا تَنْهَرْۜ10
और जो माँगता हो उसे न झिझकना,
وَاَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ11
और जो तुम्हें रब की अनुकम्पा है, उसे बयान करते रहो
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَلَمْ نَشْرَحْ لَكَ صَدْرَكَۙ1
क्या ऐसा नहीं कि हमने तुम्हारा सीना तुम्हारे लिए खोल दिया?
وَوَضَعْنَا عَنْكَ وِزْرَكَۙ2
और तुमपर से तुम्हारा बोझ उतार दिया,
اَلَّذ۪ٓي اَنْقَضَ ظَهْرَكَۙ3
जो तुम्हारी कमर तोड़े डाल रहा था?
وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَۜ4
और तुम्हारे लिए तुम्हारे ज़िक्र को ऊँचा कर दिया?
فَاِنَّ مَعَ الْعُسْرِ يُسْرًاۙ5
अतः निस्संदेह कठिनाई के साथ आसानी भी है
اِنَّ مَعَ الْعُسْرِ يُسْرًاۜ6
निस्संदेह कठिनाई के साथ आसानी भी है
فَاِذَا فَرَغْتَ فَانْصَبْۙ7
अतः जब निवृत हो तो परिश्रम में लग जाओ,
وَاِلٰى رَبِّكَ فَارْغَبْ8
और अपने रब से लौ लगाओ
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالتّ۪ينِ وَالزَّيْتُونِۙ1
साक्षी है तीन और ज़ैतून
وَطُورِ س۪ين۪ينَۙ2
और तूर सीनीन,
وَهٰذَا الْبَلَدِ الْاَم۪ينِۙ3
और यह शान्तिपूर्ण भूमि (मक्का)
لَقَدْ خَلَقْنَا الْاِنْسَانَ ف۪ٓي اَحْسَنِ تَقْو۪يمٍۘ4
निस्संदेह हमने मनुष्य को सर्वोत्तम संरचना के साथ पैदा किया
ثُمَّ رَدَدْنَاهُ اَسْفَلَ سَافِل۪ينَۙ5
फिर हमने उसे निकृष्टतम दशा की ओर लौटा दिया, जबकि वह स्वयं गिरनेवाला बना
اِلَّا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَلَهُمْ اَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍۜ6
सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और जिन्होंने अच्छे कर्म किए, तो उनके लिए कभी न समाप्त होनेवाला बदला है
فَمَا يُكَذِّبُكَ بَعْدُ بِالدّ۪ينِۜ7
अब इसके बाद क्या है, जो बदले के विषय में तुम्हें झुठलाए?
اَلَيْسَ اللّٰهُ بِاَحْكَمِ الْحَاكِم۪ينَ8
क्या अल्लाह सब हाकिमों से बड़ा हाकिम नहीं हैं?
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِقْرَاْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذ۪ي خَلَقَۚ1
पढ़ो, अपने रब के नाम के साथ जिसने पैदा किया,
خَلَقَ الْاِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍۚ2
पैदा किया मनुष्य को जमे हुए ख़ून के एक लोथड़े से
اِقْرَاْ وَرَبُّكَ الْاَكْرَمُۙ3
पढ़ो, हाल यह है कि तुम्हारा रब बड़ा ही उदार है,
اَلَّذ۪ي عَلَّمَ بِالْقَلَمِۙ4
जिसने क़लम के द्वारा शिक्षा दी,
عَلَّمَ الْاِنْسَانَ مَا لَمْ يَعْلَمْۜ5
मनुष्य को वह ज्ञान प्रदान किया जिस वह न जानता था
كَلَّٓا اِنَّ الْاِنْسَانَ لَيَطْغٰىۙ6
कदापि नहीं, मनुष्य सरकशी करता है,
اَنْ رَاٰهُ اسْتَغْنٰىۜ7
इसलिए कि वह अपने आपको आत्मनिर्भर देखता है
اِنَّ اِلٰى رَبِّكَ الرُّجْعٰىۜ8
निश्चय ही तुम्हारे रब ही की ओर पलटना है
اَرَاَيْتَ الَّذ۪ي يَنْهٰىۙ9
क्या तुमने देखा उस व्यक्ति को
عَبْدًا اِذَا صَلّٰىۜ10
जो एक बन्दे को रोकता है, जब वह नमाज़ अदा करता है? -
اَرَاَيْتَ اِنْ كَانَ عَلَى الْهُدٰىۙ11
तुम्हारा क्या विचार है? यदि वह सीधे मार्ग पर हो,
اَوْ اَمَرَ بِالتَّقْوٰىۜ12
या परहेज़गारी का हुक्म दे (उसके अच्छा होने में क्या संदेह है)
اَرَاَيْتَ اِنْ كَذَّبَ وَتَوَلّٰىۜ13
तुम्हारा क्या विचार है? यदि उस (रोकनेवाले) ने झुठलाया और मुँह मोड़ा (तो उसके बुरा होने में क्या संदेह है) -
اَلَمْ يَعْلَمْ بِاَنَّ اللّٰهَ يَرٰىۜ14
क्या उसने नहीं जाना कि अल्लाह देख रहा है?
كَلَّا لَئِنْ لَمْ يَنْتَهِ۬ لَنَسْفَعًا بِالنَّاصِيَةِۙ15
कदापि नहीं, यदि वह बाज़ न आया तो हम चोटी पकड़कर घसीटेंगे,
نَاصِيَةٍ كَاذِبَةٍ خَاطِئَةٍۚ16
झूठी, ख़ताकार चोटी
فَلْيَدْعُ نَادِيَهُۙ17
अब बुला ले वह अपनी मजलिस को!
سَنَدْعُ الزَّبَانِيَةَۙ18
हम भी बुलाए लेते है सिपाहियों को
كَلَّاۜ لَا تُطِعْهُ وَاسْجُدْ وَاقْتَرِبْ19
कदापि नहीं, उसकी बात न मानो और सजदे करते और क़रीब होते रहो
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِنَّٓا اَنْزَلْنَاهُ ف۪ي لَيْلَةِ الْقَدْرِۚ1
हमने इसे क़द्र की रात में अवतरित किया
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا لَيْلَةُ الْقَدْرِۜ2
और तुम्हें क्या मालूम कि क़द्र की रात क्या है?
لَيْلَةُ الْقَدْرِ خَيْرٌ مِنْ اَلْفِ شَهْرٍۜ3
क़द्र की रात उत्तम है हज़ार महीनों से,
تَنَزَّلُ الْمَلٰٓئِكَةُ وَالرُّوحُ ف۪يهَا بِاِذْنِ رَبِّهِمْۚ مِنْ كُلِّ اَمْرٍۙۛ4
उसमें फ़रिश्तें और रूह हर महत्वपूर्ण मामलें में अपने रब की अनुमति से उतरते है
سَلَامٌ۠ۛ هِيَ حَتّٰى مَطْلَعِ الْفَجْرِ5
वह रात पूर्णतः शान्ति और सलामती है, उषाकाल के उदय होने तक
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
لَمْ يَكُنِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ اَهْلِ الْكِتَابِ وَالْمُشْرِك۪ينَ مُنْفَكّ۪ينَ حَتّٰى تَاْتِيَهُمُ الْبَيِّنَةُۙ1
किताबवालों और मुशरिकों (बहुदेववादियों) में से जिन लोगों ने इनकार किया वे कुफ़्र (इनकार) से अलग होनेवाले नहीं जब तक कि उनके पास स्पष्ट प्रमाण न आ जाए;
رَسُولٌ مِنَ اللّٰهِ يَتْلُوا صُحُفًا مُطَهَّرَةًۙ2
अल्लाह की ओर से एक रसूल पवित्र पृष्ठों को पढ़ता हुआ;
ف۪يهَا كُتُبٌ قَيِّمَةٌۜ3
जिनमें ठोस और ठीक आदेश अंकित हों,
وَمَا تَفَرَّقَ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْكِتَابَ اِلَّا مِنْ بَعْدِ مَا جَٓاءَتْهُمُ الْبَيِّنَةُۜ4
हालाँकि जिन्हें किताब दी गई थी। वे इसके पश्चात फूट में पड़े कि उनके पास स्पष्ट प्रमाण आ चुका था
وَمَٓا اُمِرُٓوا اِلَّا لِيَعْبُدُوا اللّٰهَ مُخْلِص۪ينَ لَهُ الدّ۪ينَ حُنَفَٓاءَ وَيُق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَيُؤْتُوا الزَّكٰوةَ وَذٰلِكَ د۪ينُ الْقَيِّمَةِۜ5
और उन्हें आदेश भी बस यही दिया गया था कि वे अल्लाह की बन्दगी करे निष्ठा एवं विनयशीलता को उसके लिए विशिष्ट करके, बिलकुल एकाग्र होकर, और नमाज़ की पाबन्दी करें और ज़कात दे। और यही है सत्यवादी समुदाय का धर्म
اِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ اَهْلِ الْكِتَابِ وَالْمُشْرِك۪ينَ ف۪ي نَارِ جَهَنَّمَ خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمْ شَرُّ الْبَرِيَّةِۜ6
निस्संदेह किताबवालों और मुशरिकों (बहुदेववादियों) में से जिन लोगों ने इनकार किया है, वे जहन्नम की आग में पड़ेगे; उसमें सदैव रहने के लिए। वही पैदा किए गए प्राणियों में सबसे बुरे है
اِنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ اُو۬لٰٓئِكَ هُمْ خَيْرُ الْبَرِيَّةِۜ7
किन्तु निश्चय ही वे लोग, जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए पैदा किए गए प्राणियों में सबसे अच्छे है
جَزَٓاؤُ۬هُمْ عِنْدَ رَبِّهِمْ جَنَّاتُ عَدْنٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَٓا اَبَدًاۜ رَضِيَ اللّٰهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُۜ ذٰلِكَ لِمَنْ خَشِيَ رَبَّهُ8
उनका बदला उनके अपने रब के पास सदाबहार बाग़ है, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनमें वे सदैव रहेंगे। अल्लाह उनसे राज़ी हुआ और वे उससे राज़ी हुए। यह कुछ उसके लिए है, जो अपने रब से डरा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِذَا زُلْزِلَتِ الْاَرْضُ زِلْزَالَهَاۙ1
जब धरती इस प्रकार हिला डाली जाएगी जैसा उसे हिलाया जाना है,
وَاَخْرَجَتِ الْاَرْضُ اَثْقَالَهَاۙ2
और धरती अपने बोझ बाहर निकाल देगी,
وَقَالَ الْاِنْسَانُ مَا لَهَاۚ3
और मनुष्य कहेगा, "उसे क्या हो गया है?"
يَوْمَئِذٍ تُحَدِّثُ اَخْبَارَهَاۙ4
उस दिन वह अपना वृत्तांत सुनाएगी,
بِاَنَّ رَبَّكَ اَوْحٰى لَهَاۜ5
इस कारण कि तुम्हारे रब ने उसे यही संकेत किया होगा
يَوْمَئِذٍ يَصْدُرُ النَّاسُ اَشْتَاتًاۙ لِيُرَوْا اَعْمَالَهُمْۜ6
उस दिन लोग अलग-अलग निकलेंगे, ताकि उन्हें कर्म दिखाए जाएँ
فَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًا يَرَهُۜ7
अतः जो कोई कणभर भी नेकी करेगा, वह उसे देख लेगा,
وَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَرَهُ8
और जो कोई कणभर भी बुराई करेगा, वह भी उसे देख लेगा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالْعَادِيَاتِ ضَبْحًاۙ1
साक्षी है जो हाँफते-फुँकार मारते हुए दौड़ते है,
فَالْمُورِيَاتِ قَدْحًاۙ2
फिर ठोकरों से चिनगारियाँ निकालते है,
فَالْمُغ۪يرَاتِ صُبْحًاۙ3
फिर सुबह सवेरे धावा मारते होते है,
فَاَثَرْنَ بِه۪ نَقْعًاۙ4
उसमें उठाया उन्होंने गर्द-गुबार
فَوَسَطْنَ بِه۪ جَمْعًاۙ5
और इसी हाल में वे दल में जा घुसे
اِنَّ الْاِنْسَانَ لِرَبِّه۪ لَكَنُودٌۚ6
निस्संदेह मनुष्य अपने रब का बड़ा अकृतज्ञ हैं,
وَاِنَّهُ عَلٰى ذٰلِكَ لَشَه۪يدٌۚ7
और निश्चय ही वह स्वयं इसपर गवाह है!
وَاِنَّهُ لِحُبِّ الْخَيْرِ لَشَد۪يدٌۜ8
और निश्चय ही वह धन के मोह में बड़ा दृढ़ है
اَفَلَا يَعْلَمُ اِذَا بُعْثِرَ مَا فِي الْقُبُورِۙ9
तो क्या वह जानता नहीं जब उगवला लिया जाएगा तो क़ब्रों में है
وَحُصِّلَ مَا فِي الصُّدُورِۙ10
और स्पष्ट अनावृत्त कर दिया जाएगा तो कुछ सीनों में है
اِنَّ رَبَّهُمْ بِهِمْ يَوْمَئِذٍ لَخَب۪يرٌ11
निस्संदेह उनका रब उस दिन उनकी पूरी ख़बर रखता होगा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَلْقَارِعَةُۙ1
वह खड़खड़ानेवाली!
مَا الْقَارِعَةُۚ2
क्या है वह खड़खड़ानेवाली?
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا الْقَارِعَةُۜ3
और तुम्हें क्या मालूम कि क्या है वह खड़खड़ानेवाली?
يَوْمَ يَكُونُ النَّاسُ كَالْفَرَاشِ الْمَبْثُوثِۙ4
जिस दिन लोग बिखरे हुए पतंगों के सदृश हो जाएँगें,
وَتَكُونُ الْجِبَالُ كَالْعِهْنِ الْمَنْفُوشِۜ5
और पहाड़ के धुन के हुए रंग-बिरंग के ऊन जैसे हो जाएँगे
فَاَمَّا مَنْ ثَقُلَتْ مَوَاز۪ينُهُۙ6
फिर जिस किसी के वज़न भारी होंगे,
فَهُوَ ف۪ي ع۪يشَةٍ رَاضِيَةٍۜ7
वह मनभाते जीवन में रहेगा
وَاَمَّا مَنْ خَفَّتْ مَوَاز۪ينُهُۙ8
और रहा वह व्यक्ति जिसके वज़न हलके होंगे,
فَاُمُّهُ هَاوِيَةٌۜ9
उसकी माँ होगी गहरा खड्ड
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا هِيَهْۜ10
और तुम्हें क्या मालूम कि वह क्या है?
نَارٌ حَامِيَةٌ11
आग है दहकती हुई
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَلْهٰيكُمُ التَّكَاثُرُۙ1
तुम्हें एक-दूसरे के मुक़ाबले में बहुतायत के प्रदर्शन और घमंड ने ग़फ़़लत में डाल रखा है,
حَتّٰى زُرْتُمُ الْمَقَابِرَۜ2
यहाँ तक कि तुम क़ब्रिस्तानों में पहुँच गए
كَلَّا سَوْفَ تَعْلَمُونَۙ3
कुछ नहीं, तुम शीघ्र ही जान लोगे
ثُمَّ كَلَّا سَوْفَ تَعْلَمُونَۜ4
फिर, कुछ नहीं, तुम्हें शीघ्र ही मालूम हो जाएगा -
كَلَّا لَوْ تَعْلَمُونَ عِلْمَ الْيَق۪ينِۜ5
कुछ नहीं, अगर तुम विश्वसनीय ज्ञान के रूप में जान लो! (तो तुम धन-दौलत के पुजारी न बनो) -
لَتَرَوُنَّ الْجَح۪يمَۙ6
अवश्य ही तुम भड़कती आग से दो-चार होगे
ثُمَّ لَتَرَوُنَّهَا عَيْنَ الْيَق۪ينِۙ7
फिर सुनो, उसे अवश्य देखोगे इस दशा में कि वह यथावत विश्वास होगा
ثُمَّ لَتُسْـَٔلُنَّ يَوْمَئِذٍ عَنِ النَّع۪يمِ8
फिर निश्चय ही उस दिन तुमसे नेमतों के बारे में पूछा जाएगा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالْعَصْرِۙ1
गवाह है गुज़रता समय,
اِنَّ الْاِنْسَانَ لَف۪ي خُسْرٍۙ2
कि वास्तव में मनुष्य घाटे में है,
اِلَّا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَتَوَاصَوْا بِالْحَقِّ وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ3
सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और अच्छे कर्म किए और एक-दूसरे को हक़ की ताकीद की, और एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَيْلٌ لِكُلِّ هُمَزَةٍ لُمَزَةٍۙ1
तबाही है हर कचो के लगानेवाले, ऐब निकालनेवाले के लिए,
اَلَّذ۪ي جَمَعَ مَالًا وَعَدَّدَهُۙ2
जो माल इकट्ठा करता और उसे गिनता रहा
يَحْسَبُ اَنَّ مَالَهُٓ اَخْلَدَهُۚ3
समझता है कि उसके माल ने उसे अमर कर दिया
كَلَّا لَيُنْبَذَنَّ فِي الْحُطَمَةِۘ4
कदापि नहीं, वह चूर-चूर कर देनेवाली में फेंक दिया जाएगा,
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا الْحُطَمَةُۜ5
और तुम्हें क्या मालूम कि वह चूर-चूर कर देनेवाली क्या है?
نَارُ اللّٰهِ الْمُوقَدَةُۙ6
वह अल्लाह की दहकाई हुई आग है,
اَلَّت۪ي تَطَّلِعُ عَلَى الْاَفْـِٔدَةِۜ7
जो झाँक लेती है दिलों को
اِنَّهَا عَلَيْهِمْ مُؤْصَدَةٌۙ8
वह उनपर ढाँककर बन्द कर दी गई होगी,
ف۪ي عَمَدٍ مُمَدَّدَةٍ9
लम्बे-लम्बे स्तम्भों में
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِاَصْحَابِ الْف۪يلِۜ1
क्या तुमने देखा नहीं कि तुम्हारे रब ने हाथीवालों के साथ कैसा बरताव किया?
اَلَمْ يَجْعَلْ كَيْدَهُمْ ف۪ي تَضْل۪يلٍۙ2
क्या उसने उनकी चाल को अकारथ नहीं कर दिया?
وَاَرْسَلَ عَلَيْهِمْ طَيْرًا اَبَاب۪يلَۙ3
और उनपर नियुक्त होने को झुंड के झुंड पक्षी भेजे,
تَرْم۪يهِمْ بِحِجَارَةٍ مِنْ سِجّ۪يلٍۖۙ4
उनपर कंकरीले पत्थर मार रहे थे
فَجَعَلَهُمْ كَعَصْفٍ مَاْكُولٍ5
अन्ततः उन्हें ऐसा कर दिया, जैसे खाने का भूसा हो
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
لِا۪يلَافِ قُرَيْشٍۙ1
कितना है क़ुरैश को लगाए और परचाए रखना,
ا۪يلَافِهِمْ رِحْلَةَ الشِّتَٓاءِ وَالصَّيْفِۚ2
लगाए और परचाए रखना उन्हें जाड़े और गर्मी की यात्रा से
فَلْيَعْبُدُوا رَبَّ هٰذَا الْبَيْتِۙ3
अतः उन्हें चाहिए कि इस घर (काबा) के रब की बन्दगी करे,
اَلَّذ۪ٓي اَطْعَمَهُمْ مِنْ جُوعٍ وَاٰمَنَهُمْ مِنْ خَوْفٍ4
जिसने उन्हें खिलाकर भूख से बचाया और निश्चिन्तता प्रदान करके भय से बचाया
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَرَاَيْتَ الَّذ۪ي يُكَذِّبُ بِالدّ۪ينِۜ1
क्या तुमने उसे देखा जो दीन को झुठलाता है?
فَذٰلِكَ الَّذ۪ي يَدُعُّ الْيَت۪يمَۙ2
वही तो है जो अनाथ को धक्के देता है,
وَلَا يَحُضُّ عَلٰى طَعَامِ الْمِسْك۪ينِۜ3
और मुहताज के खिलाने पर नहीं उकसाता
فَوَيْلٌ لِلْمُصَلّ۪ينَۙ4
अतः तबाही है उन नमाज़ियों के लिए,
اَلَّذ۪ينَ هُمْ عَنْ صَلَاتِهِمْ سَاهُونَۙ5
जो अपनी नमाज़ से ग़ाफिल (असावधान) हैं,
اَلَّذ۪ينَ هُمْ يُرَٓاؤُ۫نَۙ6
जो दिखावे के लिए कार्य करते हैं,
وَيَمْنَعُونَ الْمَاعُونَ7
और साधारण बरतने की चीज़ भी किसी को नहीं देते
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِنَّٓا اَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَۜ1
निश्चय ही हमने तुम्हें कौसर प्रदान किया,
فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْۜ2
अतः तुम अपने रब ही के लिए नमाज़ पढ़ो और (उसी के दिन) क़़ुरबानी करो
اِنَّ شَانِئَكَ هُوَ الْاَبْتَرُ3
निस्संदेह तुम्हारा जो वैरी है वही जड़कटा है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
قُلْ يَٓا اَيُّهَا الْكَافِرُونَۙ1
कह दो, "ऐ इनकार करनेवालो!"
لَٓا اَعْبُدُ مَا تَعْبُدُونَۙ2
मैं वैसी बन्दगी नहीं करूँगा जैसी बन्दगी तुम करते हो,
وَلَٓا اَنْتُمْ عَابِدُونَ مَٓا اَعْبُدُۚ3
और न तुम वैसी बन्दगी करनेवाले हो जैसी बन्दगी में करता हूँ
وَلَٓا اَنَا۬ عَابِدٌ مَا عَبَدْتُمْۙ4
और न मैं वैसी बन्दगी करनेवाला हूँ जैसी बन्दगी तुमने की है
وَلَٓا اَنْتُمْ عَابِدُونَ مَٓا اَعْبُدُۜ5
और न तुम वैसी बन्दगी करनेवाला हुए जैसी बन्दगी मैं करता हूँ
لَكُمْ د۪ينُكُمْ وَلِيَ د۪ينِ6
तुम्हारे लिए तूम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म!"
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِذَا جَٓاءَ نَصْرُ اللّٰهِ وَالْفَتْحُۙ1
जब अल्लाह की सहायता आ जाए और विजय प्राप्त हो,
وَرَاَيْتَ النَّاسَ يَدْخُلُونَ ف۪ي د۪ينِ اللّٰهِ اَفْوَاجًاۙ2
और तुम लोगों को देखो कि वे अल्लाह के दीन (धर्म) में गिरोह के गिरोह प्रवेश कर रहे है,
فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَاسْتَغْفِرْهُۜ اِنَّهُ كَانَ تَوَّابًا3
तो अपने रब की प्रशंसा करो और उससे क्षमा चाहो। निस्संदेह वह बड़ा तौबा क़बूल करनेवाला है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
تَبَّتْ يَدَٓا اَب۪ي لَهَبٍ وَتَبَّۜ1
टूट गए अबू लहब के दोनों हाथ और वह स्वयं भी विनष्ट हो गया!
مَٓا اَغْنٰى عَنْهُ مَالُهُ وَمَا كَسَبَۜ2
न उसका माल उसके काम आया और न वह कुछ जो उसने कमाया
سَيَصْلٰى نَارًا ذَاتَ لَهَبٍۚ3
वह शीघ्र ही प्रज्वलित भड़कती आग में पड़ेगा,
وَامْرَاَتُهُۜ حَمَّالَةَ الْحَطَبِۚ4
और उसकी स्त्री भी ईधन लादनेवाली,
ف۪ي ج۪يدِهَا حَبْلٌ مِنْ مَسَدٍ5
उसकी गरदन में खजूर के रेसों की बटी हुई रस्सी पड़ी है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
113 · अल-फ़लकبِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
قُلْ اَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِۙ1
कहो, "मैं शरण लेता हूँ, प्रकट करनेवाले रब की,
مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَۙ2
जो कुछ भी उसने पैदा किया उसकी बुराई से,
وَمِنْ شَرِّ غَاسِقٍ اِذَا وَقَبَۙ3
और अँधेरे की बुराई से जबकि वह घुस आए,
وَمِنْ شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِۙ4
और गाँठो में फूँक मारने-वालों की बुराई से,
وَمِنْ شَرِّ حَاسِدٍ اِذَا حَسَدَ5
और ईर्ष्यालु की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे।"
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
قُلْ اَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِۙ1
कहो, "मैं शरण लेता हूँ मनुष्यों के रब की
مَلِكِ النَّاسِۙ2
मनुष्यों के सम्राट की
اِلٰهِ النَّاسِۙ3
मनुष्यों के उपास्य की
مِنْ شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِۙ4
वसवसा डालनेवाले, खिसक जानेवाले की बुराई से
اَلَّذ۪ي يُوَسْوِسُ ف۪ي صُدُورِ النَّاسِۙ5
जो मनुष्यों के सीनों में वसवसा डालता हैं
مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ6
जो जिन्नों में से भी होता हैं और मनुष्यों में से भी