आदेश और निषेध

98 आयतें, 3/4 पृष्ठ
وَلَا تَقُولُوا لِمَا تَصِفُ اَلْسِنَتُكُمُ الْكَذِبَ هٰذَا حَلَالٌ وَهٰذَا حَرَامٌ لِتَفْتَرُوا عَلَى اللّٰهِ الْكَذِبَۜ اِنَّ الَّذ۪ينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللّٰهِ الْكَذِبَ لَا يُفْلِحُونَۜ
और अपनी ज़बानों के बयान किए हुए झूठ के आधार पर यह न कहा करो, "यह हलाल है और यह हराम है," ताकि इस तरह अल्लाह पर झूठ आरोपित करो। जो लोग अल्लाह से सम्बद्ध करके झूठ घड़ते है, वे कदापि सफल होनेवाले नहीं
ثُمَّ اَوْحَيْنَٓا اِلَيْكَ اَنِ اتَّبِعْ مِلَّةَ اِبْرٰه۪يمَ حَن۪يفًاۜ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَ
फिर अब हमने तुम्हारी ओर प्रकाशना की, "इबराहीम के तरीक़े पर चलो, जो बिलकुल एक ओर का हो गया था और बहुदेववादियों में से न था।"
اُدْعُ اِلٰى سَب۪يلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَجَادِلْهُمْ بِالَّت۪ي هِيَ اَحْسَنُۜ اِنَّ رَبَّكَ هُوَ اَعْلَمُ بِمَنْ ضَلَّ عَنْ سَب۪يلِه۪ وَهُوَ اَعْلَمُ بِالْمُهْتَد۪ينَ
अपने रब के मार्ग की ओर तत्वदर्शिता और सदुपदेश के साथ बुलाओ और उनसे ऐसे ढंग से वाद विवाद करो जो उत्तम हो। तुम्हारा रब उसे भली-भाँति जानता है जो उसके मार्ग से भटक गया और वह उन्हें भी भली-भाँति जानता है जो मार्ग पर है
وَاِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُمْ بِه۪ۜ وَلَئِنْ صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌ لِلصَّابِر۪ينَ
और यदि तुम बदला लो तो उतना ही जितना तुम्हें कष्ट पहुँचा हो, किन्तु यदि तुम सब्र करो तो निश्चय ही यह सब्र करनेवालों के लिए ज़्यादा अच्छा है
وَقَضٰى رَبُّكَ اَلَّا تَعْبُدُٓوا اِلَّٓا اِيَّاهُ وَبِالْوَالِدَيْنِ اِحْسَانًاۜ اِمَّا يَبْلُغَنَّ عِنْدَكَ الْكِبَرَ اَحَدُهُمَٓا اَوْ كِلَاهُمَا فَلَا تَقُلْ لَهُمَٓا اُفٍّ وَلَا تَنْهَرْهُمَا وَقُلْ لَهُمَا قَوْلًا كَر۪يمًا
तुम्हारे रब ने फ़ैसला कर दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें 'उँह' तक न कहो और न उन्हें झिझको, बल्कि उनसे शिष्टतापूर्वक बात करो
وَاٰتِ ذَا الْقُرْبٰى حَقَّهُ وَالْمِسْك۪ينَ وَابْنَ السَّب۪يلِ وَلَا تُبَذِّرْ تَبْذ۪يرًا
और नातेदार को उसका हक़ दो मुहताज और मुसाफ़िर को भी - और फुज़ूलख़र्ची न करो
وَلَا تَجْعَلْ يَدَكَ مَغْلُولَةً اِلٰى عُنُقِكَ وَلَا تَبْسُطْهَا كُلَّ الْبَسْطِ فَتَقْعُدَ مَلُومًا مَحْسُورًا
और अपना हाथ न तो अपनी गरदन से बाँधे रखो और न उसे बिलकुल खुला छोड़ दो कि निन्दित और असहाय होकर बैठ जाओ
وَلَا تَقْتُلُٓوا اَوْلَادَكُمْ خَشْيَةَ اِمْلَاقٍۜ نَحْنُ نَرْزُقُهُمْ وَاِيَّاكُمْۜ اِنَّ قَتْلَهُمْ كَانَ خِطْـًٔا كَب۪يرًا
और निर्धनता के भय से अपनी सन्तान की हत्या न करो, हम उन्हें भी रोज़ी देंगे और तुम्हें भी। वास्तव में उनकी हत्या बहुत ही बड़ा अपराध है
وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنٰٓى اِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةًۜ وَسَٓاءَ سَب۪يلًا
और व्यभिचार के निकट न जाओ। वह एक अश्लील कर्म और बुरा मार्ग है
وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّت۪ي حَرَّمَ اللّٰهُ اِلَّا بِالْحَقِّۜ وَمَنْ قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّه۪ سُلْطَانًا فَلَا يُسْرِفْ فِي الْقَتْلِۜ اِنَّهُ كَانَ مَنْصُورًا
किसी जीव की हत्या न करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहराया है। यह और बात है कि हक़ (न्याय) का तक़ाज़ा यही हो। और जिसकी अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो, उसके उत्तराधिकारी को हमने अधिकार दिया है (कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है), किन्तु वह हत्या के विषय में सीमा का उल्लंघन न करे। निश्चय ही उसकी सहायता की जाएगी
وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَت۪يمِ اِلَّا بِالَّت۪ي هِيَ اَحْسَنُ حَتّٰى يَبْلُغَ اَشُدَّهُۖ وَاَوْفُوا بِالْعَهْدِۚ اِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْؤُ۫لًا
और अनाथ के माल को हाथ में लगाओ सिवाय उत्तम रीति के, यहाँ तक कि वह अपनी युवा अवस्था को पहुँच जाए, और प्रतिज्ञा पूरी करो। प्रतिज्ञा के विषय में अवश्य पूछा जाएगा
وَاَوْفُوا الْكَيْلَ اِذَا كِلْتُمْ وَزِنُوا بِالْقِسْطَاسِ الْمُسْتَق۪يمِۜ ذٰلِكَ خَيْرٌ وَاَحْسَنُ تَاْو۪يلًا
और जब नापकर दो तो, नाप पूरी रखो। और ठीक तराज़ू से तौलो, यही उत्तम और परिणाम की दृष्टि से भी अधिक अच्छा है
وَلَا تَقْفُ مَا لَيْسَ لَكَ بِه۪ عِلْمٌۜ اِنَّ السَّمْعَ وَالْبَصَرَ وَالْفُؤَادَ كُلُّ اُو۬لٰٓئِكَ كَانَ عَنْهُ مَسْؤُ۫لًا
और जिस चीज़ का तुम्हें ज्ञान न हो उसके पीछे न लगो। निस्संदेह कान और आँख और दिल इनमें से प्रत्येक के विषय में पूछा जाएगा
وَلَا تَمْشِ فِي الْاَرْضِ مَرَحًاۚ اِنَّكَ لَنْ تَخْرِقَ الْاَرْضَ وَلَنْ تَبْلُغَ الْجِبَالَ طُولًا
और धरती में अकड़कर न चलो, न तो तुम धरती को फाड़ सकते हो और न लम्बे होकर पहाड़ो को पहुँच सकते हो
قُلِ ادْعُوا اللّٰهَ اَوِ ادْعُوا الرَّحْمٰنَۜ اَيًّا مَا تَدْعُوا فَلَهُ الْاَسْمَٓاءُ الْحُسْنٰىۚ وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا وَابْتَغِ بَيْنَ ذٰلِكَ سَب۪يلًا
कह दो, "तुम अल्लाह को पुकारो या रहमान को पुकारो या जिस नाम से भी पुकारो, उसके लिए सब अच्छे ही नाम है।" और अपनी नमाज़ न बहुत ऊँची आवाज़ से पढ़ो और न उसे बहुत चुपके से पढ़ो, बल्कि इन दोनों के बीच मध्य मार्ग अपनाओ
وَاصْبِرْ نَفْسَكَ مَعَ الَّذ۪ينَ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ بِالْغَدٰوةِ وَالْعَشِيِّ يُر۪يدُونَ وَجْهَهُ وَلَا تَعْدُ عَيْنَاكَ عَنْهُمْۚ تُر۪يدُ ز۪ينَةَ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَلَا تُطِعْ مَنْ اَغْفَلْنَا قَلْبَهُ عَنْ ذِكْرِنَا وَاتَّبَعَ هَوٰيهُ وَكَانَ اَمْرُهُ فُرُطًا
अपने आपको उन लोगों के साथ थाम रखो, जो प्रातःकाल और सायंकाल अपने रब को उसकी प्रसन्नता चाहते हुए पुकारते है और सांसारिक जीवन की शोभा की चाह में तुम्हारी आँखें उनसे न फिरें। और ऐसे व्यक्ति की बात न मानना जिसके दिल को हमने अपनी याद से ग़ाफ़िल पाया है और वह अपनी इच्छा और वासना के पीछे लगा हुआ है और उसका मामला हद से आगे बढ़ गया है
وَاْمُرْ اَهْلَكَ بِالصَّلٰوةِ وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَاۜ لَا نَسْـَٔلُكَ رِزْقًاۜ نَحْنُ نَرْزُقُكَۜ وَالْعَاقِبَةُ لِلتَّقْوٰى
और अपने लोगों को नमाज़ का आदेश करो और स्वयं भी उसपर जमे रहो। हम तुमसे कोई रोज़ी नहीं माँगते। रोज़ी हम ही तुम्हें देते है, और अच्छा परिणाम तो धर्मपरायणता ही के लिए निश्चित है
ذٰلِكَۗ وَمَنْ يُعَظِّمْ حُرُمَاتِ اللّٰهِ فَهُوَ خَيْرٌ لَهُ عِنْدَ رَبِّه۪ۜ وَاُحِلَّتْ لَكُمُ الْاَنْعَامُ اِلَّا مَا يُتْلٰى عَلَيْكُمْ فَاجْتَنِبُوا الرِّجْسَ مِنَ الْاَوْثَانِ وَاجْتَنِبُوا قَوْلَ الزُّورِۙ
इन बातों का ध्यान रखों और जो कोई अल्लाह द्वारा निर्धारित मर्यादाओं का आदर करे, तो यह उसके रब के यहाँ उसी के लिए अच्छा है। और तुम्हारे लिए चौपाए हलाल है, सिवाय उनके जो तुम्हें बताए गए हैं। तो मूर्तियों की गन्दगी से बचो और बचो झूठी बातों से
وَجَاهِدُوا فِي اللّٰهِ حَقَّ جِهَادِه۪ۜ هُوَ اجْتَبٰيكُمْ وَمَا جَعَلَ عَلَيْكُمْ فِي الدّ۪ينِ مِنْ حَرَجٍۜ مِلَّةَ اَب۪يكُمْ اِبْرٰه۪يمَۜ هُوَ سَمّٰيكُمُ الْمُسْلِم۪ينَ مِنْ قَبْلُ وَف۪ي هٰذَا لِيَكُونَ الرَّسُولُ شَه۪يدًا عَلَيْكُمْ وَتَكُونُوا شُهَدَٓاءَ عَلَى النَّاسِۚ فَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَ وَاعْتَصِمُوا بِاللّٰهِۜ هُوَ مَوْلٰيكُمْۚ فَنِعْمَ الْمَوْلٰى وَنِعْمَ النَّص۪يرُ
और परस्पर मिलकर जिहाद करो अल्लाह के मार्ग में, जैसा कि जिहाद का हक़ है। उसने तुम्हें चुन लिया है - और धर्म के मामले में तुमपर कोई तंगी और कठिनाई नहीं रखी। तुम्हारे बाप इबराहीम के पंथ को तुम्हारे लिए पसन्द किया। उसने इससे पहले तुम्हारा नाम मुस्लिम (आज्ञाकारी) रखा था और इस ध्येय से - ताकि रसूल तुमपर गवाह हो और तुम लोगों पर गवाह हो। अतः नमाज़ का आयोजन करो और ज़कात दो और अल्लाह को मज़बूती से पकड़े रहो। वही तुम्हारा संरक्षक है। तो क्या ही अच्छा संरक्षक है और क्या ही अच्छा सहायक!
وَاِنَّ هٰذِه۪ٓ اُمَّتُكُمْ اُمَّةً وَاحِدَةً وَاَنَا۬ رَبُّكُمْ فَاتَّقُونِ
और निश्चय ही यह तुम्हारा समुदाय, एक ही समुदाय है और मैं तुम्हारा रब हूँ। अतः मेरा डर रखो।"
يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اذْكُرُوا نِعْمَتَ اللّٰهِ عَلَيْكُمْۜ هَلْ مِنْ خَالِقٍ غَيْرُ اللّٰهِ يَرْزُقُكُمْ مِنَ السَّمَٓاءِ وَالْاَرْضِۜ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۘ فَاَنّٰى تُؤْفَكُونَ
ऐ लोगो! अल्लाह की तुमपर जो अनुकम्पा है, उसे याद करो। क्या अल्लाह के सिवा कोई और पैदा करनेवाला है, जो तुम्हें आकाश और धरती से रोज़ी देता हो? उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। तो तुम कहाँ से उलटे भटके चले जा रहे हो?
اِنَّ الشَّيْطَانَ لَكُمْ عَدُوٌّ فَاتَّخِذُوهُ عَدُوًّاۜ اِنَّمَا يَدْعُوا حِزْبَهُ لِيَكُونُوا مِنْ اَصْحَابِ السَّع۪يرِۜ
निश्चय ही शैतान तुम्हारा शत्रु है। अतः तुम उसे शत्रु ही समझो। वह तो अपने गिरोह को केवल इसी लिए बुला रहा है कि वे दहकती आगवालों में सम्मिलित हो जाएँ
اِنَّٓا اَنْزَلْنَٓا اِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ فَاعْبُدِ اللّٰهَ مُخْلِصًا لَهُ الدّ۪ينَۜ
निस्संदेह हमने यह किताब तुम्हारी ओर सत्य के साथ अवतरित की है
قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذ۪ينَ اَسْرَفُوا عَلٰٓى اَنْفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَم۪يعًاۜ اِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّح۪يمُ
कह दो, "ऐ मेरे बन्दो, जिन्होंने अपने आप पर ज्यादती की है, अल्लाह की दयालुता से निराश न हो। निस्संदेह अल्लाह सारे ही गुनाहों का क्षमा कर देता है। निश्चय ही वह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
وَلَا تَسْتَوِي الْحَسَنَةُ وَلَا السَّيِّئَةُۜ اِدْفَعْ بِالَّت۪ي هِيَ اَحْسَنُ فَاِذَا الَّذ۪ي بَيْنَكَ وَبَيْنَهُ عَدَاوَةٌ كَاَنَّهُ وَلِيٌّ حَم۪يمٌ
भलाई और बुराई समान नहीं है। तुम (बुरे आचरण की बुराई को) अच्छे से अच्छे आचरण के द्वारा दूर करो। फिर क्या देखोगे कि वही व्यक्ति तुम्हारे और जिसके बीच वैर पड़ा हुआ था, जैसे वह कोई घनिष्ठ मित्र है