1. जुज़ - कुरान पढ़ें
1 · अल-फ़ातिहा2 · अल-बक़रा
صِرَاطَ الَّذ۪ينَ اَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْۙ غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّٓالّ۪ينَ7
उन लोगों के मार्ग पर जो तेरे कृपापात्र हुए, जो न प्रकोप के भागी हुए और न पथभ्रष्ट
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
ذٰلِكَ الْكِتَابُ لَا رَيْبَۚۛ ف۪يهِۚۛ هُدًى لِلْمُتَّق۪ينَۙ2
वह किताब यही हैं, जिसमें कोई सन्देह नहीं, मार्गदर्शन हैं डर रखनेवालों के लिए,
اَلَّذ۪ينَ يُؤْمِنُونَ بِالْغَيْبِ وَيُق۪يمُونَ الصَّلٰوةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَۙ3
जो अनदेखे ईमान लाते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया हैं उसमें से कुछ खर्च करते हैं;
وَالَّذ۪ينَ يُؤْمِنُونَ بِمَٓا اُنْزِلَ اِلَيْكَ وَمَٓا اُنْزِلَ مِنْ قَبْلِكَۚ وَبِالْاٰخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَۜ4
और जो उस पर ईमान लाते हैं जो तुम पर उतरा और जो तुमसे पहले अवतरित हुआ हैं और आख़िरत पर वही लोग विश्वास रखते हैं;
اُو۬لٰٓئِكَ عَلٰى هُدًى مِنْ رَبِّهِمْ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ5
वही लोग हैं जो अपने रब के सीधे मार्ग पर हैं और वही सफलता प्राप्त करनेवाले हैं
اِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا سَوَٓاءٌ عَلَيْهِمْ ءَاَنْذَرْتَهُمْ اَمْ لَمْ تُنْذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ6
जिन लोगों ने कुफ़्र (इनकार) किया उनके लिए बराबर हैं, चाहे तुमने उन्हें सचेत किया हो या सचेत न किया हो, वे ईमान नहीं लाएँगे
خَتَمَ اللّٰهُ عَلٰى قُلُوبِهِمْ وَعَلٰى سَمْعِهِمْۜ وَعَلٰٓى اَبْصَارِهِمْ غِشَاوَةٌۘ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظ۪يمٌ۟7
अल्लाह ने उनके दिलों पर और कानों पर मुहर लगा दी है और उनकी आँखों पर परदा पड़ा है, और उनके लिए बड़ी यातना है
وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَقُولُ اٰمَنَّا بِاللّٰهِ وَبِالْيَوْمِ الْاٰخِرِ وَمَا هُمْ بِمُؤْمِن۪ينَۢ8
कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि हम अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं, हालाँकि वे ईमान नहीं रखते
يُخَادِعُونَ اللّٰهَ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُواۚ وَمَا يَخْدَعُونَ اِلَّٓا اَنْفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَۜ9
वे अल्लाह और ईमानवालों के साथ धोखेबाज़ी कर रहे हैं, हालाँकि धोखा वे स्वयं अपने-आपको ही दे रहे हैं, परन्तु वे इसको महसूस नहीं करते
ف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌۙ فَزَادَهُمُ اللّٰهُ مَرَضًاۚ وَلَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌۙ بِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ10
उनके दिलों में रोग था तो अल्लाह ने उनके रोग को और बढ़ा दिया और उनके लिए झूठ बोलते रहने के कारण उनके लिए एक दुखद यातना है
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمْ لَا تُفْسِدُوا فِي الْاَرْضِۙ قَالُٓوا اِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ11
और जब उनसे कहा जाता है कि "ज़मीन में बिगाड़ पैदा न करो", तो कहते हैं, "हम तो केवल सुधारक है।""
اَلَٓا اِنَّهُمْ هُمُ الْمُفْسِدُونَ وَلٰكِنْ لَا يَشْعُرُونَ12
जान लो! वही हैं जो बिगाड़ पैदा करते हैं, परन्तु उन्हें एहसास नहीं होता
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمْ اٰمِنُوا كَمَٓا اٰمَنَ النَّاسُ قَالُٓوا اَنُؤْمِنُ كَمَٓا اٰمَنَ السُّفَهَٓاءُۜ اَلَٓا اِنَّهُمْ هُمُ السُّفَهَٓاءُ وَلٰكِنْ لَا يَعْلَمُونَ13
और जब उनसे कहा जाता है, "ईमान लाओ जैसे लोग ईमान लाए हैं", कहते हैं, "क्या हम ईमान लाए जैसे कम समझ लोग ईमान लाए हैं?" जान लो, वही कम समझ हैं परन्तु जानते नहीं
وَاِذَا لَقُوا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا قَالُٓوا اٰمَنَّاۚ وَاِذَا خَلَوْا اِلٰى شَيَاط۪ينِهِمْۙ قَالُٓوا اِنَّا مَعَكُمْۙ اِنَّمَا نَحْنُ مُسْتَهْزِؤُ۫نَ14
और जब ईमान लानेवालों से मिलते हैं तो कहते, "हम भी ईमान लाए हैं," और जब एकान्त में अपने शैतानों के पास पहुँचते हैं, तो कहते हैं, "हम तो तुम्हारे साथ हैं और यह तो हम केवल परिहास कर रहे हैं।"
اَللّٰهُ يَسْتَهْزِئُ بِهِمْ وَيَمُدُّهُمْ ف۪ي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ15
अल्लाह उनके साथ परिहास कर रहा है और उन्हें उनकी सरकशी में ढील दिए जाता है, वे भटकते फिर रहे हैं
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ اشْتَرَوُا الضَّلَالَةَ بِالْهُدٰىۖ فَمَا رَبِحَتْ تِجَارَتُهُمْ وَمَا كَانُوا مُهْتَد۪ينَ16
यही वे लोग हैं, जिन्होंने मार्गदर्शन के बदले में गुमराही मोल ली, किन्तु उनके इस व्यापार में न कोई लाभ पहुँचाया, और न ही वे सीधा मार्ग पा सके
مَثَلُهُمْ كَمَثَلِ الَّذِي اسْتَوْقَدَ نَارًاۚ فَلَمَّٓا اَضَٓاءَتْ مَا حَوْلَهُ ذَهَبَ اللّٰهُ بِنُورِهِمْ وَتَرَكَهُمْ ف۪ي ظُلُمَاتٍ لَا يُبْصِرُونَ17
उनकी मिसाल ऐसी हैं जैसे किसी व्यक्ति ने आग जलाई, फिर जब उसने उसके वातावरण को प्रकाशित कर दिया, तो अल्लाह ने उसका प्रकाश ही छीन लिया और उन्हें अँधेरों में छोड़ दिया जिससे उन्हें कुछ सुझाई नहीं दे रहा हैं
صُمٌّ بُكْمٌ عُمْيٌ فَهُمْ لَا يَرْجِعُونَۙ18
वे बहरे हैं, गूँगें हैं, अन्धे हैं, अब वे लौटने के नहीं
اَوْ كَصَيِّبٍ مِنَ السَّمَٓاءِ ف۪يهِ ظُلُمَاتٌ وَرَعْدٌ وَبَرْقٌۚ يَجْعَلُونَ اَصَابِعَهُمْ ف۪ٓي اٰذَانِهِمْ مِنَ الصَّوَاعِقِ حَذَرَ الْمَوْتِۜ وَاللّٰهُ مُح۪يطٌ بِالْكَافِر۪ينَ19
या (उनकी मिसाल ऐसी है) जैसे आकाश से वर्षा हो रही हो जिसके साथ अँधेरे हों और गरज और चमक भी हो, वे बिजली की कड़क के कारण मृत्यु के भय से अपने कानों में उँगलियाँ दे ले रहे हों - और अल्लाह ने तो इनकार करनेवालों को घेर रखा हैं
يَكَادُ الْبَرْقُ يَخْطَفُ اَبْصَارَهُمْۜ كُلَّمَٓا اَضَٓاءَ لَهُمْ مَشَوْا ف۪يهِۙ وَاِذَٓا اَظْلَمَ عَلَيْهِمْ قَامُواۜ وَلَوْ شَٓاءَ اللّٰهُ لَذَهَبَ بِسَمْعِهِمْ وَاَبْصَارِهِمْۜ اِنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ۟20
मानो शीघ्र ही बिजली उनकी आँखों की रौशनी उचक लेने को है; जब भी उनपर चमकती हो, वे चल पड़ते हो और जब उनपर अँधेरा छा जाता हैं तो खड़े हो जाते हो; अगर अल्लाह चाहता तो उनकी सुनने और देखने की शक्ति बिलकुल ही छीन लेता। निस्सन्देह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اعْبُدُوا رَبَّكُمُ الَّذ۪ي خَلَقَكُمْ وَالَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَۙ21
ऐ लोगो! बन्दगी करो अपने रब की जिसने तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच सको;
اَلَّذ۪ي جَعَلَ لَكُمُ الْاَرْضَ فِرَاشًا وَالسَّمَٓاءَ بِنَٓاءًۖ وَاَنْزَلَ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً فَاَخْرَجَ بِه۪ مِنَ الثَّمَرَاتِ رِزْقًا لَكُمْۚ فَلَا تَجْعَلُوا لِلّٰهِ اَنْدَادًا وَاَنْتُمْ تَعْلَمُونَ22
वही है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को फर्श और आकाश को छत बनाया, और आकाश से पानी उतारा, फिर उसके द्वारा हर प्रकार की पैदावार की और फल तुम्हारी रोजी के लिए पैदा किए, अतः जब तुम जानते हो तो अल्लाह के समकक्ष न ठहराओ
وَاِنْ كُنْتُمْ ف۪ي رَيْبٍ مِمَّا نَزَّلْنَا عَلٰى عَبْدِنَا فَاْتُوا بِسُورَةٍ مِنْ مِثْلِه۪ۖ وَادْعُوا شُهَدَٓاءَكُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ23
और अगर उसके विषय में जो हमने अपने बन्दे पर उतारा हैं, तुम किसी सन्देह में न हो तो उस जैसी कोई सूरा ले आओ और अल्लाह से हटकर अपने सहायकों को बुला लो जिनके आ मौजूद होने पर तुम्हें विश्वास हैं, यदि तुम सच्चे हो
فَاِنْ لَمْ تَفْعَلُوا وَلَنْ تَفْعَلُوا فَاتَّقُوا النَّارَ الَّت۪ي وَقُودُهَا النَّاسُ وَالْحِجَارَةُۚ اُعِدَّتْ لِلْكَافِر۪ينَ24
फिर अगर तुम ऐसा न कर सको और तुम कदापि नहीं कर सकते, तो डरो उस आग से जिसका ईधन इनसान और पत्थर हैं, जो इनकार करनेवालों के लिए तैयार की गई है
وَبَشِّرِ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ اَنَّ لَهُمْ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُۜ كُلَّمَا رُزِقُوا مِنْهَا مِنْ ثَمَرَةٍ رِزْقًاۙ قَالُوا هٰذَا الَّذ۪ي رُزِقْنَا مِنْ قَبْلُ وَاُتُوا بِه۪ مُتَشَابِهًاۜ وَلَهُمْ ف۪يهَٓا اَزْوَاجٌ مُطَهَّرَةٌ وَهُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ25
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें शुभ सूचना दे दो कि उनके लिए ऐसे बाग़ है जिनके नीचे नहरें बह रहीं होगी; जब भी उनमें से कोई फल उन्हें रोजी के रूप में मिलेगा, तो कहेंगे, "यह तो वही हैं जो पहले हमें मिला था," और उन्हें मिलता-जुलता ही (फल) मिलेगा; उनके लिए वहाँ पाक-साफ़ पत्नि याँ होगी, और वे वहाँ सदैव रहेंगे
اِنَّ اللّٰهَ لَا يَسْتَحْي۪ٓ اَنْ يَضْرِبَ مَثَلًا مَا بَعُوضَةً فَمَا فَوْقَهَاۜ فَاَمَّا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا فَيَعْلَمُونَ اَنَّهُ الْحَقُّ مِنْ رَبِّهِمْۚ وَاَمَّا الَّذ۪ينَ كَفَرُوا فَيَقُولُونَ مَاذَٓا اَرَادَ اللّٰهُ بِهٰذَا مَثَلًاۢ يُضِلُّ بِه۪ كَث۪يرًا وَيَهْد۪ي بِه۪ كَث۪يرًاۜ وَمَا يُضِلُّ بِه۪ٓ اِلَّا الْفَاسِق۪ينَۙ26
निस्संदेह अल्लाह नहीं शरमाता कि वह कोई मिसाल पेश करे चाहे वह हो मच्छर की, बल्कि उससे भी बढ़कर किसी तुच्छ चीज़ की। फिर जो ईमान लाए है वे तो जानते है कि वह उनके रब की ओर से सत्य हैं; रहे इनकार करनेवाले तो वे कहते है, "इस मिसाल से अल्लाह का अभिप्राय क्या है?" इससे वह बहुतों को भटकने देता है और बहुतों को सीधा मार्ग दिखा देता है, मगर इससे वह केवल अवज्ञाकारियों ही को भटकने देता है
اَلَّذ۪ينَ يَنْقُضُونَ عَهْدَ اللّٰهِ مِنْ بَعْدِ م۪يثَاقِه۪ۖ وَيَقْطَعُونَ مَٓا اَمَرَ اللّٰهُ بِه۪ٓ اَنْ يُوصَلَ وَيُفْسِدُونَ فِي الْاَرْضِۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ27
जो अल्लाह की प्रतिज्ञा को उसे सुदृढ़ करने के पश्चात भंग कर देते हैं और जिसे अल्लाह ने जोड़ने का आदेश दिया है उसे काट डालते हैं, और ज़मीन में बिगाड़ पैदा करते हैं, वही हैं जो घाटे में हैं
كَيْفَ تَكْفُرُونَ بِاللّٰهِ وَكُنْتُمْ اَمْوَاتًا فَاَحْيَاكُمْۚ ثُمَّ يُم۪يتُكُمْ ثُمَّ يُحْي۪يكُمْ ثُمَّ اِلَيْهِ تُرْجَعُونَ28
तुम अल्लाह के साथ अविश्वास की नीति कैसे अपनाते हो, जबकि तुम निर्जीव थे तो उसने तुम्हें जीवित किया, फिर वही तुम्हें मौत देता हैं, फिर वही तुम्हें जीवित करेगा, फिर उसी की ओर तुम्हें लौटना हैं?
هُوَ الَّذ۪ي خَلَقَ لَكُمْ مَا فِي الْاَرْضِ جَم۪يعًا ثُمَّ اسْتَوٰٓى اِلَى السَّمَٓاءِ فَسَوّٰيهُنَّ سَبْعَ سَمٰوَاتٍۜ وَهُوَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ۟29
वही तो है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन की सारी चीज़े पैदा की, फिर आकाश की ओर रुख़ किया और ठीक तौर पर सात आकाश बनाए और वह हर चीज़ को जानता है
وَاِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلٰٓئِكَةِ اِنّ۪ي جَاعِلٌ فِي الْاَرْضِ خَل۪يفَةًۜ قَالُٓوا اَتَجْعَلُ ف۪يهَا مَنْ يُفْسِدُ ف۪يهَا وَيَسْفِكُ الدِّمَٓاءَۚ وَنَحْنُ نُسَبِّحُ بِحَمْدِكَ وَنُقَدِّسُ لَكَۜ قَالَ اِنّ۪ٓي اَعْلَمُ مَا لَا تَعْلَمُونَ30
और याद करो जब तुम्हारे रब ने फरिश्तों से कहा कि "मैं धरती में (मनुष्य को) खलीफ़ा (सत्ताधारी) बनानेवाला हूँ।" उन्होंने कहा, "क्या उसमें उसको रखेगा, जो उसमें बिगाड़ पैदा करे और रक्तपात करे और हम तेरा गुणगान करते और तुझे पवित्र कहते हैं?" उसने कहा, "मैं जानता हूँ जो तुम नहीं जानते।"
وَعَلَّمَ اٰدَمَ الْاَسْمَٓاءَ كُلَّهَا ثُمَّ عَرَضَهُمْ عَلَى الْمَلٰٓئِكَةِ فَقَالَ اَنْبِؤُ۫ن۪ي بِاَسْمَٓاءِ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ31
उसने (अल्लाह ने) आदम को सारे नाम सिखाए, फिर उन्हें फ़रिश्तों के सामने पेश किया और कहा, "अगर तुम सच्चे हो तो मुझे इनके नाम बताओ।"
قَالُوا سُبْحَانَكَ لَا عِلْمَ لَنَٓا اِلَّا مَا عَلَّمْتَنَاۜ اِنَّكَ اَنْتَ الْعَل۪يمُ الْحَك۪يمُ32
वे बोले, "पाक और महिमावान है तू! तूने जो कुछ हमें बताया उसके सिवा हमें कोई ज्ञान नहीं। निस्संदेह तू सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है।"
قَالَ يَٓا اٰدَمُ اَنْبِئْهُمْ بِاَسْمَٓائِهِمْۚ فَلَمَّٓا اَنْبَاَهُمْ بِاَسْمَٓائِهِمْۙ قَالَ اَلَمْ اَقُلْ لَكُمْ اِنّ۪ٓي اَعْلَمُ غَيْبَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَاَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا كُنْتُمْ تَكْتُمُونَ33
उसने कहा, "ऐ आदम! उन्हें उन लोगों के नाम बताओ।" फिर जब उसने उन्हें उनके नाम बता दिए तो (अल्लाह ने) कहा, "क्या मैंने तुमसे कहा न था कि मैं आकाशों और धरती की छिपी बातों को जानता हूँ और मैं जानता हूँ जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ छिपाते हो।"
وَاِذْ قُلْنَا لِلْمَلٰٓئِكَةِ اسْجُدُوا لِاٰدَمَ فَسَجَدُٓوا اِلَّٓا اِبْل۪يسَۜ اَبٰى وَاسْتَكْبَرَ وَكَانَ مِنَ الْكَافِر۪ينَ34
और याद करो जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि "आदम को सजदा करो" तो, उन्होंने सजदा किया सिवाय इबलील के; उसने इनकार कर दिया और लगा बड़ा बनने और काफ़िर हो रहा
وَقُلْنَا يَٓا اٰدَمُ اسْكُنْ اَنْتَ وَزَوْجُكَ الْجَنَّةَ وَكُلَا مِنْهَا رَغَدًا حَيْثُ شِئْتُمَاۖ وَلَا تَقْرَبَا هٰذِهِ الشَّجَرَةَ فَتَكُونَا مِنَ الظَّالِم۪ينَ35
और हमने कहा, "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी जन्नत में रहो और वहाँ जी भर बेरोक-टोक जहाँ से तुम दोनों का जी चाहे खाओ, लेकिन इस वृक्ष के पास न जाना, अन्यथा तुम ज़ालिम ठहरोगे।"
فَاَزَلَّهُمَا الشَّيْطَانُ عَنْهَا فَاَخْرَجَهُمَا مِمَّا كَانَا ف۪يهِۖ وَقُلْنَا اهْبِطُوا بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّۚ وَلَكُمْ فِي الْاَرْضِ مُسْتَقَرٌّ وَمَتَاعٌ اِلٰى ح۪ينٍ36
अन्ततः शैतान ने उन्हें वहाँ से फिसला दिया, फिर उन दोनों को वहाँ से निकलवाकर छोड़ा, जहाँ वे थे। हमने कहा कि "उतरो, तुम एक-दूसरे के शत्रु होगे और तुम्हें एक समय तक धरती में ठहरना और बिसलना है।"
فَتَلَقّٰٓى اٰدَمُ مِنْ رَبِّه۪ كَلِمَاتٍ فَتَابَ عَلَيْهِۜ اِنَّهُ هُوَ التَّوَّابُ الرَّح۪يمُ37
फिर आदम ने अपने रब से कुछ शब्द पा लिए, तो अल्लाह ने उसकी तौबा क़बूल कर ली; निस्संदेह वही तौबा क़बूल करने वाला, अत्यन्त दयावान है
قُلْنَا اهْبِطُوا مِنْهَا جَم۪يعًاۚ فَاِمَّا يَاْتِيَنَّكُمْ مِنّ۪ي هُدًى فَمَنْ تَبِعَ هُدَايَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ38
हमने कहा, "तुम सब यहाँ से उतरो, फिर यदि तुम्हारे पास मेरी ओर से कोई मार्गदर्शन पहुँचे तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण किया, तो ऐसे लोगों को न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे।"
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَٓا اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ النَّارِۚ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ۟39
और जिन लोगों ने इनकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वहीं आग में पड़नेवाले हैं, वे उसमें सदैव रहेंगे
يَا بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ اذْكُرُوا نِعْمَتِيَ الَّت۪ٓي اَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَاَوْفُوا بِعَهْد۪ٓي اُو۫فِ بِعَهْدِكُمْ وَاِيَّايَ فَارْهَبُونِ40
ऐ इसराईल का सन्तान! याद करो मेरे उस अनुग्रह को जो मैंने तुमपर किया था। और मेरी प्रतिज्ञा को पूरा करो, मैं तुमसे की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करूँगा और हाँ मुझी से डरो
وَاٰمِنُوا بِمَٓا اَنْزَلْتُ مُصَدِّقًا لِمَا مَعَكُمْ وَلَا تَكُونُٓوا اَوَّلَ كَافِرٍ بِه۪ۖ وَلَا تَشْتَرُوا بِاٰيَات۪ي ثَمَنًا قَل۪يلًاۘ وَاِيَّايَ فَاتَّقُونِ41
और ईमान लाओ उस चीज़ पर जो मैंने उतारी है, जो उसकी पुष्टि में है, जो तुम्हारे पास है, और सबसे पहले तुम ही उसके इनकार करनेवाले न बनो। और मेरी आयतों को थोड़ा मूल्य प्राप्त करने का साधन न बनाओ, मुझसे ही तुम डरो
وَلَا تَلْبِسُوا الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُوا الْحَقَّ وَاَنْتُمْ تَعْلَمُونَ42
और सत्य में असत्य का घाल-मेल न करो और जानते-बुझते सत्य को छिपाओ मत
وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَ وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِع۪ينَ43
और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो और (मेरे समक्ष) झुकनेवालों के साथ झुको
اَتَاْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبِرِّ وَتَنْسَوْنَ اَنْفُسَكُمْ وَاَنْتُمْ تَتْلُونَ الْكِتَابَۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ44
क्या तुम लोगों को तो नेकी और एहसान का उपदेश देते हो और अपने आपको भूल जाते हो, हालाँकि तुम किताब भी पढ़ते हो? फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
وَاسْتَع۪ينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلٰوةِۜ وَاِنَّهَا لَكَب۪يرَةٌ اِلَّا عَلَى الْخَاشِع۪ينَۙ45
धैर्य और नमाज़ से मदद लो, और निस्संदेह यह (नमाज) बहुत कठिन है, किन्तु उन लोगों के लिए नहीं जिनके दिल पिघले हुए हो;
اَلَّذ۪ينَ يَظُنُّونَ اَنَّهُمْ مُلَاقُوا رَبِّهِمْ وَاَنَّهُمْ اِلَيْهِ رَاجِعُونَ۟46
जो समझते है कि उन्हें अपने रब से मिलना हैं और उसी की ओर उन्हें पलटकर जाना है
يَا بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ اذْكُرُوا نِعْمَتِيَ الَّت۪ٓي اَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَاَنّ۪ي فَضَّلْتُكُمْ عَلَى الْعَالَم۪ينَ47
ऐ इसराईल की सन्तान! याद करो मेरे उस अनुग्रह को जो मैंने तुमपर किया और इसे भी कि मैंने तुम्हें सारे संसार पर श्रेष्ठता प्रदान की थी;
وَاتَّقُوا يَوْمًا لَا تَجْز۪ي نَفْسٌ عَنْ نَفْسٍ شَيْـًٔا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا شَفَاعَةٌ وَلَا يُؤْخَذُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ48
और डरो उस दिन से जब न कोई किसी भी ओर से कुछ तावान भरेगा और न किसी की ओर से कोई सिफ़ारिश ही क़बूल की जाएगी और न किसी की ओर से कोई फ़िद्या (अर्थदंड) लिया जाएगा और न वे सहायता ही पा सकेंगे।
وَاِذْ نَجَّيْنَاكُمْ مِنْ اٰلِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُٓوءَ الْعَذَابِ يُذَبِّحُونَ اَبْنَٓاءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَٓاءَكُمْۜ وَف۪ي ذٰلِكُمْ بَلَٓاءٌ مِنْ رَبِّكُمْ عَظ۪يمٌ49
और याद करो जब हमने तुम्हें फ़िरऔनियों से छुटकारा दिलाया जो तुम्हें अत्यन्त बुरी यातना देते थे, तुम्हारे बेटों को मार डालते थे और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित रहने देते थे; और इसमं तुम्हारे रब की ओर से बड़ी परीक्षा थी
وَاِذْ فَرَقْنَا بِكُمُ الْبَحْرَ فَاَنْجَيْنَاكُمْ وَاَغْرَقْنَٓا اٰلَ فِرْعَوْنَ وَاَنْتُمْ تَنْظُرُونَ50
याद करो जब हमने तुम्हें सागर में अलग-अलग चौड़े रास्ते से ले जाकर छुटकारा दिया और फ़िरऔनियों को तुम्हारी आँखों के सामने डूबो दिया
وَاِذْ وٰعَدْنَا مُوسٰٓى اَرْبَع۪ينَ لَيْلَةً ثُمَّ اتَّخَذْتُمُ الْعِجْلَ مِنْ بَعْدِه۪ وَاَنْتُمْ ظَالِمُونَ51
और याद करो जब हमने मूसा से चालीस रातों का वादा ठहराया तो उसके पीछे तुम बछड़े को अपना देवता बना बैठे, तुम अत्याचारी थे
ثُمَّ عَفَوْنَا عَنْكُمْ مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ52
फिर इसके पश्चात भी हमने तुम्हें क्षमा किया, ताकि तुम कृतज्ञता दिखालाओ
وَاِذْ اٰتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ وَالْفُرْقَانَ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ53
और याद करो जब मूसा को हमने किताब और कसौटी प्रदान की, ताकि तुम मार्ग पा सको
وَاِذْ قَالَ مُوسٰى لِقَوْمِه۪ يَا قَوْمِ اِنَّكُمْ ظَلَمْتُمْ اَنْفُسَكُمْ بِاتِّخَاذِكُمُ الْعِجْلَ فَتُوبُٓوا اِلٰى بَارِئِكُمْ فَاقْتُلُٓوا اَنْفُسَكُمْۜ ذٰلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ عِنْدَ بَارِئِكُمْۜ فَتَابَ عَلَيْكُمْۜ اِنَّهُ هُوَ التَّوَّابُ الرَّح۪يمُ54
और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "ऐ मेरी कौम के लोगो! बछड़े को देवता बनाकर तुमने अपने ऊपर ज़ुल्म किया है, तो तुम अपने पैदा करनेवाले की ओर पलटो, अतः अपने लोगों को स्वयं क़त्ल करो। यही तुम्हारे पैदा करनेवाले की स्पष्ट में तुम्हारे लिए अच्छा है, फिर उसने तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली। निस्संदेह वह बड़ी तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।"
وَاِذْ قُلْتُمْ يَا مُوسٰى لَنْ نُؤْمِنَ لَكَ حَتّٰى نَرَى اللّٰهَ جَهْرَةً فَاَخَذَتْكُمُ الصَّاعِقَةُ وَاَنْتُمْ تَنْظُرُونَ55
और याद करो जब तुमने कहा था, "ऐ मूसा, हम तुमपर ईमान नहीं लाएँगे जब तक अल्लाह को खुल्लम-खुल्ला न देख लें।" फिर एक कड़क ने तुम्हें आ दबोचा, तुम देखते रहे
ثُمَّ بَعَثْنَاكُمْ مِنْ بَعْدِ مَوْتِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ56
फिर तुम्हारे निर्जीव हो जाने के पश्चात हमने तुम्हें जिला उठाया, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ
وَظَلَّلْنَا عَلَيْكُمُ الْغَمَامَ وَاَنْزَلْنَا عَلَيْكُمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوٰىۜ كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْۜ وَمَا ظَلَمُونَا وَلٰكِنْ كَانُٓوا اَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ57
और हमने तुमपर बादलों की छाया की और तुमपर 'मन्न' और 'सलबा' उतारा - "खाओ, जो अच्छी पाक चीजें हमने तुम्हें प्रदान की है।" उन्होंने हमारा तो कुछ भी नहीं बिगाड़ा, बल्कि वे अपने ही ऊपर अत्याचार करते रहे
وَاِذْ قُلْنَا ادْخُلُوا هٰذِهِ الْقَرْيَةَ فَكُلُوا مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ رَغَدًا وَادْخُلُوا الْبَابَ سُجَّدًا وَقُولُوا حِطَّةٌ نَغْفِرْ لَكُمْ خَطَايَاكُمْۜ وَسَنَز۪يدُ الْمُحْسِن۪ينَ58
और जब हमने कहा था, "इस बस्ती में प्रवेश करो फिर उसमें से जहाँ से चाहो जी भर खाओ, और बस्ती के द्वार में सजदागुज़ार बनकर प्रवेश करो और कहो, "छूट हैं।" हम तुम्हारी खताओं को क्षमा कर देंगे और अच्छे से अच्छा काम करनेवालों पर हम और अधिक अनुग्रह करेंगे।"
فَبَدَّلَ الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا قَوْلًا غَيْرَ الَّذ۪ي ق۪يلَ لَهُمْ فَاَنْزَلْنَا عَلَى الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا رِجْزًا مِنَ السَّمَٓاءِ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ۟59
फिर जो बात उनसे कहीं गई थी ज़ालिमों ने उसे दूसरी बात से बदल दिया। अन्ततः ज़ालिमों पर हमने, जो अवज्ञा वे कर रहे थे उसके कारण, आकाश से यातना उतारी
وَاِذِ اسْتَسْقٰى مُوسٰى لِقَوْمِه۪ فَقُلْنَا اضْرِبْ بِعَصَاكَ الْحَجَرَۜ فَانْفَجَرَتْ مِنْهُ اثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًاۜ قَدْ عَلِمَ كُلُّ اُنَاسٍ مَشْرَبَهُمْۜ كُلُوا وَاشْرَبُوا مِنْ رِزْقِ اللّٰهِ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْاَرْضِ مُفْسِد۪ينَ60
और याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी की प्रार्थना को तो हमने कहा, "चट्टान पर अपनी लाठी मारो," तो उससे बारह स्रोत फूट निकले और हर गिरोह ने अपना-अपना घाट जान लिया - "खाओ और पियो अल्लाह का दिया और धरती में बिगाड़ फैलाते न फिरो।"
وَاِذْ قُلْتُمْ يَا مُوسٰى لَنْ نَصْبِرَ عَلٰى طَعَامٍ وَاحِدٍ فَادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُخْرِجْ لَنَا مِمَّا تُنْبِتُ الْاَرْضُ مِنْ بَقْلِهَا وَقِثَّٓائِهَا وَفُومِهَا وَعَدَسِهَا وَبَصَلِهَاۜ قَالَ اَتَسْتَبْدِلُونَ الَّذ۪ي هُوَ اَدْنٰى بِالَّذ۪ي هُوَ خَيْرٌۜ اِهْبِطُوا مِصْرًا فَاِنَّ لَكُمْ مَا سَاَلْتُمْۜ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الذِّلَّةُ وَالْمَسْكَنَةُ وَبَٓاؤُ۫ بِغَضَبٍ مِنَ اللّٰهِۜ ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ كَانُوا يَكْفُرُونَ بِاٰيَاتِ اللّٰهِ وَيَقْتُلُونَ النَّبِيّ۪نَ بِغَيْرِ الْحَقِّۜ ذٰلِكَ بِمَا عَصَوْا وَكَانُوا يَعْتَدُونَ۟61
और याद करो जब तुमने कहा था, "ऐ मूसा, हम एक ही प्रकार के खाने पर कदापि संतोष नहीं कर सकते, अतः हमारे लिए अपने रब से प्रार्थना करो कि हमारे वास्ते धरती की उपज से साग-पात और ककड़ियाँ और लहसुन और मसूर और प्याज़ निकाले।" और मूसा ने कहा, "क्या तुम जो घटिया चीज़ है उसको उससे बदलकर लेना चाहते हो जो उत्तम है? किसी नगर में उतरो, फिर जो कुछ तुमने माँगा हैं, तुम्हें मिल जाएगा" - और उनपर अपमान और हीन दशा थोप दी गई, और अल्लाह के प्रकोप के भागी हुए। यह इसलिए कि वे अल्लाह की आयतों का इनकार करते रहे और नबियों की अकारण हत्या करते थे। यह इसलिए कि उन्होंने अवज्ञा की और वे सीमा का उल्लंघन करते रहे
اِنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَالَّذ۪ينَ هَادُوا وَالنَّصَارٰى وَالصَّابِـ۪ٔينَ مَنْ اٰمَنَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِ وَعَمِلَ صَالِحًا فَلَهُمْ اَجْرُهُمْ عِنْدَ رَبِّهِمْۖ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ62
निस्संदेह, ईमानवाले और जो यहूदी हुए और ईसाई और साबिई, जो भी अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाया और अच्छा कर्म किया तो ऐसे लोगों का उनके अपने रब के पास (अच्छा) बदला है, उनको न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे -
وَاِذْ اَخَذْنَا م۪يثَاقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ الطُّورَۜ خُذُوا مَٓا اٰتَيْنَاكُمْ بِقُوَّةٍ وَاذْكُرُوا مَا ف۪يهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ63
और याद करो जब हमने इस हाल में कि तूर पर्वत को तुम्हारे ऊपर ऊँचा कर रखा था, तुमसे दृढ़ वचन लिया था, "जो चीज़ हमने तुम्हें दी हैं उसे मजबूती के साथ पकड़ो और जो कुछ उसमें हैं उसे याद रखो ताकि तुम बच सको।"
ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَۚ فَلَوْلَا فَضْلُ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ لَكُنْتُمْ مِنَ الْخَاسِر۪ينَ64
फिर इसके पश्चात भी तुम फिर गए, तो यदि अल्लाह की कृपा और उसकी दयालुता तुम पर न होती, तो तुम घाटे में पड़ गए होते
وَلَقَدْ عَلِمْتُمُ الَّذ۪ينَ اعْتَدَوْا مِنْكُمْ فِي السَّبْتِ فَقُلْنَا لَهُمْ كُونُوا قِرَدَةً خَاسِـ۪ٔينَۚ65
और तुम उन लोगों के विषय में तो जानते ही हो जिन्होंने तुममें से 'सब्त' के दिन के मामले में मर्यादा का उल्लंघन किया था, तो हमने उनसे कह दिया, "बन्दर हो जाओ, धिक्कारे और फिटकारे हुए!"
فَجَعَلْنَاهَا نَكَالًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهَا وَمَا خَلْفَهَا وَمَوْعِظَةً لِلْمُتَّق۪ينَ66
फिर हमने इसे सामनेवालों और बाद के लोगों के लिए शिक्षा-सामग्री और डर रखनेवालों के लिए नसीहत बनाकर छोड़ा
وَاِذْ قَالَ مُوسٰى لِقَوْمِه۪ٓ اِنَّ اللّٰهَ يَاْمُرُكُمْ اَنْ تَذْبَحُوا بَقَرَةًۜ قَالُٓوا اَتَتَّخِذُنَا هُزُوًاۜ قَالَ اَعُوذُ بِاللّٰهِ اَنْ اَكُونَ مِنَ الْجَاهِل۪ينَ67
और याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "निश्चय ही अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि एक गाय जब्ह करो।" कहने लगे, "क्या तुम हमसे परिहास करते हो?" उसने कहा, "मैं इससे अल्लाह की पनाह माँगता हूँ कि जाहिल बनूँ।"
قَالُوا ادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّنْ لَنَا مَا هِيَۜ قَالَ اِنَّهُ يَقُولُ اِنَّهَا بَقَرَةٌ لَا فَارِضٌ وَلَا بِكْرٌۜ عَوَانٌ بَيْنَ ذٰلِكَۜ فَافْعَلُوا مَا تُؤْمَرُونَ68
बोले, "हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हम पर स्पष्टा कर दे कि वह गाय कौन-सी है?" उसने कहा, "वह कहता है कि वह ऐसी गाय है जो न बूढ़ी है, न बछिया, इनके बीच की रास है; तो जो तुम्हें हुक्म दिया जा रहा है, करो।"
قَالُوا ادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّنْ لَنَا مَا لَوْنُهَاۜ قَالَ اِنَّهُ يَقُولُ اِنَّهَا بَقَرَةٌ صَفْرَٓاءُۙ فَاقِعٌ لَوْنُهَا تَسُرُّ النَّاظِر۪ينَ69
कहने लगे, "हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि उसका रंग कैसा है?" कहा, "वह कहता है कि वह गाय सुनहरी है, गहरे चटकीले रंग की कि देखनेवालों को प्रसन्न कर देती है।"
قَالُوا ادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّنْ لَنَا مَا هِيَۙ اِنَّ الْبَقَرَ تَشَابَهَ عَلَيْنَاۜ وَاِنَّٓا اِنْ شَٓاءَ اللّٰهُ لَمُهْتَدُونَ70
बोले, "हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि वह कौन-सी है, गायों का निर्धारण हमारे लिए संदिग्ध हो रहा है। यदि अल्लाह ने चाहा तो हम अवश्य। पता लगा लेंगे।"
قَالَ اِنَّهُ يَقُولُ اِنَّهَا بَقَرَةٌ لَا ذَلُولٌ تُث۪يرُ الْاَرْضَ وَلَا تَسْقِي الْحَرْثَۚ مُسَلَّمَةٌ لَا شِيَةَ ف۪يهَاۜ قَالُوا الْـٰٔنَ جِئْتَ بِالْحَقِّۜ فَذَبَحُوهَا وَمَا كَادُوا يَفْعَلُونَ۟71
उसने कहा, " वह कहता हैं कि वह ऐसा गाय है जो सधाई हुई नहीं है कि भूमि जोतती हो, और न वह खेत को पानी देती है, ठीक-ठाक है, उसमें किसी दूसरे रंग की मिलावट नहीं है।" बोले, "अब तुमने ठीक बात बताई है।" फिर उन्होंने उसे ज़ब्ह किया, जबकि वे करना नहीं चाहते थे
وَاِذْ قَتَلْتُمْ نَفْسًا فَادّٰرَءْتُمْ ف۪يهَاۜ وَاللّٰهُ مُخْرِجٌ مَا كُنْتُمْ تَكْتُمُونَۚ72
और याद करो जब तुमने एक व्यक्ति की हत्या कर दी, फिर उस सिलसिले में तुमने टाल-मटोल से काम लिया - जबकि जिसको तुम छिपा रहे थे, अल्लाह उसे खोल देनेवाला था
فَقُلْنَا اضْرِبُوهُ بِبَعْضِهَاۜ كَذٰلِكَ يُحْيِ اللّٰهُ الْمَوْتٰى وَيُر۪يكُمْ اٰيَاتِه۪ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ73
तो हमने कहा, "उसे उसके एक हिस्से से मारो।" इस प्रकार अल्लाह मुर्दों को जीवित करता है और तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है, ताकि तुम समझो
ثُمَّ قَسَتْ قُلُوبُكُمْ مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ فَهِيَ كَالْحِجَارَةِ اَوْ اَشَدُّ قَسْوَةًۜ وَاِنَّ مِنَ الْحِجَارَةِ لَمَا يَتَفَجَّرُ مِنْهُ الْاَنْهَارُۜ وَاِنَّ مِنْهَا لَمَا يَشَّقَّقُ فَيَخْرُجُ مِنْهُ الْمَٓاءُۜ وَاِنَّ مِنْهَا لَمَا يَهْبِطُ مِنْ خَشْيَةِ اللّٰهِۜ وَمَا اللّٰهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ74
फिर इसके पश्चात भी तुम्हारे दिल कठोर हो गए, तो वे पत्थरों की तरह हो गए बल्कि उनसे भी अधिक कठोर; क्योंकि कुछ पत्थर ऐसे भी होते है जिनसे नहरें फूट निकलती है, और कुछ ऐसे भी होते है कि फट जाते है तो उनमें से पानी निकलने लगता है, और उनमें से कुछ ऐसे भी होते है जो अल्लाह के भय से गिर जाते है। और अल्लाह, जो कुछ तुम कर रहे हो, उससे बेखबर नहीं है
اَفَتَطْمَعُونَ اَنْ يُؤْمِنُوا لَكُمْ وَقَدْ كَانَ فَر۪يقٌ مِنْهُمْ يَسْمَعُونَ كَلَامَ اللّٰهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُ مِنْ بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمْ يَعْلَمُونَ75
तो क्या तुम इस लालच में हो कि वे तुम्हारी बात मान लेंगे, जबकि उनमें से कुछ लोग अल्लाह का कलाम सुनते रहे हैं, फिर उसे भली-भाँति समझ लेने के पश्चात जान-बूझकर उसमें परिवर्तन करते रहे?
وَاِذَا لَقُوا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا قَالُٓوا اٰمَنَّاۚ وَاِذَا خَلَا بَعْضُهُمْ اِلٰى بَعْضٍ قَالُٓوا اَتُحَدِّثُونَهُمْ بِمَا فَتَحَ اللّٰهُ عَلَيْكُمْ لِيُحَٓاجُّوكُمْ بِه۪ عِنْدَ رَبِّكُمْۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ76
और जब वे ईमान लानेवाले से मिलते है तो कहते हैं, "हम भी ईमान रखते हैं", और जब आपस में एक-दूसरे से एकान्त में मिलते है तो कहते है, "क्या तुम उन्हें वे बातें, जो अल्लाह ने तुम पर खोली, बता देते हो कि वे उनके द्वारा तुम्हारे रब के यहाँ हुज्जत में तुम्हारा मुक़ाबिला करें? तो क्या तुम समझते नहीं!"
اَوَلَا يَعْلَمُونَ اَنَّ اللّٰهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ77
क्या वे जानते नहीं कि अल्लाह वह सब कुछ जानता है, जो कुछ वे छिपाते और जो कुछ ज़ाहिर करते हैं?
وَمِنْهُمْ اُمِّيُّونَ لَا يَعْلَمُونَ الْكِتَابَ اِلَّٓا اَمَانِيَّ وَاِنْ هُمْ اِلَّا يَظُنُّونَ78
और उनमें सामान्य बेपढ़े भी हैं जिन्हें किताब का ज्ञान नहीं है, बस कुछ कामनाओं एवं आशाओं को धर्म जानते हैं, और वे तो बस अटकल से काम लेते हैं
فَوَيْلٌ لِلَّذ۪ينَ يَكْتُبُونَ الْكِتَابَ بِاَيْد۪يهِمْ ثُمَّ يَقُولُونَ هٰذَا مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ لِيَشْتَرُوا بِه۪ ثَمَنًا قَل۪يلًاۜ فَوَيْلٌ لَهُمْ مِمَّا كَتَبَتْ اَيْد۪يهِمْ وَوَيْلٌ لَهُمْ مِمَّا يَكْسِبُونَ79
तो विनाश और तबाही है उन लोगों के लिए जो अपने हाथों से किताब लिखते हैं फिर कहते हैं, "यह अल्लाह की ओर से है", ताकि उसके द्वारा थोड़ा मूल्य प्राप्त कर लें। तो तबाही है उनके हाथों ने लिखा और तबाही है उनके लिए उसके कारण जो वे कमा रहे हैं
وَقَالُوا لَنْ تَمَسَّنَا النَّارُ اِلَّٓا اَيَّامًا مَعْدُودَةًۜ قُلْ اَتَّخَذْتُمْ عِنْدَ اللّٰهِ عَهْدًا فَلَنْ يُخْلِفَ اللّٰهُ عَهْدَهُٓ اَمْ تَقُولُونَ عَلَى اللّٰهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ80
वे कहते है, "जहन्नम की आग हमें नहीं छू सकती, हाँ, कुछ गिने-चुने दिनों की बात और है।" कहो, "क्या तुमने अल्लाह से कोई वचन ले रखा है? फिर तो अल्लाह कदापि अपने वचन के विरुद्ध नहीं जा सकता? या तुम अल्लाह के ज़िम्मे डालकर ऐसी बात कहते हो जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं?
بَلٰى مَنْ كَسَبَ سَيِّئَةً وَاَحَاطَتْ بِه۪ خَط۪ٓيـَٔتُهُ فَاُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ النَّارِۚ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ81
क्यों नहीं; जिसने भी कोई बदी कमाई और उसकी खताकारी ने उसे अपने घरे में ले लिया, तो ऐसे ही लोग आग (जहन्नम) में पड़नेवाले है; वे उसी में सदैव रहेंगे
وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ الْجَنَّةِۚ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ۟82
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, वही जन्नतवाले हैं, वे सदैव उसी में रहेंगे।"
وَاِذْ اَخَذْنَا م۪يثَاقَ بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ لَا تَعْبُدُونَ اِلَّا اللّٰهَ وَبِالْوَالِدَيْنِ اِحْسَانًا وَذِي الْقُرْبٰى وَالْيَتَامٰى وَالْمَسَاك۪ينِ وَقُولُوا لِلنَّاسِ حُسْنًا وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَۜ ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ اِلَّا قَل۪يلًا مِنْكُمْ وَاَنْتُمْ مُعْرِضُونَ83
और याद करो जब इसराईल की सन्तान से हमने वचन लिया, "अल्लाह के अतिरिक्त किसी की बन्दगी न करोगे; और माँ-बाप के साथ और नातेदारों के साथ और अनाथों और मुहताजों के साथ अच्छा व्यवहार करोगे; और यह कि लोगों से भली बात कहो और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो।" तो तुम फिर गए, बस तुममें से बचे थोड़े ही, और तुम उपेक्षा की नीति ही अपनाए रहे
وَاِذْ اَخَذْنَا م۪يثَاقَكُمْ لَا تَسْفِكُونَ دِمَٓاءَكُمْ وَلَا تُخْرِجُونَ اَنْفُسَكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ ثُمَّ اَقْرَرْتُمْ وَاَنْتُمْ تَشْهَدُونَ84
और याद करो जब तुमसे वचन लिया, "अपने ख़ून न बहाओगे और न अपने लोगों को अपनी बस्तियों से निकालोगे।" फिर तुमने इक़रार किया और तुम स्वयं इसके गवाह हो
ثُمَّ اَنْتُمْ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ تَقْتُلُونَ اَنْفُسَكُمْ وَتُخْرِجُونَ فَر۪يقًا مِنْكُمْ مِنْ دِيَارِهِمْۘ تَظَاهَرُونَ عَلَيْهِمْ بِالْاِثْمِ وَالْعُدْوَانِۜ وَاِنْ يَاْتُوكُمْ اُسَارٰى تُفَادُوهُمْ وَهُوَ مُحَرَّمٌ عَلَيْكُمْ اِخْرَاجُهُمْۜ اَفَتُؤْمِنُونَ بِبَعْضِ الْكِتَابِ وَتَكْفُرُونَ بِبَعْضٍۚ فَمَا جَزَٓاءُ مَنْ يَفْعَلُ ذٰلِكَ مِنْكُمْ اِلَّا خِزْيٌ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۚ وَيَوْمَ الْقِيٰمَةِ يُرَدُّونَ اِلٰٓى اَشَدِّ الْعَذَابِۜ وَمَا اللّٰهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ85
फिर तुम वही हो कि अपने लोगों की हत्या करते हो और अपने ही एक गिरोह के लोगों को उनकी बस्तियों से निकालते हो; तुम गुनाह और ज़्यादती के साथ उनके विरुद्ध एक-दूसरे के पृष्ठपोषक बन जाते हो; और यदि वे बन्दी बनकर तुम्हारे पास आते है, तो उनकी रिहाई के लिए फिद्ए (अर्थदंड) का लेन-देन करते हो जबकि उनको उनके घरों से निकालना ही तुम पर हराम था, तो क्या तुम किताब के एक हिस्से को मानते हो और एक को नहीं मानते? फिर तुममें जो ऐसा करें उसका बदला इसके सिवा और क्या हो सकता है कि सांसारिक जीवन में अपमान हो? और क़यामत के दिन ऐसे लोगों को कठोर से कठोर यातना की ओर फेर दिया जाएगा। अल्लाह उससे बेखबर नहीं है जो कुछ तुम कर रहे हो
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ اشْتَرَوُا الْحَيٰوةَ الدُّنْيَا بِالْاٰخِرَةِۘ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ۟86
यही वे लोग है जो आख़िरात के बदले सांसारिक जीवन के ख़रीदार हुए, तो न उनकी यातना हल्की की जाएगी और न उन्हें कोई सहायता पहुँच सकेगी
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ وَقَفَّيْنَا مِنْ بَعْدِه۪ بِالرُّسُلِ وَاٰتَيْنَا ع۪يسَى ابْنَ مَرْيَمَ الْبَيِّنَاتِ وَاَيَّدْنَاهُ بِرُوحِ الْقُدُسِۜ اَفَكُلَّمَا جَٓاءَكُمْ رَسُولٌ بِمَا لَا تَهْوٰٓى اَنْفُسُكُمُ اسْتَكْبَرْتُمْۚ فَفَر۪يقًا كَذَّبْتُمْ وَفَر۪يقًا تَقْتُلُونَ87
और हमने मूसा को किताब दी थी, और उसके पश्चात आगे-पीछे निरन्तर रसूल भेजते रहे; और मरयम के बेटे ईसा को खुली-खुली निशानियाँ प्रदान की और पवित्र-आत्मा के द्वारा उसे शक्ति प्रदान की; तो यही तो हुआ कि जब भी कोई रसूल तुम्हारे पास वह कुछ लेकर आया जो तुम्हारे जी को पसन्द न था, तो तुम अकड़ बैठे, तो एक गिरोह को तो तुमने झुठलाया और एक गिरोह को क़त्ल करते हो?
وَقَالُوا قُلُوبُنَا غُلْفٌۜ بَلْ لَعَنَهُمُ اللّٰهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَل۪يلًا مَا يُؤْمِنُونَ88
वे कहते हैं, "हमारे दिलों पर तो प्राकृतिक आवरण चढ़े है" नहीं, बल्कि उनके इनकार के कारण अल्लाह ने उनपर लानत की है; अतः वे ईमान थोड़े ही लाएँगे
وَلَمَّا جَٓاءَهُمْ كِتَابٌ مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ مُصَدِّقٌ لِمَا مَعَهُمْۙ وَكَانُوا مِنْ قَبْلُ يَسْتَفْتِحُونَ عَلَى الَّذ۪ينَ كَفَرُواۚ فَلَمَّا جَٓاءَهُمْ مَا عَرَفُوا كَفَرُوا بِه۪ۘ فَلَعْنَةُ اللّٰهِ عَلَى الْكَافِر۪ينَ89
और जब उनके पास एक किताब अल्लाह की ओर से आई है जो उसकी पुष्टि करती है जो उनके पास मौजूद है - और इससे पहले तो वे न माननेवाले लोगों पर विजय पाने के इच्छुक रहे है - फिर जब वह चीज़ उनके पास आ गई जिसे वे पहचान भी गए हैं, तो उसका इनकार कर बैठे; तो अल्लाह की फिटकार इनकार करने वालों पर!
بِئْسَمَا اشْتَرَوْا بِه۪ٓ اَنْفُسَهُمْ اَنْ يَكْفُرُوا بِمَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ بَغْيًا اَنْ يُنَزِّلَ اللّٰهُ مِنْ فَضْلِه۪ عَلٰى مَنْ يَشَٓاءُ مِنْ عِبَادِه۪ۚ فَبَٓاؤُ۫ بِغَضَبٍ عَلٰى غَضَبٍۜ وَلِلْكَافِر۪ينَ عَذَابٌ مُه۪ينٌ90
क्या ही बुरी चीज़ है जिसके बदले उन्होंने अपनी जानों का सौदा किया, अर्थात जो कुछ अल्लाह ने उतारा है उसे सरकशी और इस अप्रियता के कारण नहीं मानते कि अल्लाह अपना फ़ज़्ल (कृपा) अपने बन्दों में से जिसपर चाहता है क्यों उतारता है, अतः वे प्रकोप पर प्रकोप के अधिकारी हो गए है। और ऐसे इनकार करनेवालों के लिए अपमानजनक यातना है
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمْ اٰمِنُوا بِمَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ قَالُوا نُؤْمِنُ بِمَٓا اُنْزِلَ عَلَيْنَا وَيَكْفُرُونَ بِمَا وَرَٓاءَهُ وَهُوَ الْحَقُّ مُصَدِّقًا لِمَا مَعَهُمْۜ قُلْ فَلِمَ تَقْتُلُونَ اَنْبِيَٓاءَ اللّٰهِ مِنْ قَبْلُ اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَ91
जब उनसे कहा जाता है, "अल्लाह ने जो कुछ उतारा है उस पर ईमान लाओ", तो कहते है, "हम तो उसपर ईमान रखते है जो हम पर उतरा है," और उसे मानने से इनकार करते हैं जो उसके पीछे है, जबकि वही सत्य है, उसकी पुष्टि करता है जो उसके पास है। कहो, "अच्छा तो इससे पहले अल्लाह के पैग़म्बरों की हत्या क्यों करते रहे हो, यदि तुम ईमानवाले हो?"
وَلَقَدْ جَٓاءَكُمْ مُوسٰى بِالْبَيِّنَاتِ ثُمَّ اتَّخَذْتُمُ الْعِجْلَ مِنْ بَعْدِه۪ وَاَنْتُمْ ظَالِمُونَ92
तुम्हारे पास मूसा खुली-खुली निशानियाँ लेकर आया, फिर भी उसके बाद तुम ज़ालिम बनकर बछड़े को देवता बना बैठे
وَاِذْ اَخَذْنَا م۪يثَاقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ الطُّورَۜ خُذُوا مَٓا اٰتَيْنَاكُمْ بِقُوَّةٍ وَاسْمَعُواۜ قَالُوا سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَاُشْرِبُوا ف۪ي قُلُوبِهِمُ الْعِجْلَ بِكُفْرِهِمْۜ قُلْ بِئْسَمَا يَاْمُرُكُمْ بِه۪ٓ ا۪يمَانُكُمْ اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَ93
कहो, "यदि अल्लाह के निकट आख़िरत का घर सारे इनसानों को छोड़कर केवल तुम्हारे ही लिए है, फिर तो मृत्यु की कामना करो, यदि तुम सच्चे हो।"
قُلْ اِنْ كَانَتْ لَكُمُ الدَّارُ الْاٰخِرَةُ عِنْدَ اللّٰهِ خَالِصَةً مِنْ دُونِ النَّاسِ فَتَمَنَّوُا الْمَوْتَ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ94
अपने हाथों इन्होंने जो कुछ आगे भेजा है उसके कारण वे कदापि उसकी कामना न करेंगे; अल्लाह तो ज़ालिमों को भली-भाँति जानता है
وَلَنْ يَتَمَنَّوْهُ اَبَدًا بِمَا قَدَّمَتْ اَيْد۪يهِمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ بِالظَّالِم۪ينَ95
अपने हाथों इन्होंने जो कुछ आगे भेजा है उसके कारण वे कदापि उसकी कामना न करेंगे; अल्लाह तो जालिमों को भली-भाँति जानता है
وَلَتَجِدَنَّهُمْ اَحْرَصَ النَّاسِ عَلٰى حَيٰوةٍۚ وَمِنَ الَّذ۪ينَ اَشْرَكُوا يَوَدُّ اَحَدُهُمْ لَوْ يُعَمَّرُ اَلْفَ سَنَةٍۚ وَمَا هُوَ بِمُزَحْزِحِه۪ مِنَ الْعَذَابِ اَنْ يُعَمَّرَۜ وَاللّٰهُ بَص۪يرٌ بِمَا يَعْمَلُونَ۟96
तुम उन्हें सब लोगों से बढ़कर जीवन का लोभी पाओगे, यहाँ तक कि वे इस सम्बन्ध में शिर्क करनेवालो से भी बढ़े हुए है। उनका तो प्रत्येक व्यक्ति यह इच्छा रखता है कि क्या ही अच्छा होता कि उस हज़ार वर्ष की आयु मिले, जबकि यदि उसे यह आयु प्राप्त भी जाए, तो भी वह अपने आपको यातना से नहीं बचा सकता। अल्लाह देख रहा है, जो कुछ वे कर रहे है
قُلْ مَنْ كَانَ عَدُوًّا لِجِبْر۪يلَ فَاِنَّهُ نَزَّلَهُ عَلٰى قَلْبِكَ بِاِذْنِ اللّٰهِ مُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهِ وَهُدًى وَبُشْرٰى لِلْمُؤْمِن۪ينَ97
कहो, "जो कोई जिबरील का शत्रु हो, (तो वह अल्लाह का शत्रु है) क्योंकि उसने तो उसे अल्लाह ही के हुक्म से तम्हारे दिल पर उतारा है, जो उन (भविष्यवाणियों) के सर्वथा अनुकूल है जो उससे पहले से मौजूद हैं; और ईमानवालों के लिए मार्गदर्शन और शुभ-सूचना है
مَنْ كَانَ عَدُوًّا لِلّٰهِ وَمَلٰٓئِكَتِه۪ وَرُسُلِه۪ وَجِبْر۪يلَ وَم۪يكَالَ فَاِنَّ اللّٰهَ عَدُوٌّ لِلْكَافِر۪ينَ98
जो कोई अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसके रसूलों और जिबरील और मीकाईल का शत्रु हो, तो ऐसे इनकार करनेवालों का अल्लाह शत्रु है।"
وَلَقَدْ اَنْزَلْنَٓا اِلَيْكَ اٰيَاتٍ بَيِّنَاتٍۚ وَمَا يَكْفُرُ بِهَٓا اِلَّا الْفَاسِقُونَ99
और हमने तुम्हारी ओर खुली-खुली आयतें उतारी है और उनका इनकार तो बस वही लोग करते हैस जो उल्लंघनकारी हैं
اَوَكُلَّمَا عَاهَدُوا عَهْدًا نَبَذَهُ فَر۪يقٌ مِنْهُمْۜ بَلْ اَكْثَرُهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ100
क्या यह एक निश्चित नीति है कि जब कि उन्होंने कोई वचन दिया तो उनके एक गिरोह ने उसे उठा फेंका? बल्कि उनमें अधिकतर ईमान ही नहीं रखते
وَلَمَّا جَٓاءَهُمْ رَسُولٌ مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ مُصَدِّقٌ لِمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَر۪يقٌ مِنَ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْكِتَابَۗ كِتَابَ اللّٰهِ وَرَٓاءَ ظُهُورِهِمْ كَاَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ101
और जब उनके पास अल्लाह की ओर से एक रसूल आया, जिससे उस (भविष्यवाणी) की पुष्टि हो रही है जो उनके पास थी, तो उनके एक गिरोह ने, जिन्हें किताब मिली थी, अल्लाह की किताब को अपने पीठ पीछे डाल दिया, मानो वे कुछ जानते ही नही
وَاتَّبَعُوا مَا تَتْلُوا الشَّيَاط۪ينُ عَلٰى مُلْكِ سُلَيْمٰنَۚ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمٰنُ وَلٰكِنَّ الشَّيَاط۪ينَ كَفَرُوا يُعَلِّمُونَ النَّاسَ السِّحْرَۗ وَمَٓا اُنْزِلَ عَلَى الْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَارُوتَ وَمَارُوتَۜ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ اَحَدٍ حَتّٰى يَقُولَٓا اِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌ فَلَا تَكْفُرْۜ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِه۪ بَيْنَ الْمَرْءِ وَزَوْجِه۪ۜ وَمَا هُمْ بِضَٓارّ۪ينَ بِه۪ مِنْ اَحَدٍ اِلَّا بِاِذْنِ اللّٰهِۜ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنْفَعُهُمْۜ وَلَقَدْ عَلِمُوا لَمَنِ اشْتَرٰيهُ مَا لَهُ فِي الْاٰخِرَةِ مِنْ خَلَاقٍ۠ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا بِه۪ٓ اَنْفُسَهُمْۜ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ102
और जो वे उस चीज़ के पीछे पड़ गए जिसे शैतान सुलैमान की बादशाही पर थोपकर पढ़ते थे - हालाँकि सुलैमान ने कोई कुफ़्र नहीं किया था, बल्कि कुफ़्र तो शैतानों ने किया था; वे लोगों को जादू सिखाते थे - और उस चीज़ में पड़ गए जो बाबिल में दोनों फ़रिश्तों हारूत और मारूत पर उतारी गई थी। और वे किसी को भी सिखाते न थे जब तक कि कह न देते, "हम तो बस एक परीक्षा है; तो तुम कुफ़्र में न पड़ना।" तो लोग उन दोनों से वह कुछ सीखते है, जिसके द्वारा पति और पत्नी में अलगाव पैदा कर दे - यद्यपि वे उससे किसी को भी हानि नहीं पहुँचा सकते थे। हाँ, यह और बात है कि अल्लाह के हुक्म से किसी को हानि पहुँचनेवाली ही हो - और वह कुछ सीखते है जो उन्हें हानि ही पहुँचाए और उन्हें कोई लाभ न पहुँचाए। और उन्हें भली-भाँति मालूम है कि जो उसका ग्राहक बना, उसका आखिरत में कोई हिस्सा नहीं। कितनी बुरी चीज़ के बदले उन्होंने प्राणों का सौदा किया, यदि वे जानते (तो ठीक मार्ग अपनाते)
وَلَوْ اَنَّهُمْ اٰمَنُوا وَاتَّقَوْا لَمَثُوبَةٌ مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ خَيْرٌۜ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ۟103
और यदि वे ईमान लाते और डर रखते, तो अल्लाह के यहाँ से मिलनेवाला बदला कहीं अच्छा था, यदि वे जानते (तो इसे समझ सकते)
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَقُولُوا رَاعِنَا وَقُولُوا انْظُرْنَا وَاسْمَعُواۜ وَلِلْكَافِر۪ينَ عَذَابٌ اَل۪يمٌ104
ऐ ईमान लानेवालो! 'राइना' न कहा करो, बल्कि 'उनज़ुरना' कहा और सुना करो। और इनकार करनेवालों के लिए दुखद यातना है
مَا يَوَدُّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ اَهْلِ الْكِتَابِ وَلَا الْمُشْرِك۪ينَ اَنْ يُنَزَّلَ عَلَيْكُمْ مِنْ خَيْرٍ مِنْ رَبِّكُمْۜ وَاللّٰهُ يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِه۪ مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظ۪يمِ105
इनकार करनेवाले नहीं चाहते, न किताबवाले और न मुशरिक (बहुदेववादी) कि तुम्हारे रब की ओर से तुमपर कोई भलाई उतरे, हालाँकि अल्लाह जिसे चाहे अपनी दयालुता के लिए ख़ास कर ले; अल्लाह बड़ा अनुग्रह करनेवाला है
مَا نَنْسَخْ مِنْ اٰيَةٍ اَوْ نُنْسِهَا نَاْتِ بِخَيْرٍ مِنْهَٓا اَوْ مِثْلِهَاۜ اَلَمْ تَعْلَمْ اَنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ106
हम जिस आयत (और निशान) को भी मिटा दें या उसे भुला देते है, तो उससे बेहतर लाते है या उस जैसा दूसरा ही। क्या तुम नहीं जानते हो कि अल्लाह को हर चीज़ का सामर्थ्य प्राप्त है?
اَلَمْ تَعْلَمْ اَنَّ اللّٰهَ لَهُ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَص۪يرٍ107
क्या तुम नहीं जानते कि आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है और अल्लाह से हटकर न तुम्हारा कोई मित्र है और न सहायक?
اَمْ تُر۪يدُونَ اَنْ تَسْـَٔلُوا رَسُولَكُمْ كَمَا سُئِلَ مُوسٰى مِنْ قَبْلُۜ وَمَنْ يَتَبَدَّلِ الْكُفْرَ بِالْا۪يمَانِ فَقَدْ ضَلَّ سَوَٓاءَ السَّب۪يلِ108
(ऐ ईमानवालों! तुम अपने रसूल के आदर का ध्यान रखो) या तुम चाहते हो कि अपने रसूल से उसी प्रकार से प्रश्न और बात करो, जिस प्रकार इससे पहले मूसा से बात की गई है? हालाँकि जिस व्यक्ति न ईमान के बदले इनकार की नीति अपनाई, तो वह सीधे रास्ते से भटक गया
وَدَّ كَث۪يرٌ مِنْ اَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يَرُدُّونَكُمْ مِنْ بَعْدِ ا۪يمَانِكُمْ كُفَّارًاۚ حَسَدًا مِنْ عِنْدِ اَنْفُسِهِمْ مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ الْحَقُّۚ فَاعْفُوا وَاصْفَحُوا حَتّٰى يَاْتِيَ اللّٰهُ بِاَمْرِه۪ۜ اِنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ109
बहुत-से किताबवाले अपने भीतर की ईर्ष्या से चाहते है कि किसी प्रकार वे तुम्हारे ईमान लाने के बाद फेरकर तुम्हे इनकार कर देनेवाला बना दें, यद्यपि सत्य उनपर प्रकट हो चुका है, तो तुम दरगुज़र (क्षमा) से काम लो और जाने दो यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला लागू न कर दे। निस्संदेह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَۜ وَمَا تُقَدِّمُوا لِاَنْفُسِكُمْ مِنْ خَيْرٍ تَجِدُوهُ عِنْدَ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ110
और नमाज़ कायम करो और ज़कात दो और तुम स्वयं अपने लिए जो भलाई भी पेश करोगे, उसे अल्लाह के यहाँ मौजूद पाओगे। निस्संदेह जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है
وَقَالُوا لَنْ يَدْخُلَ الْجَنَّةَ اِلَّا مَنْ كَانَ هُودًا اَوْ نَصَارٰىۜ تِلْكَ اَمَانِيُّهُمْۜ قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ111
और उनका कहना है, "कोई व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं करता सिवाय उससे जो यहूदी है या ईसाई है।" ये उनकी अपनी निराधार कामनाएँ है। कहो, "यदि तुम सच्चे हो तो अपने प्रमाण पेश करो।"
بَلٰى مَنْ اَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلّٰهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَلَهُٓ اَجْرُهُ عِنْدَ رَبِّه۪ۖ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ۟112
क्यों नहीं, जिसने भी अपने-आपको अल्लाह के प्रति समर्पित कर दिया और उसका कर्म भी अच्छे से अच्छा हो तो उसका प्रतिदान उसके रब के पास है और ऐसे लोगो के लिए न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे
وَقَالَتِ الْيَهُودُ لَيْسَتِ النَّصَارٰى عَلٰى شَيْءٍۖ وَقَالَتِ النَّصَارٰى لَيْسَتِ الْيَهُودُ عَلٰى شَيْءٍۙ وَهُمْ يَتْلُونَ الْكِتَابَۜ كَذٰلِكَ قَالَ الَّذ۪ينَ لَا يَعْلَمُونَ مِثْلَ قَوْلِهِمْۚ فَاللّٰهُ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ ف۪يمَا كَانُوا ف۪يهِ يَخْتَلِفُونَ113
यहूदियों ने कहा, "ईसाईयों की कोई बुनियाद नहीं।" और ईसाइयों ने कहा, "यहूदियों की कोई बुनियाद नहीं।" हालाँकि वे किताब का पाठ करते है। इसी तरह की बात उन्होंने भी कही है जो ज्ञान से वंचित है। तो अल्लाह क़यामत के दिन उनके बीच उस चीज़ के विषय में निर्णय कर देगा, जिसके विषय में वे विभेद कर रहे है
وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنْ مَنَعَ مَسَاجِدَ اللّٰهِ اَنْ يُذْكَرَ ف۪يهَا اسْمُهُ وَسَعٰى ف۪ي خَرَابِهَاۜ اُو۬لٰٓئِكَ مَا كَانَ لَهُمْ اَنْ يَدْخُلُوهَٓا اِلَّا خَٓائِف۪ينَۜ لَهُمْ فِي الدُّنْيَا خِزْيٌ وَلَهُمْ فِي الْاٰخِرَةِ عَذَابٌ عَظ۪يمٌ114
और उससे बढ़कर अत्याचारी और कौन होगा जिसने अल्लाह की मस्जिदों को उसके नाम के स्मरण से वंचित रखा और उन्हें उजाडने पर उतारू रहा? ऐसे लोगों को तो बस डरते हुए ही उसमें प्रवेश करना चाहिए था। उनके लिए संसार में रुसवाई (अपमान) है और उनके लिए आख़िरत में बड़ी यातना नियत है
وَلِلّٰهِ الْمَشْرِقُ وَالْمَغْرِبُ فَاَيْنَمَا تُوَلُّوا فَثَمَّ وَجْهُ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ وَاسِعٌ عَل۪يمٌ115
पूरब और पश्चिम अल्लाह ही के है, अतः जिस ओर भी तुम रुख करो उसी ओर अल्लाह का रुख़ है। निस्संदेह अल्लाह बड़ा समाईवाला (सर्वव्यापी) सर्वज्ञ है
وَقَالُوا اتَّخَذَ اللّٰهُ وَلَدًاۙ سُبْحَانَهُۜ بَلْ لَهُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ كُلٌّ لَهُ قَانِتُونَ116
कहते है, अल्लाह औलाद रखता है - महिमावाला है वह! (पूरब और पश्चिम हीं नहीं, बल्कि) आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, उसी का है। सभी उसके आज्ञाकारी है
بَد۪يعُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَاِذَا قَضٰٓى اَمْرًا فَاِنَّمَا يَقُولُ لَهُ كُنْ فَيَكُونُ117
वह आकाशों और धरती का प्रथमतः पैदा करनेवाला है। वह तो जब किसी काम का निर्णय करता है, तो उसके लिए बस कह देता है कि "हो जा" और वह हो जाता है
وَقَالَ الَّذ۪ينَ لَا يَعْلَمُونَ لَوْلَا يُكَلِّمُنَا اللّٰهُ اَوْ تَاْت۪ينَٓا اٰيَةٌۜ كَذٰلِكَ قَالَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْ مِثْلَ قَوْلِهِمْۜ تَشَابَهَتْ قُلُوبُهُمْۜ قَدْ بَيَّنَّا الْاٰيَاتِ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ118
जिन्हें ज्ञान नहीं हैं, वे कहते है, "अल्लाह हमसे बात क्यों नहीं करता? या कोई निशानी हमारे पास आ जाए।" इसी प्रकार इनसे पहले के लोग भी कह चुके है। इन सबके दिल एक जैसे है। हम खोल-खोलकर निशानियाँ उन लोगों के लिए बयान कर चुके है जो विश्वास करें
اِنَّٓا اَرْسَلْنَاكَ بِالْحَقِّ بَش۪يرًا وَنَذ۪يرًاۙ وَلَا تُسْـَٔلُ عَنْ اَصْحَابِ الْجَح۪يمِ119
निश्चित रूप से हमने तुम्हें हक़ के साथ शुभ-सूचना देनेवाला और डरानेवाला बनाकर भेजा। भड़कती आग में पड़नेवालों के विषय में तुमसे कुछ न पूछा जाएगा
وَلَنْ تَرْضٰى عَنْكَ الْيَهُودُ وَلَا النَّصَارٰى حَتّٰى تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمْۜ قُلْ اِنَّ هُدَى اللّٰهِ هُوَ الْهُدٰىۜ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ اَهْوَٓاءَهُمْ بَعْدَ الَّذ۪ي جَٓاءَكَ مِنَ الْعِلْمِۙ مَا لَكَ مِنَ اللّٰهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَص۪يرٍ120
न यहूदी तुमसे कभी राज़ी होनेवाले है और न ईसाई जब तक कि तुम अनके पंथ पर न चलने लग जाओ। कह दो, "अल्लाह का मार्गदर्शन ही वास्तविक मार्गदर्शन है।" और यदि उस ज्ञान के पश्चात जो तुम्हारे पास आ चुका है, तुमने उनकी इच्छाओं का अनुसरण किया, तो अल्लाह से बचानेवाला न तो तुम्हारा कोई मित्र होगा और न सहायक
اَلَّذ۪ينَ اٰتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَتْلُونَهُ حَقَّ تِلَاوَتِه۪ۜ اُو۬لٰٓئِكَ يُؤْمِنُونَ بِه۪ۜ وَمَنْ يَكْفُرْ بِه۪ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ۟121
जिन लोगों को हमने किताब दी है उनमें वे लोग जो उसे उस तरह पढ़ते है जैसा कि उसके पढ़ने का हक़ है, वही उसपर ईमान ला रहे है, और जो उसका इनकार करेंगे, वही घाटे में रहनेवाले है
يَا بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ اذْكُرُوا نِعْمَتِيَ الَّت۪ٓي اَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَاَنّ۪ي فَضَّلْتُكُمْ عَلَى الْعَالَم۪ينَ122
ऐ इसराईल की सन्तान! मेरी उस कृपा को याद करो जो मैंने तुमपर की थी और यह कि मैंने तुम्हें संसारवालों पर श्रेष्ठता प्रदान की
وَاتَّقُوا يَوْمًا لَا تَجْز۪ي نَفْسٌ عَنْ نَفْسٍ شَيْـًٔا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا تَنْفَعُهَا شَفَاعَةٌ وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ123
और उस दिन से डरो, जब कोई न किसी के काम आएगा, न किसी की ओर से अर्थदंड स्वीकार किया जाएगा, और न कोई सिफ़ारिश ही उसे लाभ पहुँचा सकेगी, और न उनको कोई सहायता ही पहुँच सकेगी
وَاِذِ ابْتَلٰٓى اِبْرٰه۪يمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَاَتَمَّهُنَّۜ قَالَ اِنّ۪ي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ اِمَامًاۜ قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّت۪يۜ قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِم۪ينَ124
और याद करो जब इबराहीम की उसके रब से कुछ बातों में परीक्षा ली तो उसने उसको पूरा कर दिखाया। उसने कहा, "मैं तुझे सारे इनसानों का पेशवा बनानेवाला हूँ।" उसने निवेदन किया, " और मेरी सन्तान में भी।" उसने कहा, "ज़ालिम मेरे इस वादे के अन्तर्गत नहीं आ सकते।"
وَاِذْ جَعَلْنَا الْبَيْتَ مَثَابَةً لِلنَّاسِ وَاَمْنًاۜ وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ اِبْرٰه۪يمَ مُصَلًّىۜ وَعَهِدْنَٓا اِلٰٓى اِبْرٰه۪يمَ وَاِسْمٰع۪يلَ اَنْ طَهِّرَا بَيْتِيَ لِلطَّٓائِف۪ينَ وَالْعَاكِف۪ينَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ125
और याद करो जब हमने इस घर (काबा) को लोगों को लिए केन्द्र और शान्तिस्थल बनाया - और, "इबराहीम के स्थल में से किसी जगह को नमाज़ की जगह बना लो!" - और इबराहीम और इसमाईल को ज़िम्मेदार बनाया। "तुम मेरे इस घर को तवाफ़ करनेवालों और एतिकाफ़ करनेवालों के लिए और रुकू और सजदा करनेवालों के लिए पाक-साफ़ रखो।"
وَاِذْ قَالَ اِبْرٰه۪يمُ رَبِّ اجْعَلْ هٰذَا بَلَدًا اٰمِنًا وَارْزُقْ اَهْلَهُ مِنَ الثَّمَرَاتِ مَنْ اٰمَنَ مِنْهُمْ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِۜ قَالَ وَمَنْ كَفَرَ فَاُمَتِّعُهُ قَل۪يلًا ثُمَّ اَضْطَرُّهُٓ اِلٰى عَذَابِ النَّارِۜ وَبِئْسَ الْمَص۪يرُ126
और याद करो जब इबराहीम ने कहा, "ऐ मेरे रब! इसे शान्तिमय भू-भाग बना दे और इसके उन निवासियों को फलों की रोज़ी दे जो उनमें से अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाएँ।" कहा, "और जो इनकार करेगा थोड़ा फ़ायदा तो उसे भी दूँगा, फिर उसे घसीटकर आग की यातना की ओर पहुँचा दूँगा और वह बहुत-ही बुरा ठिकाना है!"
وَاِذْ يَرْفَعُ اِبْرٰه۪يمُ الْقَوَاعِدَ مِنَ الْبَيْتِ وَاِسْمٰع۪يلُۜ رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّاۜ اِنَّكَ اَنْتَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُ127
और याद करो जब इबराहीम और इसमाईल इस घर की बुनियादें उठा रहे थे, (तो उन्होंने प्रार्थना की), "ऐ हमारे रब! हमारी ओर से इसे स्वीकार कर ले, निस्संदेह तू सुनता-जानता है
رَبَّنَا وَاجْعَلْنَا مُسْلِمَيْنِ لَكَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِنَٓا اُمَّةً مُسْلِمَةً لَكَۖ وَاَرِنَا مَنَاسِكَنَا وَتُبْ عَلَيْنَاۚ اِنَّكَ اَنْتَ التَّوَّابُ الرَّح۪يمُ128
ऐ हमारे रब! हम दोनों को अपना आज्ञाकारी बना और हमारी संतान में से अपना एक आज्ञाकारी समुदाय बना; और हमें हमारे इबादत के तरीक़े बता और हमारी तौबा क़बूल कर। निस्संदेह तू तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
رَبَّنَا وَابْعَثْ ف۪يهِمْ رَسُولًا مِنْهُمْ يَتْلُوا عَلَيْهِمْ اٰيَاتِكَ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَيُزَكّ۪يهِمْۜ اِنَّكَ اَنْتَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ۟129
ऐ हमारे रब! उनमें उन्हीं में से एक ऐसा रसूल उठा जो उन्हें तेरी आयतें सुनाए और उनको किताब और तत्वदर्शिता की शिक्षा दे और उन (की आत्मा) को विकसित करे। निस्संदेह तू प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
وَمَنْ يَرْغَبُ عَنْ مِلَّةِ اِبْرٰه۪يمَ اِلَّا مَنْ سَفِهَ نَفْسَهُۜ وَلَقَدِ اصْطَفَيْنَاهُ فِي الدُّنْيَاۚ وَاِنَّهُ فِي الْاٰخِرَةِ لَمِنَ الصَّالِح۪ينَ130
कौन है जो इबराहीम के पंथ से मुँह मोड़े सिवाय उसके जिसने स्वयं को पतित कर लिया? और उसे तो हमने दुनिया में चुन लिया था और निस्संदेह आख़िरत में उसकी गणना योग्य लोगों में होगी
اِذْ قَالَ لَهُ رَبُّهُٓ اَسْلِمْۙ قَالَ اَسْلَمْتُ لِرَبِّ الْعَالَم۪ينَ131
क्योंकि जब उससे रब ने कहा, "मुस्लिम (आज्ञाकारी) हो जा।" उसने कहा, "मैं सारे संसार के रब का मुस्लिम हो गया।"
وَوَصّٰى بِهَٓا اِبْرٰه۪يمُ بَن۪يهِ وَيَعْقُوبُۜ يَا بَنِيَّ اِنَّ اللّٰهَ اصْطَفٰى لَكُمُ الدّ۪ينَ فَلَا تَمُوتُنَّ اِلَّا وَاَنْتُمْ مُسْلِمُونَۜ132
और इसी की वसीयत इबराहीम ने अपने बेटों को की और याक़ूब ने भी (अपनी सन्तानों को की) कि, "ऐ मेरे बेटों! अल्लाह ने तुम्हारे लिए यही दीन (धर्म) चुना है, तो इस्लाम (ईश-आज्ञापालन) को अतिरिक्त किसी और दशा में तुम्हारी मृत्यु न हो।"
اَمْ كُنْتُمْ شُهَدَٓاءَ اِذْ حَضَرَ يَعْقُوبَ الْمَوْتُۙ اِذْ قَالَ لِبَن۪يهِ مَا تَعْبُدُونَ مِنْ بَعْد۪يۜ قَالُوا نَعْبُدُ اِلٰهَكَ وَاِلٰهَ اٰبَٓائِكَ اِبْرٰه۪يمَ وَاِسْمٰع۪يلَ وَاِسْحٰقَ اِلٰهًا وَاحِدًاۚ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ133
(क्या तुम इबराहीम के वसीयत करते समय मौजूद थे? या तुम मौजूद थे जब याक़ूब की मृत्यु का समय आया? जब उसने बेटों से कहा, "तुम मेरे पश्चात किसकी इबादत करोगे?" उन्होंने कहा, "हम आपके इष्ट-पूज्य और आपके पूर्वज इबराहीम और इसमाईल और इसहाक़ के इष्ट-पूज्य की बन्दगी करेंगे - जो अकेला इष्ट-पूज्य है, और हम उसी के आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं।"
تِلْكَ اُمَّةٌ قَدْ خَلَتْۚ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَلَكُمْ مَا كَسَبْتُمْۚ وَلَا تُسْـَٔلُونَ عَمَّا كَانُوا يَعْمَلُونَ134
वह एक गिरोह था जो गुज़र चुका, जो कुछ उसने कमाया वह उसका है, और जो कुछ तुमने कमाया वह तुम्हारा है। और जो कुछ वे करते रहे उसके विषय में तुमसे कोई पूछताछ न की जाएगी
وَقَالُوا كُونُوا هُودًا اَوْ نَصَارٰى تَهْتَدُواۜ قُلْ بَلْ مِلَّةَ اِبْرٰه۪يمَ حَن۪يفًاۜ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَ135
वे कहते हैं, "यहूदी या ईसाई हो जाओ तो मार्ग पर लोगे।" कहो, "नहीं, बल्कि इबराहीम का पंथ अपनाओ जो एक (अल्लाह) का हो गया था, और वह बहुदेववादियों में से न था।"
قُولُٓوا اٰمَنَّا بِاللّٰهِ وَمَٓا اُنْزِلَ اِلَيْنَا وَمَٓا اُنْزِلَ اِلٰٓى اِبْرٰه۪يمَ وَاِسْمٰع۪يلَ وَاِسْحٰقَ وَيَعْقُوبَ وَالْاَسْبَاطِ وَمَٓا اُو۫تِيَ مُوسٰى وَع۪يسٰى وَمَٓا اُو۫تِيَ النَّبِيُّونَ مِنْ رَبِّهِمْۚ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ اَحَدٍ مِنْهُمْۘ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ136
कहो, "हम ईमान लाए अल्लाह पर और उस चीज़ पर जो हमारी ओर से उतरी और जो इबराहीम और इसमाईल और इसहाक़ और याक़ूब और उसकी संतान की ओर उतरी, और जो मूसा और ईसा को मिली, और जो सभी नबियों को उनके रब की ओर से प्रदान की गई। हम उनमें से किसी के बीच अन्तर नहीं करते और हम केवल उसी के आज्ञाकारी हैं।"
فَاِنْ اٰمَنُوا بِمِثْلِ مَٓا اٰمَنْتُمْ بِه۪ فَقَدِ اهْتَدَوْاۚ وَاِنْ تَوَلَّوْا فَاِنَّمَا هُمْ ف۪ي شِقَاقٍۚ فَسَيَكْف۪يكَهُمُ اللّٰهُۚ وَهُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُۜ137
फिर यदि वे उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह तुम ईमान लाए हो, तो उन्होंने मार्ग पा लिया। और यदि वे मुँह मोड़े, तो फिर वही विरोध में पड़े हुए है। अतः तुम्हारी जगह स्वयं अल्लाह उनसे निबटने के लिए काफ़ी है; वह सब कुछ सुनता, जानता है
صِبْغَةَ اللّٰهِۚ وَمَنْ اَحْسَنُ مِنَ اللّٰهِ صِبْغَةًۘ وَنَحْنُ لَهُ عَابِدُونَ138
(कहो,) "अल्लाह का रंग ग्रहण करो, उसके रंग से अच्छा और किसका रंह हो सकता है? और हम तो उसी की बन्दगी करते हैं।"
قُلْ اَتُحَٓاجُّونَنَا فِي اللّٰهِ وَهُوَ رَبُّنَا وَرَبُّكُمْۚ وَلَنَٓا اَعْمَالُنَا وَلَكُمْ اَعْمَالُكُمْۚ وَنَحْنُ لَهُ مُخْلِصُونَۙ139
कहो, "क्या तुम अल्लाह के विषय में हमसे झगड़ते हो, हालाँकि वही हमारा रब भी है, और तुम्हारा रब भी? और हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। और हम तो बस निरे उसी के है।"
اَمْ تَقُولُونَ اِنَّ اِبْرٰه۪يمَ وَاِسْمٰع۪يلَ وَاِسْحٰقَ وَيَعْقُوبَ وَالْاَسْبَاطَ كَانُوا هُودًا اَوْ نَصَارٰىۜ قُلْ ءَاَنْتُمْ اَعْلَمُ اَمِ اللّٰهُۜ وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنْ كَتَمَ شَهَادَةً عِنْدَهُ مِنَ اللّٰهِۜ وَمَا اللّٰهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ140
या तुम कहते हो कि इबराहीम और इसमाईल और इसहाक़ और याक़ूब और उनकी संतान सब के सब यहूदी या ईसाई थे? कहो, "तुम अधिक जानते हो या अल्लाह? और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा, जिसके पास अल्लाह की ओर से आई हुई कोई गवाही हो, और वह उसे छिपाए? और जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेखबर नहीं है।"
تِلْكَ اُمَّةٌ قَدْ خَلَتْۚ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَلَكُمْ مَا كَسَبْتُمْۚ وَلَا تُسْـَٔلُونَ عَمَّا كَانُوا يَعْمَلُونَ۟141
वह एक गिरोह थो जो गुज़र चुका, जो कुछ उसने कमाया वह उसके लिए है और जो कुछ तुमने कमाया वह तुम्हारे लिए है। और तुमसे उसके विषय में न पूछा जाएगा, जो कुछ वे करते रहे है