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2 · अल-बक़रा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓمٓۚ1
अलीफ़॰ लाम॰ मीम॰
ذٰلِكَ الْكِتَابُ لَا رَيْبَۚۛ ف۪يهِۚۛ هُدًى لِلْمُتَّق۪ينَۙ2
वह किताब यही हैं, जिसमें कोई सन्देह नहीं, मार्गदर्शन हैं डर रखनेवालों के लिए,
اَلَّذ۪ينَ يُؤْمِنُونَ بِالْغَيْبِ وَيُق۪يمُونَ الصَّلٰوةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَۙ3
जो अनदेखे ईमान लाते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया हैं उसमें से कुछ खर्च करते हैं;
وَالَّذ۪ينَ يُؤْمِنُونَ بِمَٓا اُنْزِلَ اِلَيْكَ وَمَٓا اُنْزِلَ مِنْ قَبْلِكَۚ وَبِالْاٰخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَۜ4
और जो उस पर ईमान लाते हैं जो तुम पर उतरा और जो तुमसे पहले अवतरित हुआ हैं और आख़िरत पर वही लोग विश्वास रखते हैं;
اُو۬لٰٓئِكَ عَلٰى هُدًى مِنْ رَبِّهِمْ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ5
वही लोग हैं जो अपने रब के सीधे मार्ग पर हैं और वही सफलता प्राप्त करनेवाले हैं