604. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
112 · अल-इख़लास114 · अन्नास
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
113 · अल-फ़लकبِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
قُلْ اَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِۙ1
कहो, "मैं शरण लेता हूँ, प्रकट करनेवाले रब की,
مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَۙ2
जो कुछ भी उसने पैदा किया उसकी बुराई से,
وَمِنْ شَرِّ غَاسِقٍ اِذَا وَقَبَۙ3
और अँधेरे की बुराई से जबकि वह घुस आए,
وَمِنْ شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِۙ4
और गाँठो में फूँक मारने-वालों की बुराई से,
وَمِنْ شَرِّ حَاسِدٍ اِذَا حَسَدَ5
और ईर्ष्यालु की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे।"
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
قُلْ اَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِۙ1
कहो, "मैं शरण लेता हूँ मनुष्यों के रब की
مَلِكِ النَّاسِۙ2
मनुष्यों के सम्राट की
اِلٰهِ النَّاسِۙ3
मनुष्यों के उपास्य की
مِنْ شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِۙ4
वसवसा डालनेवाले, खिसक जानेवाले की बुराई से
اَلَّذ۪ي يُوَسْوِسُ ف۪ي صُدُورِ النَّاسِۙ5
जो मनुष्यों के सीनों में वसवसा डालता हैं
مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ6
जो जिन्नों में से भी होता हैं और मनुष्यों में से भी