आदेश और निषेध
فَكُلُوا مِمَّا ذُكِرَ اسْمُ اللّٰهِ عَلَيْهِ اِنْ كُنْتُمْ بِاٰيَاتِه۪ مُؤْمِن۪ينَ
अतः जिसपर अल्लाह का नाम लिया गया हो, उसे खाओ; यदि तुम उसकी आयतों को मानते हो
وَذَرُوا ظَاهِرَ الْاِثْمِ وَبَاطِنَهُۜ اِنَّ الَّذ۪ينَ يَكْسِبُونَ الْاِثْمَ سَيُجْزَوْنَ بِمَا كَانُوا يَقْتَرِفُونَ
छोड़ो खुले गुनाह को भी और छिपे को भी। निश्चय ही गुनाह कमानेवालों को उसका बदला दिया जाएगा, जिस कमाई में वे लगे रहे होंगे
وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَت۪يمِ اِلَّا بِالَّت۪ي هِيَ اَحْسَنُ حَتّٰى يَبْلُغَ اَشُدَّهُۚ وَاَوْفُوا الْكَيْلَ وَالْم۪يزَانَ بِالْقِسْطِۚ لَا نُكَلِّفُ نَفْسًا اِلَّا وُسْعَهَا وَاِذَا قُلْتُمْ فَاعْدِلُوا وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبٰىۚ وَبِعَهْدِ اللّٰهِ اَوْفُواۜ ذٰلِكُمْ وَصّٰيكُمْ بِه۪ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَۙ
"और अनाथ के धन को हाथ न लगाओ, किन्तु ऐसे तरीक़े से जो उत्तम हो, यहाँ तक कि वह अपनी युवावस्था को पहुँच जाए। और इनसाफ़ के साथ पूरा-पूरा नापो और तौलो। हम किसी व्यक्ति पर उसी काम की ज़िम्मेदारी का बोझ डालते हैं जो उसकी सामर्थ्य में हो। और जब बात कहो, तो न्याय की कहो, चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो, और अल्लाह की प्रतिज्ञा को पूरा करो। ये बातें हैं, जिनकी उसने तुम्हें ताकीद की है। आशा है तुम ध्यान रखोगे
اِتَّبِعُوا مَٓا اُنْزِلَ اِلَيْكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ وَلَا تَتَّبِعُوا مِنْ دُونِه۪ٓ اَوْلِيَٓاءَۜ قَل۪يلًا مَا تَذَكَّرُونَ
जो कुछ तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी ओर अवतरित हुआ है, उस पर चलो और उसे छोड़कर दूसरे संरक्षक मित्रों का अनुसरण न करो। तुम लोग नसीहत थोड़े ही मानते हो
قُلْ اَمَرَ رَبّ۪ي بِالْقِسْطِ۠ وَاَق۪يمُوا وُجُوهَكُمْ عِنْدَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَادْعُوهُ مُخْلِص۪ينَ لَهُ الدّ۪ينَۜ كَمَا بَدَاَكُمْ تَعُودُونَۜ
कह दो, "मेरे रब ने तो न्याय का आदेश दिया है और यह कि इबादत के प्रत्येक अवसर पर अपना रुख़ ठीक रखो और निरे उसी के भक्त एवं आज्ञाकारी बनकर उसे पुकारो। जैसे उसने तुम्हें पहली बार पैदा किया, वैसे ही तुम फिर पैदा होगे।"
يَا بَن۪ٓي اٰدَمَ خُذُوا ز۪ينَتَكُمْ عِنْدَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَكُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُواۚ اِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْرِف۪ينَ۟
ऐ आदम की सन्तान! इबादत के प्रत्येक अवसर पर शोभा धारण करो; खाओ और पियो, परन्तु हद से आगे न बढ़ो। निश्चय ही, वह हद से आगे बदनेवालों को पसन्द नहीं करता
اُدْعُوا رَبَّكُمْ تَضَرُّعًا وَخُفْيَةًۜ اِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَد۪ينَۚ
अपने रब को गिड़गिड़ाकर और चुपके-चुपके पुकारो। निश्चय ही वह हद से आगे बढ़नेवालों को पसन्द नहीं करता
وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْاَرْضِ بَعْدَ اِصْلَاحِهَا وَادْعُوهُ خَوْفًا وَطَمَعًاۜ اِنَّ رَحْمَتَ اللّٰهِ قَر۪يبٌ مِنَ الْمُحْسِن۪ينَ
और धरती में उसके सुधार के पश्चात बिगाड़ न पैदा करो। भय और आशा के साथ उसे पुकारो। निश्चय ही, अल्लाह की दयालुता सत्कर्मी लोगों के निकट है
وَلِلّٰهِ الْاَسْمَٓاءُ الْحُسْنٰى فَادْعُوهُ بِهَاۖ وَذَرُوا الَّذ۪ينَ يُلْحِدُونَ ف۪ٓي اَسْمَٓائِه۪ۜ سَيُجْزَوْنَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
अच्छे नाम अल्लाह ही के है। तो तुम उन्हीं के द्वारा उसे पुकारो और उन लोगों को छोड़ो जो उसके नामों के सम्बन्ध में कुटिलता ग्रहण करते है। जो कुछ वे करते है, उसका बदला वे पाकर रहेंगे
خُذِ الْعَفْوَ وَاْمُرْ بِالْعُرْفِ وَاَعْرِضْ عَنِ الْجَاهِل۪ينَ
क्षमा की नीति अपनाओ और भलाई का हुक्म देते रहो और अज्ञानियों से किनारा खींचो
وَاِمَّا يَنْزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللّٰهِۜ اِنَّهُ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ
और यदि शैतान तुम्हें उकसाए तो अल्लाह की शरण माँगो। निश्चय ही, वह सब कुछ सुनता जानता है
وَاِذَا قُرِئَ الْقُرْاٰنُ فَاسْتَمِعُوا لَهُ وَاَنْصِتُوا لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे ध्यानपूर्वक सुनो और चुप रहो, ताकि तुमपर दया की जाए
وَاذْكُرْ رَبَّكَ ف۪ي نَفْسِكَ تَضَرُّعًا وَخ۪يفَةً وَدُونَ الْجَهْرِ مِنَ الْقَوْلِ بِالْغُدُوِّ وَالْاٰصَالِ وَلَا تَكُنْ مِنَ الْغَافِل۪ينَ
अपने रब को अपने मन में प्रातः और संध्या के समयों में विनम्रतापूर्वक, डरते हुए और हल्की आवाज़ के साथ याद किया करो। और उन लोगों में से न हो जाओ जो ग़फ़लत में पड़े हुए है
وَاذْكُرْ رَبَّكَ ف۪ي نَفْسِكَ تَضَرُّعًا وَخ۪يفَةً وَدُونَ الْجَهْرِ مِنَ الْقَوْلِ بِالْغُدُوِّ وَالْاٰصَالِ وَلَا تَكُنْ مِنَ الْغَافِل۪ينَ
अपने रब को अपने मन में प्रातः और संध्या के समयों में विनम्रतापूर्वक, डरते हुए और हल्की आवाज़ के साथ याद किया करो। और उन लोगों में से न हो जाओ जो ग़फ़लत में पड़े हुए है
يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ الْاَنْفَالِۜ قُلِ الْاَنْفَالُ لِلّٰهِ وَالرَّسُولِۚ فَاتَّقُوا اللّٰهَ وَاَصْلِحُوا ذَاتَ بَيْنِكُمْۖ وَاَط۪يعُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُٓ اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَ
वे तुमसे ग़नीमतों के विषय में पूछते है। कहो, "ग़नीमतें अल्लाह और रसूल की है। अतः अल्लाह का डर रखों और आपस के सम्बन्धों को ठीक रखो। और, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो, यदि तुम ईमानवाले हो
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا لَق۪يتُمُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا زَحْفًا فَلَا تُوَلُّوهُمُ الْاَدْبَارَۚ
ऐ ईमान लानेवालो! जब एक सेना के रूप में तुम्हारा इनकार करनेवालों से मुक़ाबला हो तो पीठ न फेरो
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَخُونُوا اللّٰهَ وَالرَّسُولَ وَتَخُونُٓوا اَمَانَاتِكُمْ وَاَنْتُمْ تَعْلَمُونَ
ऐ ईमान लानेवालो! जानते-बुझते तुम अल्लाह और उसके रसूल के साथ विश्वासघात न करना और न अपनी अमानतों में ख़ियानत करना
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذ۪ينَ خَرَجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ بَطَرًا وَرِئَٓاءَ النَّاسِ وَيَصُدُّونَ عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِۜ وَاللّٰهُ بِمَا يَعْمَلُونَ مُح۪يطٌ
और उन लोगों की तरह न हो जाना जो अपने घरों से इतराते और लोगों को दिखाते निकले थे और वे अल्लाह के मार्ग से रोकते है, हालाँकि जो कुछ वे करते है, अल्लाह उसे अपने घेरे में लिए हुए है
وَاَعِدُّوا لَهُمْ مَا اسْتَطَعْتُمْ مِنْ قُوَّةٍ وَمِنْ رِبَاطِ الْخَيْلِ تُرْهِبُونَ بِه۪ عَدُوَّ اللّٰهِ وَعَدُوَّكُمْ وَاٰخَر۪ينَ مِنْ دُونِهِمْۚ لَا تَعْلَمُونَهُمْۚ اَللّٰهُ يَعْلَمُهُمْۜ وَمَا تُنْفِقُوا مِنْ شَيْءٍ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ يُوَفَّ اِلَيْكُمْ وَاَنْتُمْ لَا تُظْلَمُونَ
और जो भी तुमसे हो सके, उनके लिए बल और बँधे घोड़े तैयार रखो, ताकि इसके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं और अपने शत्रुओं और इनके अतिरिक्त उन दूसरे लोगों को भी भयभीत कर दो जिन्हें तुम नहीं जानते। अल्लाह उनको जानता है और अल्लाह के मार्ग में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा और तुम्हारे साथ कदापि अन्याय न होगा
قُلِ انْظُرُوا مَاذَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَمَا تُغْنِي الْاٰيَاتُ وَالنُّذُرُ عَنْ قَوْمٍ لَا يُؤْمِنُونَ
कहो, "देख लो, आकाशों और धरती में क्या कुछ है!" किन्तु निशानियाँ और चेतावनियाँ उन लोगों के कुछ काम नहीं आती, जो ईमान न लाना चाहें
وَلَا تَرْكَنُٓوا اِلَى الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا فَتَمَسَّكُمُ النَّارُۙ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مِنْ اَوْلِيَٓاءَ ثُمَّ لَا تُنْصَرُونَ
उन लोगों की ओर तनिक भी न झुकना, जिन्होंने अत्याचार की नीति अपनाई हैं, अन्यथा आग तुम्हें आ लिपटेगी - और अल्लाह से हटकर तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र नहीं - फिर तुम्हें कोई सहायता भी न मिलेगी
وَمَٓا اَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ اِلَّا رِجَالًا نُوح۪ٓي اِلَيْهِمْ فَسْـَٔلُٓوا اَهْلَ الذِّكْرِ اِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَۙ
हमने तुमसे पहले भी पुरुषों ही को रसूल बनाकर भेजा था - जिनकी ओर हम प्रकाशना करते रहे है। यदि तुम नहीं जानते तो अनुस्मृतिवालों से पूछ लो
فَلَا تَضْرِبُوا لِلّٰهِ الْاَمْثَالَۜ اِنَّ اللّٰهَ يَعْلَمُ وَاَنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
अतः अल्लाह के लिए मिसालें न घड़ो। जानता अल्लाह है, तुम नहीं जानते
وَاَوْفُوا بِعَهْدِ اللّٰهِ اِذَا عَاهَدْتُمْ وَلَا تَنْقُضُوا الْاَيْمَانَ بَعْدَ تَوْك۪يدِهَا وَقَدْ جَعَلْتُمُ اللّٰهَ عَلَيْكُمْ كَف۪يلًاۜ اِنَّ اللّٰهَ يَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ
अल्लाह के साथ की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करो, जबकि तुमने प्रतिज्ञा की हो। और अपनी क़समों को उन्हें सुदृढ़ करने के पश्चात मत तोड़ो, जबकि तुम अपने ऊपर अल्लाह को अपना ज़ामिन बना चुके हो। निश्चय ही अल्लाह जानता है जो कुछ तुम करते हो
فَكُلُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللّٰهُ حَلَالًا طَيِّبًاۖ وَاشْكُرُوا نِعْمَتَ اللّٰهِ اِنْ كُنْتُمْ اِيَّاهُ تَعْبُدُونَ
अतः जो कुछ अल्लाह ने तुम्हें हलाल-पाक रोज़ी दी है उसे खाओ और अल्लाह की नेमत के प्रति कृतज्ञता दिखाओ, यदि तुम उसी को स्वामी मानते हो