हामीम अस-सजदा - कुरान पढ़ें
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
حٰمٓۜ1
हा॰ मीम॰
تَنْز۪يلٌ مِنَ الرَّحْمٰنِ الرَّح۪يمِۚ2
यह अवतरण है बड़े कृपाशील, अत्यन्त दयावान की ओर से,
كِتَابٌ فُصِّلَتْ اٰيَاتُهُ قُرْاٰنًا عَرَبِيًّا لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَۙ3
एक किताब, जिसकी आयतें खोल-खोलकर बयान हुई है; अरबी क़ुरआन के रूप में, उन लोगों के लिए जो जानना चाहें;
بَش۪يرًا وَنَذ۪يرًاۚ فَاَعْرَضَ اَكْثَرُهُمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ4
शुभ सूचक एवं सचेतकर्त्ता किन्तु उनमें से अधिकतर कतरा गए तो वे सुनते ही नहीं
وَقَالُوا قُلُوبُنَا ف۪ٓي اَكِنَّةٍ مِمَّا تَدْعُونَٓا اِلَيْهِ وَف۪ٓي اٰذَانِنَا وَقْرٌ وَمِنْ بَيْنِنَا وَبَيْنِكَ حِجَابٌ فَاعْمَلْ اِنَّنَا عَامِلُونَ5
और उनका कहना है कि "जिसकी ओर तुम हमें बुलाते हो उसके लिए तो हमारे दिल आवरणों में है। और हमारे कानों में बोझ है। और हमारे और तुम्हारे बीच एक ओट है; अतः तुम अपना काम करो, हम तो अपना काम करते है।"
قُلْ اِنَّمَٓا اَنَا۬ بَشَرٌ مِثْلُكُمْ يُوحٰٓى اِلَيَّ اَنَّمَٓا اِلٰهُكُمْ اِلٰهٌ وَاحِدٌ فَاسْتَق۪يمُٓوا اِلَيْهِ وَاسْتَغْفِرُوهُۜ وَوَيْلٌ لِلْمُشْرِك۪ينَۙ6
कह दो, "मैं तो तुम्हीं जैसा मनुष्य हूँ। मेरी ओर प्रकाशना की जाती है कि तुम्हारा पूज्य-प्रभु बस अकेला पूज्य-प्रभु है। अतः तुम सीधे उसी का रुख करो और उसी से क्षमा-याचना करो - साझी ठहरानेवालों के लिए तो बड़ी तबाही है,
اَلَّذ۪ينَ لَا يُؤْتُونَ الزَّكٰوةَ وَهُمْ بِالْاٰخِرَةِ هُمْ كَافِرُونَ7
जो ज़कात नहीं देते और वही है जो आख़िरत का इनकार करते है। -
اِنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ اَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍ۟8
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उनके लिए ऐसा बदला है जिसका क्रम टूटनेवाला नहीं।"
قُلْ اَئِنَّكُمْ لَتَكْفُرُونَ بِالَّذ۪ي خَلَقَ الْاَرْضَ ف۪ي يَوْمَيْنِ وَتَجْعَلُونَ لَهُٓ اَنْدَادًاۜ ذٰلِكَ رَبُّ الْعَالَم۪ينَۚ9
कहो, "क्या तुम उसका इनकार करते हो, जिसने धरती को दो दिनों (काल) में पैदा किया और तुम उसके समकक्ष ठहराते हो? वह तो सारे संसार का रब है
وَجَعَلَ ف۪يهَا رَوَاسِيَ مِنْ فَوْقِهَا وَبَارَكَ ف۪يهَا وَقَدَّرَ ف۪يهَٓا اَقْوَاتَهَا ف۪ٓي اَرْبَعَةِ اَيَّامٍۜ سَوَٓاءً لِلسَّٓائِل۪ينَ10
और उसने उस (धरती) में उसके ऊपर से पहाड़ जमाए और उसमें बरकत रखी और उसमें उसकी ख़ुराकों को ठीक अंदाज़े से रखा। माँग करनेवालों के लिए समान रूप से यह सब चार दिन में हुआ
ثُمَّ اسْتَوٰٓى اِلَى السَّمَٓاءِ وَهِيَ دُخَانٌ فَقَالَ لَهَا وَلِلْاَرْضِ ائْتِيَا طَوْعًا اَوْ كَرْهًاۜ قَالَتَٓا اَتَيْنَا طَٓائِع۪ينَ11
फिर उसने आकाश की ओर रुख़ किया, जबकि वह मात्र धुआँ था- और उसने उससे और धरती से कहा, 'आओ, स्वेच्छा के साथ या अनिच्छा के साथ।' उन्होंने कहा, 'हम स्वेच्छा के साथ आए।' -
فَقَضٰيهُنَّ سَبْعَ سَمٰوَاتٍ ف۪ي يَوْمَيْنِ وَاَوْحٰى ف۪ي كُلِّ سَمَٓاءٍ اَمْرَهَاۜ وَزَيَّنَّا السَّمَٓاءَ الدُّنْيَا بِمَصَاب۪يحَۗ وَحِفْظًاۜ ذٰلِكَ تَقْد۪يرُ الْعَز۪يزِ الْعَل۪يمِ12
फिर दो दिनों में उनको अर्थात सात आकाशों को बनाकर पूरा किया और प्रत्येक आकाश में उससे सम्बन्धित आदेश की प्रकाशना कर दी औऱ दुनिया के (निकटवर्ती) आकाश को हमने दीपों से सजाया (रात के यात्रियों के दिशा-निर्देश आदि के लिए) और सुरक्षित करने के उद्देश्य से। यह अत्.न्त प्रभुत्वशाली, सर्वज्ञ का ठहराया हुआ है।"
فَاِنْ اَعْرَضُوا فَقُلْ اَنْذَرْتُكُمْ صَاعِقَةً مِثْلَ صَاعِقَةِ عَادٍ وَثَمُودَۜ13
अब यदि वे लोग ध्यान में न लाएँ तो कह दो, "मैं तुम्हें उसी तरह के कड़का (वज्रवात) से डराता हूँ, जैसा कड़का आद और समूद पर हुआ था।"
اِذْ جَٓاءَتْهُمُ الرُّسُلُ مِنْ بَيْنِ اَيْد۪يهِمْ وَمِنْ خَلْفِهِمْ اَلَّا تَعْبُدُٓوا اِلَّا اللّٰهَۜ قَالُوا لَوْ شَٓاءَ رَبُّنَا لَاَنْزَلَ مَلٰٓئِكَةً فَاِنَّا بِمَٓا اُرْسِلْتُمْ بِه۪ كَافِرُونَ14
जब उनके पास रसूल उनके आगे और उनके पीछे से आए कि "अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो।" तो उन्होंने कहा, "यदि हमारा रब चाहता तो फ़रिश्तों को उतार देता। अतः जिस चीज़ के साथ तुम्हें भेजा गया है, हम उसे नहीं मानते।"
فَاَمَّا عَادٌ فَاسْتَكْبَرُوا فِي الْاَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَقَالُوا مَنْ اَشَدُّ مِنَّا قُوَّةًۜ اَوَلَمْ يَرَوْا اَنَّ اللّٰهَ الَّذ۪ي خَلَقَهُمْ هُوَ اَشَدُّ مِنْهُمْ قُوَّةًۜ وَكَانُوا بِاٰيَاتِنَا يَجْحَدُونَ15
रहे आद, तो उन्होंने नाहक़ धरती में घमंड किया और कहा, "कौन हमसे शक्ति में बढ़कर है?" क्या उन्होंने नहीं देखा कि अल्लाह, जिसने उन्हें पैदा किया, वह उनसे शक्ति में बढ़कर है? वे तो हमारी आयतों का इनकार ही करते रहे
فَاَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ ر۪يحًا صَرْصَرًا ف۪ٓي اَيَّامٍ نَحِسَاتٍ لِنُذ۪يقَهُمْ عَذَابَ الْخِزْيِ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۜ وَلَعَذَابُ الْاٰخِرَةِ اَخْزٰى وَهُمْ لَا يُنْصَرُونَ16
अन्ततः हमने कुछ अशुभ दिनों में उनपर एक शीत-झंझावात चलाई, ताकि हम उन्हें सांसारिक जीवन में अपमान और रुसवाई की यातना का मज़ा चखा दें। और आख़िरत की यातना तो इससे कहीं बढ़कर रुसवा करनेवाली है। और उनको कोई सहायता भी न मिल सकेगी
وَاَمَّا ثَمُودُ فَهَدَيْنَاهُمْ فَاسْتَحَبُّوا الْعَمٰى عَلَى الْهُدٰى فَاَخَذَتْهُمْ صَاعِقَةُ الْعَذَابِ الْهُونِ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَۚ17
और रहे समूद, तो हमने उनके सामने सीधा मार्ग दिखाया, किन्तु मार्गदर्शन के मुक़ाबले में उन्होंने अन्धा रहना ही पसन्द किया। परिणामतः जो कुछ वे कमाई करते रहे थे उसके बदले में अपमानजनक यातना के कड़के ने उन्हें आ पकड़ा
وَنَجَّيْنَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ۟18
और हमने उन लोगों को बचा लिया जो ईमान लाए थे और डर रखते थे
وَيَوْمَ يُحْشَرُ اَعْدَٓاءُ اللّٰهِ اِلَى النَّارِ فَهُمْ يُوزَعُونَ19
और विचार करो जिस दिन अल्लाह के शत्रु आग की ओर एकत्र करके लाए जाएँगे, फिर उन्हें श्रेणियों में क्रमबद्ध किया जाएगा, यहाँ तक की जब वे उसके पास पहुँच जाएँगे
حَتّٰٓى اِذَا مَا جَٓاؤُ۫هَا شَهِدَ عَلَيْهِمْ سَمْعُهُمْ وَاَبْصَارُهُمْ وَجُلُودُهُمْ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ20
तो उनके कान और उनकी आँखें और उनकी खालें उनके विरुद्ध उन बातों की गवाही देंगी, जो कुछ वे करते रहे होंगे
وَقَالُوا لِجُلُودِهِمْ لِمَ شَهِدْتُمْ عَلَيْنَاۜ قَالُٓوا اَنْطَقَنَا اللّٰهُ الَّذ۪ٓي اَنْطَقَ كُلَّ شَيْءٍ وَهُوَ خَلَقَكُمْ اَوَّلَ مَرَّةٍ وَاِلَيْهِ تُرْجَعُونَ21
वे अपनी खालों से कहेंगे, "तुमने हमारे विरुद्ध क्यों गवाही दी?" वे कहेंगी, "हमें उसी अल्लाह ने वाक्-शक्ति प्रदान की है, जिसने प्रत्येक चीज़ को वाक्-शक्ति प्रदान की।" - उसी ने तुम्हें पहली बार पैदा किया और उसी की ओर तुम्हें लौटना है
وَمَا كُنْتُمْ تَسْتَتِرُونَ اَنْ يَشْهَدَ عَلَيْكُمْ سَمْعُكُمْ وَلَٓا اَبْصَارُكُمْ وَلَا جُلُودُكُمْ وَلٰكِنْ ظَنَنْتُمْ اَنَّ اللّٰهَ لَا يَعْلَمُ كَث۪يرًا مِمَّا تَعْمَلُونَ22
तुम इस भय से छिपते न थे कि तुम्हारे कान तुम्हारे विरुद्ध गवाही देंगे, और न इसलिए कि तुम्हारी आँखें गवाही देंगी और न इस कारण से कि तुम्हारी खाले गवाही देंगी, बल्कि तुमने तो यह समझ रखा था कि अल्लाह तुम्हारे बहुत-से कामों को जानता ही नहीं
وَذٰلِكُمْ ظَنُّكُمُ الَّذ۪ي ظَنَنْتُمْ بِرَبِّكُمْ اَرْدٰيكُمْ فَاَصْبَحْتُمْ مِنَ الْخَاسِر۪ينَ23
और तुम्हारे उस गुमान ने तुम्हे बरबाद किया जो तुमने अपने रब के साथ किया; अतः तुम घाटे में पड़कर रहे
فَاِنْ يَصْبِرُوا فَالنَّارُ مَثْوًى لَهُمْۚ وَاِنْ يَسْتَعْتِبُوا فَمَا هُمْ مِنَ الْمُعْتَب۪ينَ24
अब यदि वे धैर्य दिखाएँ तब भी आग ही उनका ठिकाना है। और यदि वे किसी प्रकार (उसके) क्रोध को दूर करना चाहें, तब भी वे ऐसे नहीं कि वे राज़ी कर सकें
وَقَيَّضْنَا لَهُمْ قُرَنَٓاءَ فَزَيَّنُوا لَهُمْ مَا بَيْنَ اَيْد۪يهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَحَقَّ عَلَيْهِمُ الْقَوْلُ ف۪ٓي اُمَمٍ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِمْ مِنَ الْجِنِّ وَالْاِنْسِۚ اِنَّهُمْ كَانُوا خَاسِر۪ينَ۟25
हमने उनके लिए कुछ साथी नियुक्त कर दिए थे। फिर उन्होंने उनके आगे और उनके पीछे जो कुछ था उसे सुहाना बनाकर उन्हें दिखाया। अन्ततः उनपर भी जिन्नों और मनुष्यों के उन गिरोहों के साथ फ़ैसला सत्यापित होकर रहा, जो उनसे पहले गुज़र चुके थे। निश्चय ही वे घाटा उठानेवाले थे
وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَا تَسْمَعُوا لِهٰذَا الْقُرْاٰنِ وَالْغَوْا ف۪يهِ لَعَلَّكُمْ تَغْلِبُونَ26
जिन लोगों ने इनकार किया उन्होंने कहा, "इस क़ुरआन को सुनो ही मत और इसके बीच में शोर-गुल मचाओ, ताकि तुम प्रभावी रहो।"
فَلَنُذ۪يقَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا عَذَابًا شَد۪يدًا وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ اَسْوَاَ الَّذ۪ي كَانُوا يَعْمَلُونَ27
अतः हम अवश्य ही उन लोगों को, जिन्होंने इनकार किया, कठोर यातना का मजा चखाएँगे, और हम अवश्य उन्हें उसका बदला देंगे, जो निकृष्टतम कर्म वे करते रहे है
ذٰلِكَ جَزَٓاءُ اَعْدَٓاءِ اللّٰهِ النَّارُۚ لَهُمْ ف۪يهَا دَارُ الْخُلْدِۜ جَزَٓاءً بِمَا كَانُوا بِاٰيَاتِنَا يَجْحَدُونَ28
वह है अल्लाह के शत्रुओं का बदला - आग। उसी में उसका सदा का घर है, उसके बदले में जो वे हमारी आयतों का इनकार करते रहे
وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا رَبَّنَٓا اَرِنَا الَّذَيْنِ اَضَلَّانَا مِنَ الْجِنِّ وَالْاِنْسِ نَجْعَلْهُمَا تَحْتَ اَقْدَامِنَا لِيَكُونَا مِنَ الْاَسْفَل۪ينَ29
और जिन लोगों ने इनकार किया वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमें दिखा दे उन जिन्नों और मनुष्यों को, जिन्होंने हमको पथभ्रष़्ट किया कि हम उन्हें अपने पैरों तले डाल दे ताकि वे सबसे नीचे जा पड़े
اِنَّ الَّذ۪ينَ قَالُوا رَبُّنَا اللّٰهُ ثُمَّ اسْتَقَامُوا تَتَنَزَّلُ عَلَيْهِمُ الْمَلٰٓئِكَةُ اَلَّا تَخَافُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَاَبْشِرُوا بِالْجَنَّةِ الَّت۪ي كُنْتُمْ تُوعَدُونَ30
जिन लोगों ने कहा कि "हमारा रब अल्लाह है।" फिर इस पर दृढ़तापूर्वक जमें रहे, उनपर फ़रिश्ते उतरते है कि "न डरो और न शोकाकुल हो, और उस जन्नत की शुभ सूचना लो जिसका तुमसे वादा किया गया है
نَحْنُ اَوْلِيَٓاؤُ۬كُمْ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَفِي الْاٰخِرَةِۚ وَلَكُمْ ف۪يهَا مَا تَشْتَه۪ٓي اَنْفُسُكُمْ وَلَكُمْ ف۪يهَا مَا تَدَّعُونَۜ31
हम सांसारिक जीवन में भी तुम्हारे सहचर मित्र है और आख़िरत में भी। और वहाँ तुम्हारे लिए वह सब कुछ है, जिसकी इच्छा तुम्हारे जी को होगी। और वहाँ तुम्हारे लिए वह सब कुछ होगा, जिसका तुम माँग करोगे
نُزُلًا مِنْ غَفُورٍ رَح۪يمٍ۟32
आतिथ्य के रूप में क्षमाशील, दयावान सत्ता की ओर से"
وَمَنْ اَحْسَنُ قَوْلًا مِمَّنْ دَعَٓا اِلَى اللّٰهِ وَعَمِلَ صَالِحًا وَقَالَ اِنَّن۪ي مِنَ الْمُسْلِم۪ينَ33
और उस व्यक्ति से बात में अच्छा कौन हो सकता है जो अल्लाह की ओर बुलाए और अच्छे कर्म करे और कहे, "निस्संदेह मैं मुस्लिम (आज्ञाकारी) हूँ?"
وَلَا تَسْتَوِي الْحَسَنَةُ وَلَا السَّيِّئَةُۜ اِدْفَعْ بِالَّت۪ي هِيَ اَحْسَنُ فَاِذَا الَّذ۪ي بَيْنَكَ وَبَيْنَهُ عَدَاوَةٌ كَاَنَّهُ وَلِيٌّ حَم۪يمٌ34
भलाई और बुराई समान नहीं है। तुम (बुरे आचरण की बुराई को) अच्छे से अच्छे आचरण के द्वारा दूर करो। फिर क्या देखोगे कि वही व्यक्ति तुम्हारे और जिसके बीच वैर पड़ा हुआ था, जैसे वह कोई घनिष्ठ मित्र है
وَمَا يُلَقّٰيهَٓا اِلَّا الَّذ۪ينَ صَبَرُواۚ وَمَا يُلَقّٰيهَٓا اِلَّا ذُو حَظٍّ عَظ۪يمٍ35
किन्तु यह चीज़ केवल उन लोगों को प्राप्त होती है जो धैर्य से काम लेते है, और यह चीज़ केवल उसको प्राप्त होती है जो बड़ा भाग्यशाली होता है
وَاِمَّا يَنْزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللّٰهِۜ اِنَّهُ هُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُ36
और यदि शैतान की ओर से कोई उकसाहट तुम्हें चुभे तो अल्लाह की शरण माँग लो। निश्चय ही वह सबकुछ सुनता, जानता है
وَمِنْ اٰيَاتِهِ الَّيْلُ وَالنَّهَارُ وَالشَّمْسُ وَالْقَمَرُۜ لَا تَسْجُدُوا لِلشَّمْسِ وَلَا لِلْقَمَرِ وَاسْجُدُوا لِلّٰهِ الَّذ۪ي خَلَقَهُنَّ اِنْ كُنْتُمْ اِيَّاهُ تَعْبُدُونَ37
रात और दिन और सूर्य और चन्द्रमा उसकी निशानियों में से है। तुम न तो सूर्य को सजदा करो और न चन्द्रमा को, बल्कि अल्लाह को सजदा करो जिसने उन्हें पैदा किया, यदि तुम उसी की बन्दगी करनेवाले हो
فَاِنِ اسْتَكْبَرُوا فَالَّذ۪ينَ عِنْدَ رَبِّكَ يُسَبِّحُونَ لَهُ بِالَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَهُمْ لَا يَسْـَٔمُونَ38
लेकिन यदि वे घमंड करें (और अल्लाह को याद न करें), तो जो फ़रिश्ते तुम्हारे रब के पास है वे तो रात और दिन उसकी तसबीह करते ही रहते है और वे उकताते नहीं
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ٓ اَنَّكَ تَرَى الْاَرْضَ خَاشِعَةً فَاِذَٓا اَنْزَلْنَا عَلَيْهَا الْمَٓاءَ اهْتَزَّتْ وَرَبَتْۜ اِنَّ الَّذ۪ٓي اَحْيَاهَا لَمُحْيِ الْمَوْتٰىۜ اِنَّهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ39
और यह चीज़ भी उसकी निशानियों में से है कि तुम देखते हो कि धरती दबी पड़ी है; फिर ज्यों ही हमने उसपर पानी बरसाया कि वह फबक उठी और फूल गई। निश्चय ही जिसने उसे जीवित किया, वही मुर्दों को जीवित करनेवाला है। निस्संदेह उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
اِنَّ الَّذ۪ينَ يُلْحِدُونَ ف۪ٓي اٰيَاتِنَا لَا يَخْفَوْنَ عَلَيْنَاۜ اَفَمَنْ يُلْقٰى فِي النَّارِ خَيْرٌ اَمْ مَنْ يَاْت۪ٓي اٰمِنًا يَوْمَ الْقِيٰمَةِۜ اِعْمَلُوا مَا شِئْتُمْۙ اِنَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ40
जो लोग हमारी आयतों में कुटिलता की नीति अपनाते है वे हमसे छिपे हुए नहीं हैं, तो क्या जो व्यक्ति आग में डाला जाए वह अच्छा है या वह जो क़ियामत के दिन निश्चिन्त होकर आएगा? जो चाहो कर लो, तुम जो कुछ करते हो वह तो उसे देख ही रहा है
اِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِالذِّكْرِ لَمَّا جَٓاءَهُمْۚ وَاِنَّهُ لَكِتَابٌ عَز۪يزٌۙ41
जिन लोगों ने अनुस्मृति का इनकार किया, जबकि वह उनके पास आई, हालाँकि वह एक प्रभुत्वशाली किताब है, (तो न पूछो कि उनका कितना बुरा परिणाम होगा)
لَا يَاْت۪يهِ الْبَاطِلُ مِنْ بَيْنِ يَدَيْهِ وَلَا مِنْ خَلْفِه۪ۜ تَنْز۪يلٌ مِنْ حَك۪يمٍ حَم۪يدٍ42
असत्य उस तक न उसके आगे से आ सकता है और न उसके पीछे से; अवतरण है उसकी ओर से जो अत्यन्त तत्वदर्शी, प्रशंसा के योग्य है
مَا يُقَالُ لَكَ اِلَّا مَا قَدْ ق۪يلَ لِلرُّسُلِ مِنْ قَبْلِكَۜ اِنَّ رَبَّكَ لَذُو مَغْفِرَةٍ وَذُو عِقَابٍ اَل۪يمٍ43
तुम्हें बस वही कहा जा रहा है, जो उन रसूलों को कहा जा चुका है, जो तुमसे पहले गुज़र चुके है। निस्संदेह तुम्हारा रब बड़ा क्षमाशील है और दुखद दंड देनेवाला भी
وَلَوْ جَعَلْنَاهُ قُرْاٰنًا اَعْجَمِيًّا لَقَالُوا لَوْلَا فُصِّلَتْ اٰيَاتُهُۜ ءَاَۭۘعْجَمِيٌّ وَعَرَبِيٌّۜ قُلْ هُوَ لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا هُدًى وَشِفَٓاءٌۜ وَالَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ ف۪ٓي اٰذَانِهِمْ وَقْرٌ وَهُوَ عَلَيْهِمْ عَمًىۜ اُو۬لٰٓئِكَ يُنَادَوْنَ مِنْ مَكَانٍ بَع۪يدٍ۟44
यदि हम उसे ग़ैर अरबी क़ुरआन बनाते तो वे कहते कि "उसकी आयतें क्यों नहीं (हमारी भाषा में) खोलकर बयान की गई? यह क्या कि वाणी तो ग़ैर अरबी है और व्यक्ति अरबी?" कहो, "वह उन लोगों के लिए जो ईमान लाए मार्गदर्शन और आरोग्य है, किन्तु जो लोग ईमान नहीं ला रहे है उनके कानों में बोझ है और वह (क़ुरआन) उनके लिए अन्धापन (सिद्ध हो रहा) है, वे ऐसे है जिनको किसी दूर के स्थान से पुकारा जा रहा हो।"
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ فَاخْتُلِفَ ف۪يهِۜ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِنْ رَبِّكَ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْۜ وَاِنَّهُمْ لَف۪ي شَكٍّ مِنْهُ مُر۪يبٍ45
हमने मूसा को भी किताब प्रदान की थी, फिर उसमें भी विभेद किया गया। यदि तुम्हारे रब की ओर से पहले ही से एक बात निश्चित न हो चुकी होती तो उनके बीत फ़ैसला चुका दिया जाता। हालाँकि वे उसकी ओर से उलझन में डाल देनेवाले सन्देह में पड़े हुए है
مَنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِنَفْسِه۪ وَمَنْ اَسَٓاءَ فَعَلَيْهَاۜ وَمَا رَبُّكَ بِظَلَّامٍ لِلْعَب۪يدِ46
जिस किसी ने अच्छा कर्म किया तो अपने ही लिए और जिस किसी ने बुराई की, तो उसका वबाल भी उसी पर पड़ेगा। वास्तव में तुम्हारा रब अपने बन्दों पर तनिक भी ज़ुल्म नहीं करता
اِلَيْهِ يُرَدُّ عِلْمُ السَّاعَةِۜ وَمَا تَخْرُجُ مِنْ ثَمَرَاتٍ مِنْ اَكْمَامِهَا وَمَا تَحْمِلُ مِنْ اُنْثٰى وَلَا تَضَعُ اِلَّا بِعِلْمِه۪ۜ وَيَوْمَ يُنَاد۪يهِمْ اَيْنَ شُرَكَٓاء۪يۙ قَالُٓوا اٰذَنَّاكَۙ مَا مِنَّا مِنْ شَه۪يدٍۚ47
उस घड़ी का ज्ञान अल्लाह की ओर फिरता है। जो फल भी अपने कोषों से निकलते है और जो मादा भी गर्भवती होती है और बच्चा जनती है, अनिवार्यतः उसे इन सबका ज्ञान होता है। जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा, "कहाँ है मेरे साझीदार?" वे कहेंगे, "हम तेरे समक्ष खुल्लम-ख़ुल्ला कह चुके है कि हममें से कोई भी इसका गवाह नहीं।"
وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَدْعُونَ مِنْ قَبْلُ وَظَنُّوا مَا لَهُمْ مِنْ مَح۪يصٍ48
और जिन्हें वे पहले पुकारा करते थे वे उनसे गुम हो जाएँगे। और वे समझ लेंगे कि उनके लिए कोई भी भागने की जगह नहीं है
لَا يَسْـَٔمُ الْاِنْسَانُ مِنْ دُعَٓاءِ الْخَيْرِۘ وَاِنْ مَسَّهُ الشَّرُّ فَيَؤُ۫سٌ قَنُوطٌ49
मनुष्य भलाई माँगने से नहीं उकताता, किन्तु यदि उसे कोई तकलीफ़ छू जाती है तो वह निराश होकर आस छोड़ बैठता है
وَلَئِنْ اَذَقْنَاهُ رَحْمَةً مِنَّا مِنْ بَعْدِ ضَرَّٓاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هٰذَا ل۪يۙ وَمَٓا اَظُنُّ السَّاعَةَ قَٓائِمَةًۙ وَلَئِنْ رُجِعْتُ اِلٰى رَبّ۪ٓي اِنَّ ل۪ي عِنْدَهُ لَلْحُسْنٰىۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِمَا عَمِلُواۘ وَلَنُذ۪يقَنَّهُمْ مِنْ عَذَابٍ غَل۪يظٍ50
और यदि उस तकलीफ़ के बाद, जो उसे पहुँची, हम उसे अपनी दयालुता का आस्वादन करा दें तो वह निश्चय ही कहेंगा, "यह तो मेरा हक़ ही है। मैं तो यह नहीं समझता कि वह, क़ियामत की घड़ी, घटित होगी और यदि मैं अपने रब की ओर लौटाया भी गया तो अवश्य ही उसके पास मेरे लिए अच्छा पारितोषिक होगा।" फिर हम उन लोगों को जिन्होंने इनकार किया, अवश्य बताकर रहेंगे, जो कुछ उन्होंने किया होगा। और हम उन्हें अवश्य ही कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे
وَاِذَٓا اَنْعَمْنَا عَلَى الْاِنْسَانِ اَعْرَضَ وَنَاٰ بِجَانِبِه۪ۚ وَاِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ فَذُو دُعَٓاءٍ عَر۪يضٍ51
जब हम मनुष्य पर अनुकम्पा करते है तो वह ध्यान में नहीं लाता और अपना पहलू फेर लेता है। किन्तु जब उसे तकलीफ़ छू जाती है, तो वह लम्बी-चौड़ी प्रार्थनाएँ करने लगता है
قُلْ اَرَاَيْتُمْ اِنْ كَانَ مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ ثُمَّ كَفَرْتُمْ بِه۪ مَنْ اَضَلُّ مِمَّنْ هُوَ ف۪ي شِقَاقٍ بَع۪يدٍ52
कह दो, "क्या तुमने विचार किया, यदि वह (क़ुरआन) अल्लाह की ओर सो ही हुआ और तुमने उसका इनकार किया तो उससे बढ़कर भटका हुआ और कौन होगा जो विरोध में बहुत दूर जा पड़ा हो?"
سَنُر۪يهِمْ اٰيَاتِنَا فِي الْاٰفَاقِ وَف۪ٓي اَنْفُسِهِمْ حَتّٰى يَتَبَيَّنَ لَهُمْ اَنَّهُ الْحَقُّۜ اَوَلَمْ يَكْفِ بِرَبِّكَ اَنَّهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَه۪يدٌ53
शीघ्र ही हम उन्हें अपनी निशानियाँ वाह्य क्षेत्रों में दिखाएँगे और स्वयं उनके अपने भीतर भी, यहाँ तक कि उनपर स्पष्टा हो जाएगा कि वह (क़ुरआन) सत्य है। क्या तुम्हारा रब इस दृष्टि, से काफ़ी नहीं कि वह हर चीज़ का साक्षी है
اَلَٓا اِنَّهُمْ ف۪ي مِرْيَةٍ مِنْ لِقَٓاءِ رَبِّهِمْۜ اَلَٓا اِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ مُح۪يطٌ54
जान लो कि वे लोग अपने रब से मिलन के बारे में संदेह में पड़े हुए है। जान लो कि निश्चय ही वह हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है